नमस्कार दोस्तों,

आज iblogger ने साक्षात्कार उनकी वेबसाइट पर पोस्ट किया लिंक यहाँ साझा कर रही।

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ब्लॉग के रूप में शतदल को एक वर्ष हो गए और इसी बीच लिखते हुए धीरे-धीरे इसने 100+ दिल भी जीते।

एक मित्र ने कुछ महीनों पहले कहा की प्रज्ञा यह iblogger का कांटेस्ट आया है आप भी अपना ब्लॉग डाल दें। मैंने दो बार सोचा नहीं। डाल दिया। अपने जीवन और ब्लॉग के बारे में लिखना था । सब सच कह दिया।

बनावटी भाषा किसके लिए छोड़ के जाइयेगा जी। धरती के दिन भी गिने चुने। अमेज़न तक जल रहा अब । यही समय है अपने मन की जीने का । जी भर के मेहनत करने का।

दुनिया में अच्छा पढ़ने लिखने वालों की कमी नहीं है, पर हम खुद को कम क्यों मानें । क्यों रहें जजमेंटल की अरे मैं क्या, मैं कहाँ ,मुझसे अच्छे, मैं किस क्षेत्र से। परिणाम यह हुआ की मैंने मेरी ब्लॉग के समर्थन में पहल किया। फिर प्रेम पूर्वक कुछ लोग साथ आये उन्होंने शतदल को प्रचारित किया इस तरह सबके स्नेह से प्रतियोगिता में , ब्लॉग पांचवे स्थान पर रहा।

जीत किसी भी बात की हो। उसका जश्न होना चाहिए। मचा के होना चाहिए । अरे समझें तो जीत का स्वाद कैसा होता है , जीतकी मुस्कान कैसी होती है , ताज़गी परवान कैसे चढ़ती है!
मेरा ब्लॉगिंग सफर जुलाई 2018 से शुरू हुआ उससे पहले मैं फ़ेसबुक पर और तमाम ऑनलाइन पोर्टल्स पर अपनी कविता भेजती। फिर मित्रों में किसी ने ब्लॉगिंग का सुझाव दिया जिससे रचनाएँ एकत्रित हो सकें और मेरी बात पाठकों तक एक सिरे से जाए।
चूँकि लिखना अब सीधे स्मार्ट फोन पर हो रहा है तो एक प्लेटफार्म पर उसको सहेजने के लिए क्लाउड से बढियाँ रास्ता मुझे ब्लॉग ही लगा। मैं ब्लॉग पर अपने जीवन से जुड़े अनुभव लिखती हूँ। कविताएँ लिखती हूँ । केवल लिखने और प्रशंसा के लिए मैं नहीं लिख सकती वो भाव अंदर से आना चाहिए मेरे अंदर उस मैटर को लेकर बेचैनी होनी चाहिए और मेरे आस पास की हर बात उस समय गौण हो जानी चाहिए। ऐसे तैयार होती है एक कविता मेरी। कभी दोपहर। कभी आधी रात ओर सबसे ज्यादा मैं शुक्रगुज़ार हूँ मुंबई के ट्राफिक की। जो मुंबई की घन्टों घन्टों वाली ट्रैफिक न होती तो बेस्ट बस में बैठे मेरे ब्लॉग की गाड़ी न बढ़ी होती।
कहते हैं ये शहर हमसे हमारा सुकूँन ले लेता है लेकिन बदले में देता है नाम, हुनर और कभी न समाप्त होने वाली जिजीविषा। ये एक जारी सफर है। जब तक हूँ शतदल की यात्रा है और बड़े पैमाने पर घूमना है हमें।

मैं लंबा चौड़ा टेक्निकल नाम नहीं चाहती थी इसलिए प्यारा सा http://www.shatadal.com चयन किया। माता जी सरोज स्मृति “शन्नो” के नाम के पर्यायवाची से लिया शतदल।

अपने ब्लॉग की टैग लाइन मैंने रखी है “जो मराल मोती खाते हैं , उनको मोती मिलते हैं”।

यह पंक्ति मैंने किसी किताब में नहीं पढ़ी, पूर्णियाँ में , घर के बाड़े में सब्जियां लगाती छाँटती मेरी दादी माँ यह हमेशा दोहराती थीं , वो मुझे यही सिखाती रहीं , ज़िन्दगी से अपने हक में बेहतरीन माँगों तुमको वो बेहतरीन देगी।

मेरी सपनीली आँखें उसी बेतरीन को ढूँढती हैं, ट्रैफिक में, लोगों में, अपने पति में, अपने बच्चों में, सब रिश्तों में और खुद में। हम जो ढूढते हैं हमें वो ही मिलता है। हम जो शिद्दत से चाहते हैं वो मिलने की प्रक्रिया को सामने लाना ब्रह्मांड की प्रक्रिया पर छोड़ना होता है। ये पता होना चाहिए की हमको क्या चाहिए ।

मेरे ब्लॉग में अधिकांश कविताएँ हैं। कुछ जीवनानुभव से जुड़े लेख। सभी रचनाएं मौलिक हैं। ब्लोगिंग के लिए वर्डप्रेस का प्लेटफ़ॉर्म प्रयोग किया गया क्योंकि इसकी सुविधाएं मुझे टेक्नीकली एडवांस लगतीं हैं। इसका सर्च इंजिन ऑप्टिमाइज़शन चूंकि और प्लेटफ़ॉर्म से बेहतर है तो भविष्य में वेबसाइट का विस्तार करने पर अच्छी पब्लिसिटी भी रहेगी। यह सब ज्ञान का श्रेय मेरे कार्यालय के डेवोप्स अभियंता मितेश सोनी को जाता है। उन्होंने ब्लॉगिंग की a, b , c ,d सिखाई मुझे।

शतदल का मुख्य उद्देश्य मेरी रचनाओं को सहेजना है। अपने अनुभव लिखते और पब्लिश करते समय मैं ब्लॉग में ज़रूरी टैग डालती हूँ जिससे लोगों को कंटेंट ढूंढने में आसानी हो। ब्लॉग की भाषा हिंदी है। कॉन्टेंट स्त्री विमर्श, अध्यात्म, उत्साह वर्धक, जानकारी इत्यादि के इर्द गिर्द रहता है।

लिखने की आतुरता अपनी मम्मी सरोज से आयी, लेखन में भावनाएँ दादी के प्रेम की पिरोती रही। पापा का रौब कोशिकाओं में दौड़ता है, इसलिए हर पलड़े में ज़िन्दगी का बैलेंस लड़खड़ाते ही ज़ोर से टोकता है। इसी के इर्द गिर्द ज़िन्दगी चल रही। यहीं रहती हूँ मैं।

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प्रज्ञा