भाई गंधर्व झा से कल पुष्टि हुई की मणि सिरीज़ में मणिकांत अंकल की अब तक 26 किताबें लगभग आ चुकी हैं। मैथिली भाषा की ऐसी-ऐसी विभोर करने वाली रचनाएँ जैसे काली मैया मनपूरन भाई को खुद बोल-बोल लिखाती हों और सरस्वती गणेश स्वयं उनके लेखन का निरीक्षण करने आते हों। अंकल ये सब नहीं बताते पर हमें तो पता है। उनका घर ही मंदिर है। ये कोई राज़ की बात थोड़ी है। सुंदर पावन स्थल की माया है। मणि रचना और से मोह स्वत: जुड़ता है।

मैंने उनकी कुछ किताबें मुंबई में कुछ मित्रों को भी दी थीं। कंटेंट ही कंटेंट है, पढ़ते जाईये, आँख बंद कीजिए, बोलबम करिये, मन मगन गाते जाईये, कोई शोबाजी नहीं ढूँढिये यहाँ जी। अगर आप मणिकांत झा से अब तक नहीं मिले हैं तो अभी के अभी दरभंगा का टिकट करा कर शुभंकर पुर में काली स्थान हो आइये।

कल भारत मे अलग अलग जगहों पर मैथिल संस्थानों में “शरद मणि” का लोकार्पण , किताब में लिखी माँ की वंदना गा कर किया गया। यह सौभाग्य आलोक_ट्यूटोरियल लेने से चूक गया क्योंकि हमारी क्लास में कुछ रेनोवेशन जारी है।

सुबह सुबह अंकल ने ममता ठाकुर मैम की आवाज़ में वंदना साझा की हैं। जो लोग मैम को जानते हैं उन्हें आभास होगा की इतने निकट से उनको सुनना सहज सौभाग्य ही है।

आइये पढ़ें पुस्तक से कुछ सरस्वती वंदनाएँ जो मणिकांत जी द्वारा रचित हैं। किताब के लिए इस नम्बर पर सम्पर्क करें 9431451489(मणिकांत झा)

सरस्वती वंदना 1

बोलक देवी सरस्वती माँ सुनियौ हमर पुकार यै
ज्ञान सुधा कनिए बरसाबू खुजत मोर बकार यै।

अहींक दया सँ बुद्धिक वर्षा संगहि हुए विवेक यै
अहाँ बिना की पूरा होयतै सपना हमर हरेक यै
पुत्र जानि क’ मातु शारदे विनती हो स्वीकार यै
बोलक देवी सरस्वती माँ सुनियौ हमर पुकार यै ।

प्रत्युत्पन्न मतिक दातृ छी बैसी जकरा जिह्वा यै
आशीष पबिते भेल महाशय रहियो क’ दूधपीबा यै
बालोहं जगदानंदक वर्णन जानय भरि संसार यै
बोलक देवी सरस्वती माँ सुनियौ मोर पुकार यै।

मनक मनोरथ सब पुरबै छी हम अहाँ सँ की माँगी
करक मध्यमे सदा बिराजी नीन्नहुँ सँ जखने जागी
मणिकांतक बतिया पर जननी करबै कने विचार यै
बोलक देवी सरस्वती माँ सुनियौ हमर पुकार यै।

-मणिकांत झा दरभंगा, ८-१-२०।

सरस्वती वंदना 2

हंस चढ़लि माँ आंगन एलिए देलिए माँ आशीष हे
धवल वसन माँ धवले वाहन धवले चारू दीस हे।

ज्ञानक देवी छी भरि जग के मानय सकल जहान हे
अंधकार के दूर भगबियौ बंटियौ बुद्धि आ ज्ञान हे। हंस…

तिमिर भरल अछि नगर डगर सब देखबू ज्योति ईजोत हे
एक सँ बढ़ि क’ एक निर्बुद्धि अपजल बहुतो भोंथ हे ।हंस…


मणिकांतक विनती सुनियौ जननी लेबए कनिए कान हे
बालक अपनेक अछि सोझमतिया बनल बौक अकान हे । हंस…

-मणिकांत झा दरभंगा, १०-१-२० ।

यह सहज उपलब्ध ज्ञान का खज़ाना ढूँढने वाले को मिलेगा। अमेज़न पर आसानी से पैसे खर्च कर भी नहीं मिलेगा। आपको ये किताब कैसे मिल सकती है इसके बारे फिलहाल Gandharv Jha ही बता पाएं।

मेरी प्रति तो सुरक्षित है आ भी रही है। इससे गा कर मुझे भी बड़ा मन है रिकॉर्डिंग करने का।

माँ को अपने शब्दों को अपने बच्चों तक पहुंचाने की मार्केटिंग नहीं आती उसके आँचल में बैठ कर ही सुनना पड़ता है ।


देसिल बैना हैना।