आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,

अंधेरा शहरों को अपने आगोश में ले सोने चला , लेकिन दिलों में रौशनी कायम है ।

ज़रूरी है नीरसता को तोड़ना, आराम कुर्सी से आती घुन की आवाज़ को धर पकड़ना। खोखला होने से पहले इलाज करना। कितने ही काम क्यों न सर पर रहें , आराम तलब तबियत, सुबह-सुबह समय से चुरा कर मेज़ पर चाय और पेपर माँगती है, रेडियो के गानों पर थिरकती है।

एक दिन की बात है मैं बेटे को प्ले स्कूल छोड़ने निकली तो बहुत तेज़ बारिश शुरू हो गयी थी, पैदल जाते तो दोनों का भीगना तय था। एक महिला हमारे परिसर से कार लेकर निकल रही थी, मैंने उनसे मदद मांगी और बच्चे को बारिश से बचा स्कूल भेजना हो गया। बारिश अब भी हो ही रही थी । ठीक थोड़ी देर बाद घर लौटते वक्त मुझे एक दूसरी महिला और उसका बच्चा दिखे जिनके पास छतरी नहीं थी , वह अपनी तीन वर्षीय बेटी को गोद में उठा तेज़ कदम से चल रही थी की बारिश से बच जाए। मुझे कार्यालय के लिए देर हो रही थी, पर उस समय मुझे उस महिला और उस बच्ची की मदद करना ज़रूरी लगा , मेरे पास काफी बड़ी छतरी थी जिसमें दोनों को उनके गन्तव्य तक पैदल छोड़ आई।

किसी ने मेरी सहायता की और मुझे किसी और की मदद कर अच्छा लगा, उसकी दो साल की बेटी भीग कर बीमार पड़ सकती थी। उसकी माँ ने कृतज्ञता से धन्यवाद कहा , मेरी मदद किसी ने की मैं किसी के काम आयी।

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,

तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,

फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,

फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहां,

फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,

फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,

फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

काल जयी रचना, राष्ट्र कवि दिनकर जी की। जिसमें गीता का संदेश निहित है और साथ ही छपी है एक अनमोल सीख!

का बरखा जब कृषि सुखाने
समय बीती पुनि का पछिताने

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मार्था मेरिडोस ब्राज़ील की चर्चित लेखिका एवं पत्रकार हैं। आज अच्छा सुनने सुनाने के क्रम में चलिये पढ़ते हैं उनकी लिखी कविता का हिंदी अनुवाद

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं
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आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,जब आप
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
नहीं करने देते मदद अपनी,
न ही मदद दूसरों की

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,अगर आप
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
अगर आप नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार ,
अगर आप नहीं पहनते हैं अलग अलग रंग,
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं….