KukuFM-बुलंदियाँ -10 जुलाई

कोई ला के मुझे दे!
कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्टे-मीठे फल,
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जमुना का जल

कोई ला के मुझे दे!
एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों भरी रात,
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात-
कोई ला के मुझे दे!

आदतन मैं सोने से पहले कुछ बेहतरीन कहानियाँ , दास्तानें और आजकल जॉन एलिया की शायरी भी सुनते सोती हूँ । इसमें मेरी सबसे पसंदीदा बात है अमर दास्तानगो अंकित चड्ढा जी की सभी यू ट्यूब वीडिओज़ को ध्यान से देखना और उनकी यात्रा से सीखना की जब आप अन्तर्मन से जीवन-यात्रा के लिए जागते हैं तो जीवन छोटा या अधूरा नहीं होता जितना भी हो अपने पूरा होता है।
दामोदर अग्रवाल का लिखा गीत” कोई ला के मुझे दे” अंकित जी की आवाज़ में है और उनही को समर्पित एक ट् ईट्यूब विडीओ सुनते हुए मिला जिसकी धुन मानिए आत्मा को संतुष्टि देती है। ऐसे जीवन देश को धन्य करते हैं।

हमारा देश जिसकी पीढ़ियों ने जी हुजूरी के संस्कार में एक अरसा निकाला है उसमें आत्म विश्वासी युवा होना और कुदरत से मिले अपने तोहफों पर गर्व करना ,उसकी बदौलत आगे बढ़ने की हिम्मत करना अपने आप मे बड़ी जीत है। ऐसे युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है जिसका श्रेय नए मध्यम वर्गीय माता पिता चाचा फूफा बुआ मौसा मौसियों को जाता है जो अपने बच्चों पर विचार थोपने के बजाए कपड़ो , खिलोने से लेकर पढ़ाई करियर, मित्रता की बातें यारों की तरह करते हैं ।

अच्छी संगत , सेहत , रूचि के हिसाब से पढ़ाई और रचनात्मक सोच बेहतरीन भविष्य की गारंटी नहीं है। इन सब के बावजूद हम गिरते हैं , निराश होते हैं , उस समय हमें अपने अंदर की ऊर्जा का आह्वान करना चाहिए। अच्छी किताबों में , नए स्किलस में अपना समय इन्वेस्ट करना चाहिए जिससे समय के साथ हम हर दिन कुछ नया अपने अंदर जोड़ें और एक कमतर बात अपने भीतर से बाहर करें।

प्रतियोगिता स्वयं से अपने कल की अपने भविष्य से।

अपने आप को बेहतर इंसान बनाने की निरंतर सोचते रहना अच्छे समाज का निर्माण करने की दिशा में सोचना है । हमे याद रखना चाहिए व्यक्ति समाज से नहीं होता , समाज का निर्माण व्यक्ति से होता है इसलिए हर आदमी केवल अपनी ही त्रुटियों को देख सीख और सुधारता चले उसी से सारे काम बन जाएं। समाज सेवी वे होते हैं जो अपने ऊपर काम करते हैं, अपना गुस्सा , अपनी बोली, गुण , विचार व्यवहार सब नियंत्रित करते हुए मेहनत में लगे रहते हैं। वे ईश्वर के निकट होते हैं।

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

एक नायाब वक़्त की खोज में रौशनी के छोटे छोटे कमरे नहीं छोड़ते।

चींटी हार नहीं मानती है
कितनी मसली गयी
लुढ़काई गयी
बोझ सहे
सब नियती मान कर
बढ़ती जाती है
हम चींटी ही तो हैं
प्रकृति के आगे
इसलिए हम हार नहीं मानते हैं
बढ़ते जाते हैं
जीत की मुस्कान लिए।

#मनकेहारेहारहै #मनकजीतजीत।

इस कड़ी में आज मैं सुनाती हूँ आपको मेरी कविता बुलंदियाँ जो मैंने लिखी थी 15 अक्टूबर 2004 को ।ये वो समय था जब राँची से दिल्ली स्नातक की पढ़ाई करने आई थी । बिहार की साधारण लड़की जिसे मुश्किल से अंग्रेज़ी आती थी और दिल्ली विश्विद्यालय में ठठने की चुनौतियां ।
तीन साल मेरी इस कविता ने मुझे खड़ा रखा और आज भी प्रेरणा देती है।

{कविता और पूरा एपिसोड एप पर सुन सकते हैं}

Kukufm app Download करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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