रिश्ते

जहाँ ज़िन्दगी से कुछ न मांगो
वहां टिफ़िन में दही के साथ कोई
याद से चम्मच रखने वाले मिल जाये
तो भी अमीर होने का एहसास होता है।
बोला तो नहीं था पर जैसे मालूम था
की हाथ बढ़ा के चेक करेंगे तो रखा ही होगा।

ऐसे ही होते हैं रिश्ते। अगर पूरा जीवन एक शरीर मान लीजिए तो जीवन में बने सभी रिश्ते शरीर का अंग होते हैं। हर अंग महत्त्व पूर्ण है, सबका अपना कार्य क्षेत्र है, अपनी उम्र है, जितना ध्यान दिया गया उतना स्वस्थ चले। उनमें से कुछ रिश्ते दिल हो जाते हैं।

ये पढ़ते हुए आपके भी ज़ेहन में कुछ चेहरे ऐसे आये होंगे जो दिल हो गए। इन रिश्तों में मोह हमको सबसे ज़्यादा बाँधता है। मोह में बंधे हम कई बार तो जवाबदेही निबाहते बड़ी तल्लीनता से सफर कर जाते हैं । तो कई बार छूटा अधूरा कितना कुछ हमको उम्र भर सालता रहता है।

गोदान उपन्यास के अंतिम चरण में जब होरी खाट पर पड़ा था और उसकी ज़बान बन्द हो गई थी, उसकी अश्रु मिश्रित भावनाओं को प्रेमचंद ने इन शब्दों में व्यक्त किया :

“जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा उसी के दुःख का नाम तो मोह है। पाले हुए कर्तव्य और निपटाए हुए कामों का क्या मोह।”

शब्द “रिश्ता” कहानियों और कविताओं में सबसे अधिक प्रयुक्त भाव है। सम्बन्धों की मिठास और दरार के बीच की बेल थाम कर कहानीकार और कवि इसमें अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर कुछ न कुछ ऐसा कहते हैं जिससे हर कोई जुड़ जाता है, फिर या तो वाह निकलती है या तो आह। इन सब अनुभवों को डायरी में समेटते या दुनिया के समक्ष साझा करते मकसद एक ही होता है जिन कायदों को किसी मजबूरी के कारण न जी पाए उनके घटित होने वाली संभावनाएं तलाशना। ये सुखद भी है और दुखद भी।ये दोनों साहित्यिक विधाएं बड़ी महीन सुई है जो हर फट को सीलती है , दुखाती चलती है एक तरह के आराम को अंजाम देते हुए। कविताओं और कहानियों में रिश्ते सम्भाल कर रखे हैं। उनके एहसास को जिया करें । अच्छी कहानियां और कविताएँ पढ़ा करें।

अकसर वही रिश्ता लाजवाब होता है,
जो जमाने से नहीं, जज्बातों से जन्मा होता है !!

मोबाइल को साइड में रख कर अपने रिश्तों को समय देते हैं,आइए घर के बच्चों और बुजुर्गों को समय देते हैं।

कहते हैं अपने जीवन में हमें पाँच बर्ष से छोटे बच्चे और 60 वर्ष से अधिक बुजुर्गों ले साथ समय ज़रूर व्यतीत करना चाहिए इससे रिश्ते निभाने का हुनर बढ़ता है।

बच्चे जब छोटे हों उनके कान में प्यार भरा सन्देश देकर सुलाना चाहिए इससे जब वह बड़ा होता है रिश्तों में प्यार भरता है और नरम दिल होता है।

हमारी दादी ने हमें ऐसे ही बड़ा किया उनके जीवन में मुझे किताब 7 हैबिट्स ऑफ द हाइली इफेक्टिव पीपल की कयी बातें मिलीं। जिसमें सबसे प्रमुख थी रिश्तों को बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत रहना और कभी ये न इन्तिज़ार करना की सामने वाले ने मेरे लिए क्या किया बल्कि अपनी तरफ से जितना हो सकता था क्या वो मैंने सब कुछ किया !

दादी माँ से अपने दिल के रिश्ते को याद करते हुए आज प्रस्तुत है कविता – रिश्ते और आम का अचार

रिश्ते – आम का अचार

रिश्तों में, नया-ताज़ा कुछ नहीं होता।
उनमें बोरियत होती है।
एक जैसी सुबह
एक जैसी दोपहर,और शाम होती है।

फिर वही चाय,
फिर छुट्टियों में कहाँ घूमने जाएँ!
रिश्ते दादी माँ के हाथ का अचार हो जाते हैं,
जिनके बारे में सोच कर लगता है कि,
सीढ़ी घर की काठ की अलमारी में,
शीशे के बोइयाम हमेशा सजे रहेंगे।
कोई देखे न देखे।

कभी आम के टिकोले, कभी लहसुन-मिर्ची
कभी कुच्चों के गुच्छे, हमेशा बने रहेंगे
कोई सोचे न सोचे।

वो ज़रा से ढक्कन का हटना और
रेलवे के शयन कक्ष तक महक जाना,
हमेशा बना रहेगा
कोई पूछे न पूछे।

की जैसेे वो आम के अचार,
नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोत हों,
जिनकी अनवरत आपूर्ति
एक निश्चित समय में हो ही जायेगी।

की जैसे गर्मी तो फिर आएगी ही,
पेड़ों में आम भी आएंगे।
पर कौन जनता था?
एक दिन बोरियत से ज़्यादा,
दूरियों के फांस गड़ जायेंगे।

गर्मी अब भी आती है,
पेड़ों में आम भी आते हैं,
पर धूप !
धूप मेरे छठे माले की खिड़की पे,
झांक कर चली जाती है।
जैसे शिकायत कर रही हो!

“शीशियों की देखभाल की थी तुमने?,
“बस खाने की फ़िराक थी तुमको!”
“कभी सोचा था कितने मुश्किल से बनते थे,”
“कितना नमक, मिर्च-मसाला,और हाथ के बल लगते थे।”
“अब नया ताज़ा मिलता है ना!”
“भर भर कर,कारखानो से !”

मुझे इतना कुछ वाकई पता नहीं था,
बस याद है , अचार कई दिनों में बनता था।
ठहाकों में कटता था, बाल्टी भर,
घर की औरतों के कह कहों से
बीच-बीच में बुलाहट आती थी:
“जा चद्दर पसार,
खाट लगा कर आ!
छोटे वाले छत पर!”
मुंह फुला के उठती थी,
टी. वी.जो बंद करना पड़ता था
अचार की कामगारी पर।
मुझे वो बोरियत अच्छी लगती थी।
अलसायी दोपहर की ताज़ी सांस अच्छी लगती थी।
बिना बात मेरे लिए किसी की फिकर अच्छी लगती थी
अच्छा लगता था मुझे तुम्हारा दौड़कर लिपट लेना।
जैसे ये अहसास आजीवन विद्यमान रहेंगे
अचल सम्पत्ति बन कर
समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!

समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!