भन्साघर का पंखा होना

गाँव-देहात, शहर-बजार में आते-जाते बहुत सारी लोकोक्ति सुनने को मिलती रहती है।

लोकोक्ति साहित्य का पहला प्रयोग, घर के बुजुर्गों से शुरू होता है। जैसे मेरी दादी माँ कहा करती थीं:

लाद दिय लदा दिया लदन पुर के पहुँचा दिय।

“मतलब इन आलसी महारानियों/महापुरुषों के सारे काम भी कर दो और काम का लॉग बुक यानी रेकॉर्ड भी मेन्टेन कर दो।”

एक और देखें तो:

“सावन के जन्मल भादो में कहै छै एहन बाढ़े नै देखलौं।”

मतलब अभी की जन्मी लड़की ज़रा सी घटनाएं जीवन में देख देख कह रही की इससे बड़ा तो कुछ देखा ही नहीं। जबकी उसके दुनिया मे आने से पहले, समझ बढ़ने से पहले ये सारी बातें हो होती आयीं हैं।

तीसरी लोकिक्ति:

अक्का सँ चक्का साँय के काहलौं, दौड़ हो कक्का

मने किसी स्थिति में दबाव में आगए और ऐसा दबाव में आये की रिश्ते नाते तक याद न रहे।

अनुभव के आधार पर

बुनी जाती है लोकोक्तियाँ

पीढ़ी दर पीढ़ी यात्राएं करती

ज़बानी फलती रहती हैं ,

सटीक मौकों पर निकलने के लिए

अभी पिछले ही वीकेंड मैं और मेरे पति घर की कुछ बातों का मुआयना कर रहे थे तो हमने समझा की पिछले पाँच सालों में बेडरूम और हॉल का पंखा तो कई दफ़े साफ किया पर किचन के पंखे की बारी तो सालों दीवाली में भी नहीं आयी।

“अजी वो गंदा ही नहीं होता!”

“तो वो गन्दा क्यों नहीं होता?”

वो इसलिए की चलता कम है, हवा कम काटता है और ऊपर उठती गन्दगी उससे नहीं चिपकती। तो कम चलने कम काम करने और कम प्रयुक्त होने के कारण वह चमचम नया-नया सा बना रहता है।

किचन को मैथिली (उत्तर बिहार की प्रचलित भाषा) में कहते हैं भंसागघर तो इसे अगर देसी बात की तरह बोलें तो ये मज़ेदार टिप्पणी बनती है कि:

हमें कुछ भी होना चाहिए जीवन में भंसागघर का पंखा नहीं होना चाहिए।

जीवन मे शो पीस बन कर रहने से चकाचक तो दिखते हैं लेकिन माथे पर अनुभव की रेखाओं का बल नहीं ठहरता, न तो हमसे किसीको सुख का अनुभव ही होता है। तो हम सबको तय करना होगा की हम कैसे जीवन में दूसरों के काम आएं, खुद पर शिकन लें । न की कोने में सुख साध कर ख़ूबसूरत परन्तु अनुभवहीन दिखते रहें।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.