प्रेम को संज्ञा न समझो

प्रेम को संज्ञा न समझो

जी भर के बस तुम नाम मत लो

दो चार मेरे काम घर के

तुम भी आकर साथ कर लो

कुछ न हो तो भी खड़े रह

गिन लो मेरी चूड़ियाँ

साथ मे हो जाएगी

घर बार की बातें यहाँ

वैसे ये रूमानी नहीं है

साथ तो लेकिन यही है

फिर किसी दिन याद कर

उस दिन की बातें चाय पर

हम दोनों बैठे साथ में

हाथों को लेकर हाथ में

थोड़ा थोड़ा मुस्कराए

दिन मरुस्थल से काट आये

उसमें भी चल दूर दूर

हम दाना पानी साथ लाये

साथ दिन जितने बिताए

अब जभी भी याद आये

कोई भी शिकवा नहीं

हर पल मोहोब्बत कर निभाये।

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आधा जला पन्ना

आधा जला पन्ना

किताब का
रखना पड़ेगा सहेज
कई दिनों तक

अभिन्न अंग जो ठहरा

न जाने क्या बात थी
इसमें दर्ज
जो सालती रहेगी
याददाश्त के जाने तक

मुम्बई, 31 अगस्त , 2.31AM

प्रज्ञा

सिर्फ ज़िंदा नहीं रहना है जीना भी है

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,

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