27 जुलाई 2019- दादा जी महाराष्ट्र आये

दादा जी से मिलना हुआ । मैं बार बार तस्वीर ले रही थी तो कहने लगे:

“ई क्या आदत है तुम लोगों का।”

लेकिन जब नब्बे साल से अधिक का जीवंत समय साथ बैठे हों तो तस्वीर लेना बनता है। बहुत खुशी हुई , दूसरी बार दादा जी मुंबई स्थित हमारे अपार्टमेंट में आये। घर शब्द केवल मुम्बई के लिए कैसे लिख दूँ, आजकल सास भी कुशहर में रह रहीं।

एक मज़ेदार बात यह है कि मेरे दादा जी का नाम रूप नारायण झा और ससुर जी का नाम रूप नारायण मिश्र है । अंतर केवल अंग्रेज़ी की वर्तनी में है। दादा जी Roop लिखते हैं। बाबू जी Rup लिखते हैं। खैर।मैंने विंग की लॉबी में पुणे जाने वाली ओला का इन्तिज़ार करते हुए याद किया की दादा जी 1950 में अपने मामा गाँव गए थे इसलिए वो कहते हैं अगला कौआ जनम नहीं होगा।

1998 के अगस्त की बात है, उनकी बहन से राखी आयी तो मैंने पूछा था , “आपकी भी बहन हैं” , दादा जी गर्व से बोले थे हाँ हैं, फिर मामा गाम की चर्चा हुई थी।
आज पूछने पर बताये अभी उनकी सबसे छोटी बहन हैं, लेकिन राखी शायद वहाँ से अब नहीं आ पाती।

इससे पहले दादा जी 2013 में अभिज्ञान के जन्म के एक साल बाद आये थे। तब उनके आने पर मैंने एक कविता लिखी थी। लिंक देखनी पड़ेगी, शतदल ब्लॉग पर ही है। तब से अब तक में मेरे लिखने और बात रखने में बदलाव आया है। दादा जी से सम्भवत: मुंबई में फिर मिलना होगा। कल उन्होंने मेरी आवाज़ में गाने सुने और कविताएँ सुनी।

मैंने राग यमन में आरोह, अवरोह , पकड़ सुनाने के बाद “तोरी रे बाँसुरिया” बंदिश सुनाई।
उन्होंने कहा “अब ई हमको कैसे पता चलेगा तुम सही गायी की गलत गायी”

फिर बोले कुछ फिल्मी गाने सुनाओ तो आजकल अनिता मैडम की क्लास में मैं और अभिज्ञान किशोर दा का लिखा ‘आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ ‘ सीख रहे , वो सुनाए। फिर दादी माँ की पसंद का मैथिली गीत “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर ” सुना कर सभा खत्म हुई।

अभी-अभी शाम में भाँजी आराधना ने चुटकी ली , “मामी, सुर लगाने में नाना जी को रात में दूध देना भूल गयीं कल आप ।”
बात इतनी मज़ेदार तरीके से बोली लड़की ने की सोचा उसे डायरी में शामिल कर ही दूँ ।

रास्ते -क्षणिका

ऐसे रास्तों से राहत मिलती है, गहरी साँस में सुकून होता है,
यूँ मंज़िल तलाशना भर भी ज़िंदगियों का हासिल होता है।
उम्र सारी कट रही सफर में नहीं किसी दर पे आराम होता है।
अपने सुनाते हैं हरदम कलम से यारी का यही अंजाम होता है।

चित्र साभार – #गूँज #अनामिका_चक्रबर्ती #रविवारीय #क्षणिका

रिश्ते

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जहाँ ज़िन्दगी से कुछ न मांगो
वहां टिफ़िन में दही के साथ कोई
याद से चम्मच रखने वाले मिल जाये
तो भी अमीर होने का एहसास होता है।
बोला तो नहीं था पर जैसे मालूम था
की हाथ बढ़ा के चेक करेंगे तो रखा ही होगा।

ऐसे ही होते हैं रिश्ते। अगर पूरा जीवन एक शरीर मान लीजिए तो जीवन में बने सभी रिश्ते शरीर का अंग होते हैं। हर अंग महत्त्व पूर्ण है, सबका अपना कार्य क्षेत्र है, अपनी उम्र है, जितना ध्यान दिया गया उतना स्वस्थ चले।

उनमें से कुछ रिश्ते दिल हो जाते हैं।

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छाती में खाना अटकने की स्थिति वाला अनुभव और Heimlich manoeuvre की जानकारी

कृपया इस लिंक को क्लिक करें और फेसबुक पर घूम रही इस वीडियो को ध्यान से देखें इसमें Heimlich manoeuvre का असल समय पर प्रयोग होटल मैनेजर Vasilis Patelakis द्वारा दिखाया गया है।

