प्रेम को संज्ञा न समझो

प्रेम को संज्ञा न समझो

जी भर के बस तुम नाम मत लो

दो चार मेरे काम घर के

तुम भी आकर साथ कर लो

कुछ न हो तो भी खड़े रह

गिन लो मेरी चूड़ियाँ

साथ मे हो जाएगी

घर बार की बातें यहाँ

वैसे ये रूमानी नहीं है

साथ तो लेकिन यही है

फिर किसी दिन याद कर

उस दिन की बातें चाय पर

हम दोनों बैठे साथ में

हाथों को लेकर हाथ में

थोड़ा थोड़ा मुस्कराए

दिन मरुस्थल से काट आये

उसमें भी चल दूर दूर

हम दाना पानी साथ लाये

साथ दिन जितने बिताए

अब जभी भी याद आये

कोई भी शिकवा नहीं

हर पल मोहोब्बत कर निभाये।

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आरे_के_पेड़_मत_काट_रे

ज़रा सोचिए
आरे के जंगलों में
जानवर भी रहते हैं
क्या वो मेट्रो चाहते हैं ?
सालों पुराने पेड़ वे
क्यों आप जागीर समझ
काटना चाहते हैं?
मनुष्य उजाड़ देते हैं
घर उन प्राणियों के
छोड़ा जिनको निर्भर
प्रकृति ने आदमी के।

घर थी न धरती हमारी भी तुम्हारी भी
माँ ने तुमको बढ़ाया होनहार बेटा बनाया
बोझ सहे हम चिड़ियाघर में रहे हम
बदले में हिस्से का जंगल हमारा काट खाया

#Deforestation #protest #Aarey

The most intelligent children of mother earth are themselves killing her.

आधा जला पन्ना

आधा जला पन्ना

किताब का
रखना पड़ेगा सहेज
कई दिनों तक

अभिन्न अंग जो ठहरा

न जाने क्या बात थी
इसमें दर्ज
जो सालती रहेगी
याददाश्त के जाने तक

मुम्बई, 31 अगस्त , 2.31AM

प्रज्ञा

Kukufmपॉड कास्ट -21अगस्त’19

सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

पॉडकास्ट की स्क्रिप्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,

हैलो दोस्तों स्वागत है आपका “शतदल” की दुनिया में
आप सुन रहे हैं भारत का बेहतरीन ऑनलाइन रेडियो एप
कुकू एफ. एम. । रात दस बजे का अंधेरा शहरों को अपने आगोश में ले सोने चला , लेकिन दिलों में रौशनी कायम है और कायम हैं “इत्मिनान के ख़्यालत” ।

बहुत ज़रूरी है जम चुकी नीरसता को तोड़ना, अपनी आराम कुर्सी में लग चुके घुन की आवाज़ को धर पकड़ना उसका खोखला होने से पहले इलाज करना बहुत ज़रूरी है। मुझे कितने ही काम सराबोर क्यों न कर दें मेरी आराम तलब तबियत रोज़ सुबह समय से चुरा कर मेज़ पर चाय और पेपर माँगती है, ऑटो से ऑफिस के रास्ते सुनते हुए गानों पर थिरकती है।

एक बार मैं अपने तीन वर्षीय लड़के को प्ले स्कूल छोड़ने निकली तो बहुत तेज़ बारिश आयी, कुछ भी करते पैदल जाते तो दोनों का भीगना तय था। एक महिला हमारे परिसर से कार लेकर निकल रही थी तो मैंने उनसे मदद मांगी और बच्चे को बारिश से बचा स्कूल भेजना हो गया। बारिश अब भी हो ही रही थी । ठीक थोड़ी देर बाद घर लौटते वक्त मुझे एक महिला और उसका बच्चा दिखे जिनके पास छतरी नहीं थी , वह अपनी तीन वर्षीय बेटी को गोद में उठा तेज़ कदम से चल रही थी की बारिश से बच जाए। यद्दपि मेरा घर पास ही था, और कार्यालय के लिए देर भी ही रही थी पर उस समय मुझे उस महिला और उस बच्ची की मदद करना ज़रूरी लगा , मेरे पास काफी बड़ा छाता रखती हूँ मैं तो दोनों को उनके गन्तव्य तक पैदल छोड़ आई। किसी ने मेरी सहायता की और मुझे किसी और की मदद कर असीम सन्तोष मिला, उसकी दो साल की बेटी भीग कर बीमार पड़ सकती थी। यह घटना परोपकार के लिए प्रेरित करती है । आखिर हम लिखते भी तो हैं खुद से ईमानदार होने के लिए । उसकी माँ ने बड़ी कृतज्ञता से धन्यवाद कहा , मेरी मदद किसी ने की मैं किसी के काम आयी।

