नींद

नींद सुखद अवस्था है,अपने आप से प्यार करते हैं वे जो लेते हैं अच्छी नींद। शरीर के तंत्र सभी लाइन पे लाती है रोज़ पूरी होती नींद। बहुत ज़रूरी नींद।

सपनो की दुनिया है नींद, सपने होंगे पूरे जब देखे जाएंगे, खुली आँखों की जलन और सूखता कॉर्निया सबसे निजात है नींद, नहीं आते सपने आराम कुर्सी पर, हमें सर के नीचे हाथ रख कर लेटे रहना है, लम्बे होकर बिस्तर पर पसार टाँगें। बेहद आराम की तलब के साथ देखने हैं अपने सपने। सपनों के बीज बोती नींद।

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माँ

प्रचलन से इतर अनुभूति के शब्दों में क्या लिखूँ?
तुम्हारी याद में मम्मी लिखूँ या माँ लिखूँ ?

रीमा का बेटा उसे माँ कहता है
सुनने में बड़ा अच्छा लगता है
मेरे बच्चे लिपटेंगे बोलकर मम्मी-मम्मी
यह मेरा सच है ये मुझे सुख देता है।

अपने आप में पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा का स्त्रोत है ये एक शब्द “माँ।

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शिवरात्रि

यह तस्वीर हमारी महाकाल यात्रा से एक ख़ूबसूरत स्मृति है।मुझे और आलोक को तीर्थस्थल पर घूमते लोकल कैमरापर्सन से तस्वीरें निकलवा के रख लेना सही लगता है।लैप्टॉप और वेस्टर्न डिजिटल के हार्ड डिस्क कीसतहों से सॉफ्ट कॉपी लुप्तप्राय प्राणी के दस्तावेज़ों की तरह हो जाती हैं। रील का ज़माना अच्छा था हाथों हाथ यादें पलटने के लिए मिल जाती थीं। अभिज्ञान का जन्म, उसका पहला बर्थडे , उसका मुंडन फिर अंशुमन से जुड़े सभी खास दिन को डेवलप करने का तो बस दिन ही बन रहा है अब तक, पर जल्द ही सब निपटा लेंगे मुझे हार्डकॉपी एल्बम पसंद है। अनुपम आयी थी तो हमने बैठ के देखे थे। साल भर बाद सास आयीं थीं तो उन्होंने भी बैठ के देखे थे। मोनू भी चाव से देखता है और मेरी शादी में क्यों नहीं है का मलाल करता है। अभी ऐसे ही और भी एल्बम निपटाने हैं।शिवरात्रि पर मनोकामना है, भोलेनाथ सबके गृहस्थ आश्रम को सुखद बनाएं । वानप्रस्थ वालों से तो मिल ही आयें।छात्रों को उनके ध्येय से मिलाएं । परिणय सूत्र में बंधने की कामना रखने वाले सभी युवाओं या अधेड़ों को कूलेस्ट वर कन्या दिलाएं । बच्चों के बस्ते हल्के रखें, उनका जीवन कौतूहल और प्रेम से भरा रखें। सभी के जीवन का रस बना रहे।#जयमहाकाल

इन्नर – विभूति भूषण झा सम्पादित दूसरा साझा संकलन

इन्नर साहित्यिक सँग्रह में मेरी भी दो कविताएँ स्थान बना पायीं ये मेरी साहित्यिक यात्रा के में नई उपलब्धि है।

अक्टूबर 2019 के दौरान फेसबुक पर ही  मुकेश सिन्हा जी के माध्यम से  Bibhuti B Jha जी और उनकी साहित्यिक गतिविधियों से परिचय हुआ।

अवली साझा साहित्यिक सँग्रह के बाद इन्नर के छपने की विस्तृत जानकारी इन्होंने बढ़ियाँ तरीके से अपनी वाल और वाट्सप समूहों के माध्यम से बताई थी।

दी गयी जानकारी से यह महसूस हुआ की यहाँ  रचनाएँ सेलेक्ट हुई तो बड़ी बात होगी। बिभूति भाई साब जिस पैशन के साथ बच्चों को बड़ा करने जैसे “अवली” लाये और अब “इन्नर” का संपादन कर का रहे हैं उससे सहज प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अवली साझा साहित्यिक सँग्रह खरीदने के लिए यहाँ क्लिक करें। बेहतरीन किताब है इसके कवर की भी अपनी अलग कहानी है। रुचिकर होगा किताब खरीदकर ही अवली के बारे में जानना।

अमेज़न पर उपलब्ध जानकारी के हिसाब से अवली पुस्तक पूरे भारत के 35 लेखक कवि और शायर की रचनाओं का संग्रह है. एक कम्प्लीट साहित्यिक पैकेज है. 216 पेज की पुस्तक है और सभी उम्र के लोगों के लिए है।

बिभूति जी के शब्दों में –


“अवली” के बाद लोगों को भरोसा हुआ कि बिना पैसे दिये भी रचनाएँ छपती हैं। लेखकीय प्रति दी जाती हैं।”

इन्नर किताब के लिए भी उनका कहना है कि सबों के सहयोग से एक अच्छी पुस्तक आ रही है।

111 रचनाकार में अगर 41 अगर बहुत लिखने वाले लोग हैं तो 70 नये लोग हैं। यही 70 उनकी उपलब्धि है।
सामान्य साझा संकलन की तरह “इन्नर” को मैं दम तोड़ने नहीं दूँगा। दो मित्र निःस्वार्थ भाव से पुस्तक का प्रचार सामग्री जुटाने में लगे हैं।”

