प्रेम को संज्ञा न समझो

प्रेम को संज्ञा न समझो

जी भर के बस तुम नाम मत लो

दो चार मेरे काम घर के

तुम भी आकर साथ कर लो

कुछ न हो तो भी खड़े रह

गिन लो मेरी चूड़ियाँ

साथ मे हो जाएगी

घर बार की बातें यहाँ

वैसे ये रूमानी नहीं है

साथ तो लेकिन यही है

फिर किसी दिन याद कर

उस दिन की बातें चाय पर

हम दोनों बैठे साथ में

हाथों को लेकर हाथ में

थोड़ा थोड़ा मुस्कराए

दिन मरुस्थल से काट आये

उसमें भी चल दूर दूर

हम दाना पानी साथ लाये

साथ दिन जितने बिताए

अब जभी भी याद आये

कोई भी शिकवा नहीं

हर पल मोहोब्बत कर निभाये।

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आधा जला पन्ना

आधा जला पन्ना

किताब का
रखना पड़ेगा सहेज
कई दिनों तक

अभिन्न अंग जो ठहरा

न जाने क्या बात थी
इसमें दर्ज
जो सालती रहेगी
याददाश्त के जाने तक

मुम्बई, 31 अगस्त , 2.31AM

प्रज्ञा

Kukufmपॉड कास्ट -21अगस्त’19

सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

पॉडकास्ट की स्क्रिप्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,

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बधाई शतदल

नमस्कार दोस्तों,

आज iblogger ने साक्षात्कार उनकी वेबसाइट पर पोस्ट किया लिंक यहाँ साझा कर रही।

मेरा साक्षात्कार पढ़ने के लिए यह लिंक क्लिक करें

ब्लॉग के रूप में शतदल को एक वर्ष हो गए और इसी बीच लिखते हुए धीरे-धीरे इसने 100+ दिल भी जीते।

एक मित्र ने कुछ महीनों पहले कहा की प्रज्ञा यह iblogger का कांटेस्ट आया है आप भी अपना ब्लॉग डाल दें। मैंने दो बार सोचा नहीं। डाल दिया। अपने जीवन और ब्लॉग के बारे में लिखना था । सब सच कह दिया।

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साँझ

साँझ सुन्दर छटा लिए सालों से आती रही
जब साधन आये तो दिखा इठलाती रही
देख आकाश कैसा मेरे शहर में रंग ऐसा
देख सुबह ऐसी दुपहरी का आलम ऐसा
एक रोज़ बिस्तर पे जब फ़ोन पटक
खिड़की पे बस यूँ ही खड़े हुए थे
निरन्तर बदलता रहा कैनवास
रंग क्षणभंगुर कितने सुखद लगे थे
ये सुख गैलेरी का मकबरा क्या देगा
दो चार देखेंगे पांचवा भर लाइक बटन दबा देगा
न उसमें नारंगी बैंगनी से हक का रास्ता मांगेगी
न नीला आकाश अचानक लालिमा फैला सकेगा !
न छोर के परे की कल्पना होगी
न बादल नया कोई चेहरा लेगा।

प्रज्ञा

25 अगस्त 2019

2.20 AM