तब केवल हिंदी आती थी

मुझे कक्षा सात-आठ के दिनों में अंग्रेज़ी में पूरे पूरे विषय को समझने में कठिनाई होती थी। “द हैबिटैट”, “मैगनेटिज़्म” जैसे विज्ञान के चैपटर्ज़ समझ ही न आता था की कहना क्या चाहते हैं। इतिहास, भूगोल , नागरिक शास्त्र हिंदी में थे। कहानी की तरह पढ़ जाती, आज भी ये तीन विषय कक्षा दस तक के बच्चों को एक फीचर फ़िल्म की तरह पढ़ा सकती हूँ ।

विज्ञान अंग्रेज़ी में होने के कारण रूचि कम रही और पहाड़ जैसा लगता था।अंग्रेज़ी की विज्ञान की किताबों को समझने के लिए मैंने भारती भवन की हिंदी मीडियम की विज्ञान की किताबों को घर बैठ कर पूरा पूरा पढ़ा था और अरुण अंकल के माध्यम से समझ बढ़ाई थी। समझ आने के बाद उत्तर लिखने के लिए अंग्रेज़ी के वाक्य बनने लगे थे। बहुत सालों तक गणित में भी मुझे वर्ड प्रॉब्लम में दिक्कत आयी। वाक्य में करना क्या है समझ ही नही आता था।

एक बार एक आँटी बोलीं प्रज्ञा मेहनती है, लेकिन इंटेलिजेंट नहीं है। शायद इसलिए कि मैं धारा प्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल सकती थी, न ही अच्छा लिख पाती थी । मैंने गर्मी की छुट्टियों में तीन लाइन की कॉपी में खूब इंग्लिश करसिव प्रैक्टिस किया यही कुछ कक्षा छः से कक्षा आठ तक। इसी दौरान दादा जी के साथ “रेन एंड मार्टिन” से खूब ट्रांसलेशन भी बनाये। बहुत जान पर आती थी ट्रांसलेशन बनाते टाइम , दादा जी डाँटते भी कड़क थे। वो कहाँ अंग्रेजों के ज़माने के सीखे ।

मेरे हिसाब से बहुत सारे बिहारी बच्चों को अंग्रेज़ी के कारण ये ही समझ नहीं आता कि उनको अपने भविष्य का करना क्या है। अंग्रेज़ी से ही सब शुरू होगा या हिंदी से साख बना के अंग्रेज़ी बाद में पिक अप हो सकती है। खैर हिंदी सीखने का इतना प्रयास किये होते इतना तो क्या बात होती।

कक्षा नौ दस में दुबएन्दू बिस्वास सर और बैजू सर ने काफी मदद की तो अंग्रेज़ी बेहतर होती गयी।

9वीं और 10वी में अब लगा हिंदी में तो बड़ी समस्या हो गयी , शब्द भंडार घटा सो अलग , अध्याय में महादेवी वर्मा, नागार्जुन , निराला , दिनकर जी की कविताओं का क्या किया जाए कैसे समझा जाये कुछ नहीं पल्ले पड़ता था। शब्दार्थ , भावार्थ, गूढ़ार्थ खुद के लिखे उतने अच्छे नहीं लगते थे।

तब मैंने कक्षा नौ और दस में गणित के अलावा केवल हिंदी का ट्यूशन लिया था । दरभंगा में कुँवर सर से हिंदी पढ़ते हुए रचनात्मक ढंग से हिंदी लिखने की प्रवृत्ति बढ़ी थी। निबंधों में अपनी रचित छोटी छोटी कविताएँ आने लगीं थीं। हिंदी हमेशा पसंद रही तो सर से पढ़ना ऐसा हुआ जैसे साँप-सीढ़ी के खेल में आप 25वें घर से सोझे 94वें घर पे पहुँच गए।