ठीक ऐसी की घटना मेरे साथ घट चुकी है, यह स्थिती इतनी डरावनी थी की जान पहचान वाले मुझे अब ऑफिस में अकेले खाने बैठने नहीं देते ।एक आध बार जब ऐसा हुआ तो थोड़ी दूर टहल चल कर खाना इसोफेगस से उतर गया, लेकिन एक दिन अती हो गयी काफी देर अटका रह गया और कलीग्स जुट कर अपने स्तर से जो मदद कर सकते थे किए, किसी ने पीठ थप थपायी किसी ने छास या पानी पीने दिया, अंत मे चलना टहलना भी काम आया ।

विडीओ में दिया तरीका किसी को मालूम नहीं था और चोक-ब्लॉक बोलस को भोजन-नली से निकलने में उस दौरान काफी समय लग गया था । सन्जोग से मेडिकल हेल्प आने तक में मैं ठीक हो चुकी थी।

बहुत छटपटाहट वाली स्थिति होती है। उस समय मैंने समझा की सबसे ज़रूरी होता है शरीर को जितना शांत रख सकें उतना शांत हो जाना धीरे-धीरे सांस लेने की कोशिश करना वर्ना घबराहट में जो भी भला हो सकना हो वो भी न होगा। मुझे उल्टी नही हो पा रही थी ऐसा लग रहा था की बोलस के नीचे नली में हवा हो , मैं पीठ सीधी कर एक दम चुप चाप शांत बैठी । बीच में टहली भी लेकिन बिना बात किये एकदम शांत होकर। धीरे-धीरे हल्की डकार आयी , तब तक मे देखने वालों के मुताबिक मेरा चेहरा पूरा लाल पड़ चुका था।डकार आने से मैं पानी पीती, फिर अचानक थोड़ा टुकड़ा निकल आया, थोड़ा इसोफेगस से पास हुआ, जान में जान आयी।

इस घटना के बाद मैंने जल्दी-जल्दी एवं बड़े-बड़े कौर खाना छोड़ दिया, खाने को अधिक देर चबाती हूँ। साथ मे अब बात कम करती हूँ । कम से कोशिश तो रहती है कि बेस्ट प्रेक्टिस फॉलो करूं। सुबह अब खाली पेट नहीं निकलती , निकली भी तो अब खाली पेट कॉफी कभी नहीं लेती क्योंकि ऐसा मेरे साथ तब-तब हुआ जब मैंने अधिक गैप के बाद कॉफी पी ली फिर खाना खाया। लगता था जैसे हवा के कुशन पर जा कर खाना इसोफेगस में अटक गया और पेरिस्ताल्टिक मूवमेंट बोलस की हो ही न रही हो।दो बहुत महत्त्व पूर्ण बातें:

1. मैं यह समझ रही थी की मेडिकल हेल्प आने तक हम में से किसी को नहीं पता की करना क्या है इसलिए सबकी की सुनकर कुछ से कुछ करते जाने से बेहतर शांत रहना है, “शांत रहो , चलो, फिर बैठो, पानी थोड़ा-थोड़ा लेकर उल्टी की कोशिश करो” , “दीपिका ने पीछे से आवाज़ दी थी इसे जो समझ आ रहा है करने दीजिए। इसके साथ ऐसा हुआ है पहले भी।”

2. दूसरी यह की मैं लगातार कल्पना कर रही थी की , जब यह स्थिति टल जाएगी सभी आस पास खड़े लोग ज़रा सर पकड़ कर हँसेंगे । मुझे कहेंगे , ” ध्यान रखा करो” औऱ मैं हँसते डरते वापिस अपने क्यूबिकल में काम करने बैठी हूँ। ईश्वर की कृपा से ठीक ऐसा ही हुआ।

प्रज्ञा

तस्वीर साभार : गूगल

बचपन

जिन सपनीली आँखों में दुनिया समेटी है, वहीं ख़ुशी मिलती है ।

हमारे प्यार की पुड़िया बन्द इनकी छोटी सी मुट्ठी में मिलती है!

जब-जब खुली देखो उड़ी बनकर तितलियाँ खाबों के सिरहाने।

कुछ तस्वीरें विंग की लॉबी से सहेजे बचपन।
शहर का आदमी कितने एंगल ले आएगा ,
कभी मॉल जाएगा कभी मल्टीप्लेक्स
लेकिन इंसानी खूबसूरती को निहारने की कोशिश
कैमरे हज़ारों तरीके से करते आये हैं करते रहेंगे
क्योंकि सम्वेदनाएँ जगह की मोहताज नहीं।