*नित जीवन के संघर्षों से*
*जब टूट चुका हो अन्तर्मन,*

*तब सुख के मिले समन्दर का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।*

*जब फसल सूख कर जल के बिन*
*तिनका -तिनका बन गिर जाये,*

*फिर होने वाली वर्षा का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।*

*सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन*
*यदि दुःख में साथ न दें अपना,*

*फिर सुख में उन सम्बन्धों का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।*

*छोटी-छोटी खुशियों के क्षण*
*निकले जाते हैं रोज़ जहां,*

*फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।*

*मन कटुवाणी से आहत हो*
*भीतर तक छलनी हो जाये,*

*फिर बाद कहे प्रिय वचनों का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

*सुख-साधन चाहे जितने हों*
*पर काया रोगों का घर हो,*

*फिर उन अगनित सुविधाओं का*
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

यह काल जयी रचना है राष्ट्र कवि दिनकर जी की। जिसमें गीता का संदेश निहित है और साथ ही छपी है एक अनमोल सीख!

का बरखा जब कृषि सुखाने
समय बीती पुनि का पछिताने

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मार्था मेरिडोस ब्राज़ील की चर्चित लेखिका एवं पत्रकार हैं। आज अच्छा सुनने सुनाने के क्रम में चलिये पढ़ते हैं उनकी लिखी कविता का हिंदी अनुवाद

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं
______________________

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,जब आप
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
नहीं करने देते मदद अपनी,
न ही मदद दूसरों की

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,अगर आप
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
अगर आप नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार ,
अगर आप नहीं पहनते हैं अलग अलग रंग,
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं….
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रात की गहरी चादर में मीठी नींद लें स्वस्थ रहें , इंडिया के बेस्ट ऑनलाइन रेडियो एप कुकू एफ एम पर शतदल को लाइक शेयर सब्सक्राइब करें । प्रज्ञा का नमस्कार शुभरात्रि।

बधाई शतदल

नमस्कार दोस्तों,

ब्लॉग के रूप में शतदल को एक वर्ष हो गए और इसी बीच लिखते हुए धीरे-धीरे इसने 100+ दिल भी जीते।

एक मित्र ने कुछ महीनों पहले कहा की प्रज्ञा यह iblogger का कांटेस्ट आया है आप भी अपना ब्लॉग डाल दें। मैंने दो बार सोचा नहीं। डाल दिया। अपने जीवन और ब्लॉग के बारे में लिखना था । सब सच कह दिया।

बनावटी किसके लिए छोड़ के जाइयेगा जी। धरती के दिन भी गिने चुने। अमेज़न तक जल रहा अब । यही समय है अपने मन की जीने का । जी भर के मेहनत करने का।

दुनिया में अच्छा पढ़ने लिखने वालों की कमी नहीं है, पर हम खुद को कम क्यों मानें । क्यों रहें जजमेंटल की अरे मैं क्या, मैं कहाँ ,मुझसे अच्छे, मैं किस क्षेत्र से। परिणाम यह हुआ की मैंने मेरी ब्लॉग के समर्थन में पहल किया। फिर प्रेम पूर्वक कुछ लोग साथ आये उन्होंने शतदल को प्रचारित किया इस तरह सबके स्नेह से प्रतियोगिता में , ब्लॉग पांचवे स्थान पर रहा।

जीत किसी भी बात की हो। उसका जश्न होना चाहिए। मचा के होना चाहिए । अरे समझें तो जीत का स्वाद कैसा होता है , जीतकी मुस्कान कैसी होती है , ताज़गी परवान कैसे चढ़ती है!

मेरा ब्लॉगिंग सफर जुलाई 2018 से शुरू हुआ उससे पहले मैं फ़ेसबुक पर और तमाम ऑनलाइन पोर्टल्स पर अपनी कविता भेजती। फिर मित्रों में किसी ने ब्लॉगिंग का सुझाव दिया जिससे रचनाएँ एकत्रित हो सकें और मेरी बात पाठकों तक एक सिरे से जाए।
चूँकि लिखना अब सीधे स्मार्ट फोन पर हो रहा है तो एक प्लेटफार्म पर उसको सहेजने के लिए क्लाउड से बढियाँ रास्ता मुझे ब्लॉग ही लगा। मैं ब्लॉग पर अपने जीवन से जुड़े अनुभव लिखती हूँ। कविताएँ लिखती हूँ । केवल लिखने और प्रशंसा के लिए मैं नहीं लिख सकती वो भाव अंदर से आना चाहिए मेरे अंदर उस मैटर को लेकर बेचैनी होनी चाहिए और मेरे आस पास की हर बात उस समय गौण हो जानी चाहिए। ऐसे तैयार होती है एक कविता मेरी। कभी दोपहर। कभी आधी रात ओर सबसे ज्यादा मैं शुक्रगुज़ार हूँ मुंबई के ट्राफिक की। जो मुंबई की घन्टों घन्टों वाली ट्रैफिक न होती तो बेस्ट बस में बैठे मेरे ब्लॉग की गाड़ी न बढ़ी होती।
कहते हैं ये शहर हमसे हमारा सुकूँन ले लेता है लेकिन बदले में देता है नाम, हुनर और कभी न समाप्त होने वाली जिजीविषा। ये एक जारी सफर है। जब तक हूँ शतदल की यात्रा है और बड़े पैमाने पर घूमना है हमें।