सी. बी. एस. ई. से साल 2002 में हिंदी में 94/100 अंक लाने के लिए “पॉइंट वन ” मेरिट सर्टिफिकेट मिला था। मेरे लिए बहुत खुशी का दिन था। उसके बाद जो जैसे होता गया सामने आता गया करती गयी , मुझे कभी नहीं पता था मुझे आगे क्या करना है ।आज भी नहीं पता। लेकिन ग्यारवीं से हिंदी ऐसी छूटी की एक किताब कभी नहीं उठाई। हिंदी केवल डायरी में चलती रही।

2003 में रांची, डोरंडा के एक फोन बूथ पर कलम खरीदने गयी थी। आज कल कोई पेन नहीं चला के देखते तब देखते थे। देखने के लिए कुछ लिखना था तो गोजड़-गोजड़ करने के बजाय हिंदी में अपना नाम ‘प्रज्ञा’ लिखे जो मेरे लिए एक साधारण बात थी। दुकान वाला पैसे लेते बोला की वो दस साल से दुकान चला रहा था कोई आज तक यूँही लिखने के लिए हिंदी में नहीं लिख कर गया।

दिल्ली में अपनी कविताएँ लिख कर कॉलेज में बोलती सुनाती तो सब कहते इसे आगे बढ़ाओ । पर केमिस्ट्री की आड़ में हमेशा कतराती रही की मुझे तो अभी ये पढ़ना है। दिल्ली में रहते हुए मैंने कभी वहाँ की हिंदी की भव्य दुनिया से जुड़ने का सोचा ही नहीं, दिमाग में आया भी नहीं।

साल 2009, मुंबई में अपनी कम्पनी के अन्य सदस्यों के साथ लंच कर रही थी, मिनाज़ सर बात चीत के दौरान बोले भई अब हिंदी कक्षा एक से ही पढ़ाई जाएगी डबल मेहनत है। मैंने इस वाक्य का मतलब नहीं पूछा बस मूँह देखती रही थी। मैं तो बिहार से थी। मेरे लिए अ आ , A B से पहले आया था। मुझे क्या पता कि बारह खड़ी कठिन होती है और उसे पढ़ना मेहनत का काम है । मैंने बाद में लोगों से समझा की हिंदी बेल्ट को छोड़ कर और कहीं हिंदी पहले नही पढ़ते। उस दिन एक मेंढक अपने कूँए से बाहर आया था और मैथिली की तरह मराठी के रूप में फल फूल रही हिंदी की एक शाखा की भव्यता को समझा था।

पता नहीं मैंने कोर्स से इतर हिंदी के महान लेखकों की किताब क्यों नहीं पढ़ी । मैं बस अंग्रेज़ी की किताबें पढ़ती रही। मोटिवेशनल सीरीज़ की शुरुआत शिव खेड़ा से की थी। हिंदी में कादम्बिनी ,गृहशोभा, वनीता, सहेली की कहानियाँ भर-भर के पढ़ीं क्योंकि दादी माँ वही ऑर्डर करती। पापा मेरे लिए रीडर्स डाइजेस्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स फ़ॉर यू ऑर्डर करते थे। वही पढ़ते रहे।

दादी माँ कहती थी जब वो हमारे उम्र की थी तब ऐसे माँ-बाप के सामने लेट कर मैगज़ीन पढ़ना बुरी बात मानते थे और हँसने लगती थी।

मेरा बैकलॉग पिछले कई सालों का है, कई सालों तक पढ़नी पड़ेगी हिंदी तब जाकर शायद कुछ ऐसा लिख सकूँ जिससे मुझे तसल्ली मिल पाए।

हिंदी दिवस की शुभकामाएं।

3 thoughts on “तब केवल हिंदी आती थी

  1. बहुत सुंदर
    यह एक तथ्य है जो बड़े शहरों में रहने वाला प्रत्येक हिंदीभाषी जीवन के किसी न किसी मोड़ पर महसूस करता ही है। कई बार सोचना पड़ जाता है जब कोई हिंदी पट्टी का व्यक्ति हिंदी में लिखी किसी पंक्ति को देखकर ऐसे रिएक्ट करता हो जैसे किसी पारग्रही भाषा से पल्ला पड़ गया हो

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