मैंने यह महसूस किया है, रचना करने की ऊर्जा के क्रम , या कला को साधने के क्रम में लेखक / लेखिका या कलाकार कुछ और ही हो जाते हैं , फिर थोड़ी देर बाद आम आदमी के शरीर मे लौटते से उनकी सभी दुर्बलताएँ वापस आ जातीं हैं।

उदाहरण के तौर पर, पैसे मांगने की लत होना, व्यसन करना, गाली गलौच करना, हाथ उठाना, अपने बच्चे न संभालना, जीवनसाथी/शादीशुदा जीवन को बोझ समझना, अचानक कहीं चले जाना, एक नया समाज बना लेना अपने इर्द गिर्द, सब वाह वाह कर रहे हैं , अचानक वे सबके लिए जिंदादिल, अचानक वे फिर गायब अपनी खोह में।

लेकिन कोई होता है जो इतिहास जानता है उनका, की —यह लेखक /यह लेखिका , या गायक या गायिका या कलाकार …अंदर से कलुषित हैं, कुंठित हैं इसने अपने दिमाग की विकृतियाँ अपने से कमज़ोर पर कैसे उतारी।

उनमें से कुछ आप बीती बता देने की हिम्मत जुटा पाते हैं, कुछ लोग डर और इज़्ज़त के भय से आजीवन चुप रह कर दोबारा हिसाब चुकता करने वापिस आते हैं।

कुछ लोग गहरी साँस लेकर माफ कर देते हैं और आज़ाद हो जाते हैं ।

जो आज़ाद हो गए उन भयावह अनुभवों से उनका भी बड़ा भव्य मनोविज्ञान था ।

माफी देते हुए वे देख रहे थे एक बच्चा जिसके अभिभावक ने उसे इज़्ज़त न दी, घुड़कियाँ दीं, लात दी, बेदखल किआ , बेइज़्ज़त किया , वे देख रहे थे एक बच्चा जिसकी परवरिश का कोमलता से कोई लेना देना न था, वे देख रहे थे गरीब भारत में जिजीविषा रखता हालात से लड़ता एक बच्चा, सभी सुविधाओं प्रेम से वंचित, अंदर एक घुमड़ता आक्रोश अट्टहास में दबाए एक बच्चा जो अंत में कुंठित भी था और अपनी आनुवंशिकी में वही पुराना समाज लपेट कर अब वृद्ध हो गया था। ये महज़ मनोविज्ञान है इसका व्यवहारिकता से क्या लेना देना।

कुछ कलाकार वैसे ही होते हैं , जैसे सिएरा लियोन की खदानों से निकला ब्लड डायमण्ड, कितना कीमती कितना इन डिमांड लेकिन उसे खोजने में कितना खून बहाया गया मासूमों को तड़पाया गया । ग़ौरतलब है उसकी कला फिर भी बिकनी बंद नहीं होती, वो हीरा बिकना बंद नहीं होता । ये व्यवहारिक है।

Pragya

9 Jan 2019