गणेश चतुर्थी के दिन हम मैथिल ब्राह्मण चौर चन पर्व मनाते हैं। पिछले साल धूम-धाम थी लेकिन इस बार मम्मी जी गाँव में हैं तो केवल फल लेकर चाँद देखने का इंतजाम कर लिया गया ।जिनके यहाँ डेढ़ दिन के गणपति स्थपित हैं उनके उधर जाना हो रहा। गत वर्ष तक अपने घर में ही भोज-भात आयोजित रहता। सास चौर चन सजाती और मैं खाने की मेज़।

खूब उत्साह रहा, तीन दिन की छुट्टी मिली। कुछ पंडाल घूमे अब सप्ताहांत में जाना होगा । क्या पहनूं यह भी सोचना एक काम है। जब जब अलमारी ठीक करो, तब तब – “कुछ भी नहीं है” से “कयी विकल्प हैं” की स्थिति रहती है कुछ दिन।

आज सास-सुसर को मिस किये, साथ मे ठेकुआ , पीड़िकिया , पुआ बनाते थे। सुसर जी काम -काजी बहु का उत्साह वर्धन करने के लिए सब बात में “बहुत सुंदर, बाह, एक नम्बर बनेलखिन, सौ में एक सौ एक” बोलते थे ।
आज के दिन चना दाल का पराँठा, आलू गोभी का सब्जी, “ओल का चटनी” बनता है। इतना सब याद नहीं आता अगर अभिनव के घर निमंत्रण भोज पर ओल की चटनी नहीं होती तो।

पिछले सात वर्ष जो ऊर्जा मैंने मम्मी जी के साथ चौर चन मनाने में लगाई वह ऊर्जा इस बार केवल घर की साफ सफाई में लगी ऐसे जैसे लोग दीवाली की सफाई करते हैं।

एक बार एक आदमी मुझसे थोड़ी देर तक बात करने के बाद पूछता है, आपने अपनी मम्मी का ज़िक्र नहीं किया। नहीं किया था क्योंकि मम्मी नहीं थी।सास का ज़िक्र होता है, क्योंकि वो है।इंटरेस्ट भी लेती है, लाइफ में।

ईशा की हर बात में माँ का ज़िक्र आता है, वो उनके साथ रही। जो जिनके साथ रहे या रह रहे उनकी चर्चा होगी। साथ रहना आवश्यक है। साथ में साथ कैसा भी हो। बात उन्हीं की होगी जो साथ थे।