स्त्री

हमारे आस पास स्त्रीयों के बहुत प्रकार मिलेंगे,
जिनमें मल्टीटास्किंग एक आम कड़ी दिखेगी आपको।
घरेलू हो, नौकरी पेशा हो, खिलाड़ी हो या सेना में,
निरन्तर पुरूष प्रधान समाज में खुद को बेहतर साबित करने का बीड़ा उठा कर ही आगे बढ़ती आयीं हैं स्त्रियाँ।

वैज्ञानिक तौर पर यद्यपि औरत के मस्तिष्क का औसत आकार पुरूष से कम है परंतु संयम और ध्यान केंद्रित करने वाले कामों में अधिक निपुण होने के कारण वह दोनों लिंगों में अधिक दक्ष साबित हुई और सशस्क्त तो ख़ैर है ही। एक बच्चे को जन्म देने समय प्रसव की पीड़ा में वो एक साथ 32 हड्डियों के टूटने के बराबर का दर्द झेलने का साहस रखती है।

आदमी के ईगो को सहलाना उसे घर परिवार समाज मे अहले दर्जे का दिखाने का काम भी स्त्रियों ने ही किया है। व्यक्ति की पहली सोच एक महिला से शुरू होती है वो ही बुद्धि की सृजन कर्ता है इसलिए पूरे समाज की विचारधारा को दिशा देने का कार्य भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से वो स्वयं ही करती है।

स्त्री ने खुद को पहले एक प्रेम पाश में बंधा फिर उसने दासता स्वीकारी और वह दलित कहलाई गयी , ये दुहिता की संज्ञा उसके गुणों के कारण नहीं बल्कि कालांतर में उसका दोहन होते रहने के कारण अधिक प्रचलित होती रही।

अस्सी के दशक में वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में और कॉमरेड सफ़दर हाशमी जो कि जनम(जन नाट्य मंच) के संस्थापक थे उन सरीखे आंदोलन कारियों की आवाज़ ने स्त्री मुक्ति महिला सशक्ति करण का बीज बोया । नुक्कड़ नाटक औरत के माध्यम से औरत को उसके पास हनुमान-वरदान होने का आभास कराया गया और बताया की उसे बोलने का हक है क्योंकि उसके भी लब आज़ाद हैं।

समय समय पर आज़ाद ख़्याल औरत को एक सभ्य समाज के लिए खतरा माना गया है । पुरूष प्रधान समाज ने उसके लिए दमन चक्र चलाये हैं। उसे नीति और प्रथा का नाम देकर अपने अपने मानदंड से प्रताड़ित किया है।

औरत ने भी अपनी मानसिक और सामाजिक दासता स्वीकार कर जीवित रहने पर बल दिया।वह रोई चिल्लाई , और निकालती गयी भड़ास , सखियों की मंडलियों में और कीर्तनों में आंसू बहा कर और तालियाँ पीट कर।

औरत डार्विन का एक्सपेरिमेंट है, वो सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट पर जीता जागता उपन्यास है उसने हालात के सभी विष पी कर अपने आप को नया स्वरूप दिया है।

अपने नए स्वरूप में औरत अपने आप को हालात का मारा हुआ नहीं घोषित करती । वो ज़िन्दगी के रंगों को इसी एक जन्म में जी लेने का अर्थ समझती है। खुल का विचारों का आदान प्रदान करना जानती है। अस्सी नब्बे के हिप्पी युग से ऊपर उठ कर उसके लिए सिगरेट पी लेना और शराब पीने की आज़ादी होना आज़ाद होना नहीं। वो अपनी पसंद नापसन्द जीवन साथी चयन करने की स्वतंत्रता, व्यवसाय, पठन पाठन की स्वतंत्रता , स्त्रीत्व को स्त्री की तरह जीने देने को असली स्वत्रंता समझती है।

खुश हाल शादी शुदा जीवन में यौन सम्बन्ध की महत्ता भी समझती है,पीरियड्स में अपना ख्याल रखना ज़रूरी समझती है, पैसों का अपने रूप सौंदर्य स्वास्थ पर सही खर्च और हड्डियों में विटामिन डी के महत्त्व को समझती है।

आज व्व अगर अपने पति के लिए क्षण में प्रेमिका क्षण में केयरिंग माँ का रोल निभाती है तो ये पक्का करती है कि उसका पति उसकी गलतियों को एक बाप की तरह समेटे भी ।
औरत अब उड़ान चाहती है। स्पोर्ट्स, नृत्य कला, गायन, वादन , मंच संचालन, स्टार्ट अप , राजनीति न जाने कितने पायदान हैं जो हमेशा से उसके लिए भी उतने ही खुले हैं।

इंदिरा नूयी जब अवार्ड जीत कर आती थीं तो भी उनकी वैसी वाह वाही न होती जितनी उनके पति के जीतने पर होती तो इस बात से व्व हताश नहीं हुईं उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में अपने घर वालों से अपने हिस्से की बधाई छीनी और अपने कल को अपने मुताबिक खड़ा किया।

स्त्री सृजन करती है। वो ही निरर्धारित करती है समाज की दिशा।स्त्रियाँ मुखर हो गयीं हैं क्योंकि वो पढ़ कर एक बराबर इंसान होने का दावा पेश करने लगीं हैं। उसकी कोख से जनमता पुरूष भी नई सोच लेकर जनम रहा है।

3 thoughts on “स्त्री

  1. खैर लेख तो अपने आप में सराहनीय है,आपका प्रयास स्तुत्य है। मैम आपकी क्रांतिकारी विचारधारा आज की स्त्रियों के लिए किसी वरदान से कम नही है। आपकी एक बात मुझ जैसे इंसान के हृदय के धरातल पर जम गई और वो 32 अस्थिपंजरों के टूटने का दर्द और उससे उपजे दर्द का सहन। धन्यवाद देते हुए मैं यही कहूंगा कि मेरी माताएं बहने अपने भारतीय गरिमा व उसके गरिमामय सिद्धान्तों का पालन करते हुए भारतीयता को नया आयाम और पहचान देंगी। तथा इस अंधकारमय समाज को भी संभालने में विपुल सहयोग करेंगी इसी को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण स्त्रीशक्ति को नमन!!!

    Like

  2. खैर लेख तो अपने आप में सराहनीय है,आपका प्रयास स्तुत्य है। मैम आपकी क्रांतिकारी विचारधारा आज की स्त्रियों के लिए किसी वरदान से कम नही है। आपकी एक बात मुझ जैसे इंसान के हृदय के धरातल पर जम गई और वो 32 अस्थिपंजरों के टूटने का दर्द और उससे उपजा दर्द का सहन। धन्यवाद देते हुए मैं यही कहूंगा कि मेरी माताएं बहने अपने भारतीय गरिमा व उसके गरिमामय सिद्धान्तों का पालन करते हुए भारतीयता को नया आयाम और पहचान देंगी। तथा इस अंधकारमय समाज को भी संभालने में विपुल सहयोग करेंगी इसी को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण स्त्रीशक्ति को नमन!!!

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.