मैं लंबा चौड़ा टेक्निकल नाम नहीं चाहती थी इसलिए प्यारा सा http://www.shatadal.com चयन किया। माता जी सरोज स्मृति “शन्नो” के नाम के पर्यायवाची से लिया शतदल।

अपने ब्लॉग की टैग लाइन मैंने रखी है “जो मराल मोती खाते हैं , उनको मोती मिलते हैं”।

यह पंक्ति मैंने किसी किताब में नहीं पढ़ी, पूर्णियाँ में , घर के बाड़े में सब्जियां लगाती छाँटती मेरी दादी माँ यह हमेशा दोहराती थीं , वो मुझे यही सिखाती रहीं , ज़िन्दगी से अपने हक में बेहतरीन माँगों तुमको वो बेहतरीन देगी।

मेरी सपनीली आँखें उसी बेतरीन को ढूँढती हैं, ट्रैफिक में, लोगों में, अपने पति में, अपने बच्चों में, सब रिश्तों में और खुद में। हम जो ढूढते हैं हमें वो ही मिलता है। हम जो शिद्दत से चाहते हैं वो मिलने की प्रक्रिया को सामने लाना ब्रह्मांड की प्रक्रिया पर छोड़ना होता है। ये पता होना चाहिए की हमको क्या चाहिए ।

मेरे ब्लॉग में अधिकांश कविताएँ हैं। कुछ जीवनानुभव से जुड़े लेख। सभी रचनाएं मौलिक हैं। ब्लोगिंग के लिए वर्डप्रेस का प्लेटफ़ॉर्म प्रयोग किया गया क्योंकि इसकी सुविधाएं मुझे टेक्नीकली एडवांस लगतीं हैं। इसका सर्च इंजिन ऑप्टिमाइज़शन चूंकि और प्लेटफ़ॉर्म से बेहतर है तो भविष्य में वेबसाइट का विस्तार करने पर अच्छी पब्लिसिटी भी रहेगी। यह सब ज्ञान का श्रेय मेरे कार्यालय के डेवोप्स अभियंता मितेश सोनी को जाता है। उन्होंने ब्लॉगिंग की a, b , c ,d सिखाई मुझे।

शतदल का मुख्य उद्देश्य मेरी रचनाओं को सहेजना है। अपने अनुभव लिखते और पब्लिश करते समय मैं ब्लॉग में ज़रूरी टैग डालती हूँ जिससे लोगों को कंटेंट ढूंढने में आसानी हो। ब्लॉग की भाषा हिंदी है। कॉन्टेंट स्त्री विमर्श, अध्यात्म, उत्साह वर्धक, जानकारी इत्यादि के इर्द गिर्द रहता है।

लिखने की आतुरता अपनी मम्मी सरोज से आयी, लेखन में भावनाएँ दादी के प्रेम की पिरोती रही। पापा का रौब कोशिकाओं में दौड़ता है, इसलिए हर पलड़े में ज़िन्दगी का बैलेंस लड़खड़ाते ही ज़ोर से टोकता है। इसी के इर्द गिर्द ज़िन्दगी चल रही। यहीं रहती हूँ मैं।

प्रज्ञा

साँझ

साँझ सुन्दर छटा लिए सालों से आती रही
जब साधन आये तो दिखा इठलाती रही
देख आकाश कैसा मेरे शहर में रंग ऐसा
देख सुबह ऐसी दुपहरी का आलम ऐसा
एक रोज़ बिस्तर पे जब फ़ोन पटक
खिड़की पे बस यूँ ही खड़े हुए थे
निरन्तर बदलता रहा कैनवास
रंग क्षणभंगुर कितने सुखद लगे थे
ये सुख गैलेरी का मकबरा क्या देगा
दो चार देखेंगे पांचवा भर लाइक बटन दबा देगा
न उसमें नारंगी बैंगनी से हक का रास्ता मांगेगी
न नीला आकाश अचानक लालिमा फैला सकेगा !
न छोर के परे की कल्पना होगी
न बादल नया कोई चेहरा लेगा।

प्रज्ञा

25 अगस्त 2019

2.20 AM