भन्साघर का पंखा होना

गाँव-देहात, शहर-बजार में आते-जाते बहुत सारी लोकोक्ति सुनने को मिलती रहती है।

लोकोक्ति साहित्य का पहला प्रयोग, घर के बुजुर्गों से शुरू होता है। जैसे मेरी दादी माँ कहा करती थीं:

लाद दिय लदा दिया लदन पुर के पहुँचा दिय।

Continue reading

Desk ❤️

पहले मेरी मेज़ यूँ ही कुछ उलझे हुए माउस, की बोर्ड और लैपटॉप चार्जर की छावनी भर थी जिसे दिन ख़त्म होते खेमे में वापिस ले लिया जाता है। फिर धीरे धीरे मुझपर दीपिका कोलस्कर का प्रभाव पड़ा और मैंने रंगों को सहेजना शुरू किया।

Continue reading