आज गूँज साहित्यिक समूह के दो मित्र अनुपम और प्रवीण जी से मिलना हुआ । कई किताबों और हिंदी युग्म नई हिंदी के लेखकों पे चर्चा हुई। अच्छा रहा आज रविवार । प्रवीण जी की डार्विन जस्टिस पढ़नी है अब, बिहार और नक्सल पृष्ठभूमि के साथ क़ई महत्त्व पूर्ण घटनाओं को समेटती है उनकी किताब ज़्यादा को पढ़ कर ही लिखा जा सकेगा।

मैंने और अनुपम ने प्रवीण जी को काव्यांकुर 7 भेंट स्वरूप दी जो बात चीत के उत्साह में मेरे घर पर ही छूट गयी।
चर्चा का सिलसिला किशोर जी की लेखन शैली से शुरू हुआ की कितनी सीखने वाली बातें हैं , फिर अंकिता जी की ऐसी वैसी औरत की कहानियों के पात्रों पर बातें हुईं की वह किताब कितने सटीक शब्दों में अपनी बात कह पा रही है।
गूँज साहित्यिक समूह के अन्य मित्रों को याद किया, ज़ाहिर है एडमिन महोदय मुकेश जी की बातें तो होनी ही थीं।
साम्यवाद सफल या असफल चर्चा हुई जो बर्लिन की दीवार के गिरने जैसे तथ्यों पर आ गयी और लगा कि भई अब भूख लगी तो खाना होना चाहिए।

आज खाने में मैंने वेज कोफ्ता, दाल तड़का, शिमला मिर्च की सब्ज़ी बनाई , आराधना ने स्वादिष्ट बैगन का चटपटा चोखा बनाया जिसको टेस्ट कर लिट्टी याद किया हमने।

एक ही रूचि के लोगों से मिलने का उत्साह बहुत अच्छा होता है। जिस तरह की चर्चाएं होती हैं मानसिक स्तर पर मेल खाती बातें और फिर बातों से निकलती और बातें की समय का पता भी नहीं चलता। अब तो इतने फेसबुक मित्र , आपस में हम सभी को जानने लगें हैं कि उनके बारे में बात ऐसे होती है कि जैसे कोई परिवार के सदस्य ।

#शानदार_रविवार