डायरी 3 सितंबर 2019

हम सभी को पता होता है हम क्या करना चाहते हैं, बस उसे नज़रंदाज़ कर कुछ और करना तब तक करते रहते हैं जब तक अपने अंदर कुछ टूट नहीं जाता और लौटना नामुमकिन नहीं हो जाता। तुम जो जानती हो उसको मनन करो। आदमी का दिमाग सब जीवों में स्वयंभू भी है। हमने भगवान बनाये हैं, अपने जीवन का भी दर्शन कर ही लोगी।

प्रज्ञा

क्षणिका- जज लोया की आत्मा

जनाब!

कोर्ट रूम हथौड़ा प्राधिकार का प्रतीक है।
न्यायिक कार्यवाही को रोक देने और
शान्त व्यवस्थित करने में सटीक है।
लोकतंत्र का तीसरा स्तम्भ न्यायपालिका
क्या भारत में सम्प्रभु और निर्भीक है?

*जज_लोया_की_आत्मा*

PC – गूगल

तलाश

आँख बंद करने पर
माथे के बीचों बीच
सफेद रौशनी उगती है
वो एक गली पकड़ती है
आस-पास लोग खड़े हैं
ताकते हैं जैसे
चलता आदमी गुनहगार हो।

वो रौशनी और वो गली
यूँ सिकुड़ कर बिन्दू में
सिमट गयी कि जाने राहगीर का
क्या हाल हुआ होगा।

नये मंज़र आने से पहले आवाज़ें आती हैं कि
अब और भ्रम में जिया नहीं जाता।

सड़क पर, घर में,
छत पर, चौराहे में
आप कहीं भी हों
जिसके बारे में
बात नहीं होती
वो नज़ारा सामने से
हटाया नहीं जाता।

जहाँ देह जा नहीं सकती
वहाँ मन दौड़ता है
क्या कुछ खोजने के लिए।

अंत: में इतनी कीलें हैं और उनपर टँगी
प्लास्टिक थैलियों का अंबार की
अब खुद को तलाशने में
वक्त ज़ाया किया नहीं जाता।

*प्रज्ञा*

11 May 2019

शनिवार