लोकोक्तियाँ

#लोकोक्तियाँ

गाँव-देहात, शहर-बजार में आते-जाते बहुत सारी लोकोक्ति सुनने को मिलती रहती है।

लोकोक्ति-साहित्य का पहला प्रयोग, घर के बुजुर्गों से शुरू होता है। जैसे मेरी दादी माँ कहा करती थीं:

लाद दिय लदा दिया लदन पुर के पहुँचा दिय।

“मतलब इन आलसी महारानियों/महापुरुषों के सारे काम भी कर दो और काम का लॉग बुक यानी रेकॉर्ड भी मेन्टेन कर दो।”

यह सुनकर मैं हँस देती और धोए कपडे फैलाना , समेटना, डस्टिंग करना, अपना कमरा इत्यादि लगा कर रखना जैसे काम कर लेती। टीनेज में यदि दादी ने मुझे तुनक कर बोला होता कि मैं तो बड़ी महारानी मेरे कपड़े वगैरह भी उनको ठीक करने पड़ते, धोती तो ढंग से कपडे फैलाती नही, पढ़ती तो किताब समेटती नहीं वगैरह तो मैं तो सीधा जवाब दे देती , पर वो बड़ी समझदार थीं कनखिया के फकड़ा मुहावरा जड़ती थीं कि हँसकर खुद ही कर लेते हम ।

तो कभी कभी वो कहती थीं:

“सावन के जन्मल भादो में कहै छै एहन बाढ़े नै देखलौं।”

मतलब अभी की जन्मी लड़की ज़रा सी घटनाएं जीवन में देख देख कह रही की इससे बड़ा तो कुछ देखा ही नहीं। जबकी उसके दुनिया मे आने से पहले, समझ बढ़ने से पहले ये सारी बातें हो होती आयीं हैं। यह तब होता जब मैं अपनी अल्पज्ञता के मारे घबराहट में किसी घटना को देख कर बाप रे बाप मचा मचा कर वणर्न करती।

तीसरी लोकिक्ति:

अक्का सँ चक्का साँय के काहलौं, दौड़ हो कक्का

मने किसी स्थिति में दबाव में आगए और ऐसा दबाव में आये की रिश्ते नाते तक याद न रहे। यानी एक्ज़ाम था साइंस का सोशल स्टडी याद कर के चले गए। या फिर गली नुक्कड़ से कनसुनि बात पर भरोसा किया और आगे मैया कर के धड़फड़ा गए हड़बड़ी में गड़बड़ी कर गए।

अनुभव के आधार पर
बुनी जाती है लोकोक्तियाँ
पीढ़ी दर पीढ़ी यात्राएं करती
ज़बानी फलती रहती हैं लोकोक्तियाँ
सटीक मौकों पर निकलने के लिए
व्यंग्य के बहाने से बताने के लिए
प्रयोग की जाती हैं लोकोक्तियाँ

अभी पिछले ही वीकेंड मैं और मेरे पति घर की कुछ बातों का मुआयना कर रहे थे तो हमने समझा की पिछले पाँच सालों में बेडरूम और हॉल का पंखा तो कई दफ़े साफ किया पर किचन के पंखे की बारी तो सालों दीवाली में भी नहीं आयी।

“सुनते हैं, वो गंदा ही नहीं होता!”

“भागवान! तो वो गन्दा क्यों नहीं होता?”

वो इसलिए की चलता कम है, हवा कम काटता है और ऊपर उठती गन्दगी उससे नहीं चिपकती। तो कम चलने कम काम करने और कम प्रयुक्त होने के कारण वह चमचम नया-नया सा बना रहता है।

किचन को मैथिली (उत्तर बिहार की प्रचलित भाषा) में कहते हैं भंसागघर तो इसे अगर देसी बात की तरह बोलें तो ये मज़ेदार टिप्पणी बनती है कि:

हमें कुछ भी होना चाहिए जीवन में भंसागघर का पंखा नहीं होना चाहिए।

जीवन मे शो पीस बन कर रहने से चकाचक तो दिखते हैं लेकिन माथे पर अनुभव की रेखाओं का बल नहीं ठहरता, न तो हमसे किसी को सुख का अनुभव ही होता है। तो हम सबको तय करना होगा की हम कैसे जीवन में दूसरों के काम आएं, खुद पर शिकन लें । न की कोने में सुख साध कर ख़ूबसूरत परन्तु अनुभवहीन दिखते रहें।

तो कहीं आप जीवन में भँसाघर का पंखा तो नहीं बन रहे!

चेक! चेक! 😃 #भंसाघर_का_पंखा_होना

वैसे अगर आपने यह ब्लॉग पढ़ा है तो कमेंट सेक्शन में अपनी सुनी लोकोक्तियों को लिख दें ताकि उन्हें भी मैं ब्लॉग में एड कर लूँ !

Desk ❤️

पहले मेरी मेज़ यूँ ही कुछ उलझे हुए माउस, की बोर्ड और लैपटॉप चार्जर की छावनी भर थी जिसे दिन ख़त्म होते खेमे में वापिस ले लिया जाता है। फिर धीरे धीरे मुझपर दीपिका कोलस्कर का प्रभाव पड़ा और मैंने रंगों को सहेजना शुरू किया।

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