सम्पादन की मेहनत से इतर वे समय-समय पर रचनाकारों से कनेक्ट बना कर रखना नहीं भूले। कभी वाट्सप , तो कभी फेसबुक से लगातार किताब का स्टेटस खुद ही बताते रहे।

मैंने छः नवम्बर को रचनाएँ ईमेल के माध्यम से भेजी। बारह नवंबर तक एक्नॉलेजमेंट आ गयी।

बाइस दिसम्बर को दूसरी सूची जारी हुई उसमें मेरा नाम था।

इकतीस दिसम्बर को खेद ब्रॉडकास्ट जारी हुआ। मैसेज आया की गुवाहाटी में कर्फ्यू और इंटरनेट बन्द होने के कारण विलम्ब हुआ था अन्यथा यह किताब 31 दिसम्बर तक आने की प्लानिंग थी। परन्तु संवाद को सुखांत रखने के लिये उसमें चयनीत होने की बधाई भी थी। यह तरीका लुभावना और सीखने योग्य है।

शुभ संध्या।
मेरा प्रयास था कि “इन्नर” पुस्तक 31 तक आ जाये लेकिन कर्फ्यू और इंटरनेट बन्द होने के कारण विलम्ब हुआ। प्रयास है कि जल्द से जल्द आ जाये।
आपकी रचना का चुनाव हुआ है।
आज इसकी ही बधाई स्वीकारें।
हर कदम की सूचना दी जायेगी। किन रचनाओं का चुनाव हुए है वो भी सूचित करुँगा।
आपका
विभूति।

चार जनवरी के बाद जब  क्षेत्र में स्थति सामान्य हुई तब कवर पेज फाइनल करने पर ज़ोर दिया गया। उन्होंने सभी मित्रों को इस चयन प्रक्रिया में शामिल किया, राय ली और करीब एक महीने की खोज बीन ब्रेनस्ट्रोर्मिंग के उपरांत यह बढ़ियाँ कवर पेज नीचे फाइनल होकर सबके सामने अवस्थित है। इसे Red Design नाम की एजेंसी ने डिज़ाइन किया है, बेहतरीन काम। सापेक्षिक । विषय के अनुरूप और मर्म स्पर्शी।

Red Design से आप यहाँ क्लिक कर सम्पर्क कर सकते हैं।

अब तो बस किताब के आने भर की देर है और प्रतीक्षा भरपूर है।

मेरा ख़्याल है इस पूरे चक्र में सबसे ज़्यादा जो बात हमने सीखी वह है इन्नर शब्द का अर्थ।

सम्पादक महोदय इतनी विनम्रता से लगभग हर नए व्यक्ति को इसका अर्थ बताते हैं कि याद होकर ही रहता है तो लीजिये आप भी जान लीजिए :

इन्नर – संज्ञा पुलिंग [संस्कृत अनीर=बिना जल का] पेउस (1० दिन के भीतर ब्याई हुई गाय का दूध) में गुड़, सोंठ चिरौंजी और कच्चा दूध मिलाकर पकाने से वह जम जाता है । इसी जमे हुए दूध को इन्नर कहते हैं ।

भला हो इस पूरे प्रसंग का जो मुझे इस जमे दूध का नाम तो पता चला। मुंबई में बोरीवली स्टेशन से लेकर कांदीवली तक ठेले पर लाल रेक्सीन के ऊपर पनीर सी दिखने वाली कितनी बिकती है ये।

मज़े की बात बताऊँ तो मेरे पति आलोक का यह सबसे पसंदीदा पकवान है पर शादी के बाद फिर वे अब तक न खा पाए हैं, इसकी भी बड़ी रुचिकर कहानी है। एक बार हमारी कोर्टशिप के दौरान हुई भेट में उन्होंने मुझे यह मंगवा के खिलाया और मैं भी इस डिश का कांसेप्ट ही डाइजेस्ट नहीं कर पायी । डिश तो दूर की बात है ।

अच्छी भली एक भारतीय मिठाई उसके बाद आलोक फिर कभी न ला पाए , पंगा ही क्यों लेना।

लेकिन इस किताब के कवर की देसी मिठास , इन्नर शब्द को बार बार सुनने की प्रक्रिया ने मुझे वो स्वाद समझा दिया है जो मुझे अच्छा तो लगा था पर  लिए हामी भरने की समझ तब मुझमें ही नहीं थी।

कितना कौतूहल था उस क्षण में जब आलोक को लगा था की वो मुझे कुछ नई कुछ अनोखी चीज़ से परिचय कराने जा रहे जो मैंने कभी न देखी न सुनी होगी।

“अरे ये पनीर है।”
“खा के तो देखो।”
“हम्म मीठा है”
“क्या है पता है? “
…….

नहीं, तब नहीं मालूम था, और तो और कोई राय न होने के बावजूद मन रख लेने का हुनर भी नहीं पता था।

भला हो सहनशील भारतीय पतियों का , उनके हिस्से भी अच्छा खासा इंतज़ार होता है, मुझे दस वर्ष होने के बाद इन्नर की खूबसूरती का आभास हुआ है।

किताब इन्नर छप कर हाथ में आएगी तो पतिदेव के साथ मुम्बई में इन्नर खा के सेलिब्रेट किया जाएगा।

बिभूति भूषण जा जी को धन्यवाद किताब में स्थान देने के लिए और  सुंदर कहानी का पन्ना मेरी ब्लॉग में जोड़ देने के लिए।

इन्नर साझा साहित्यिक संकलन

मानस रिवाइज्ड

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को 1350 ई. से 1650 ई. के मध्य माना गया है। यह हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहलाता है।

इसमें तुलसी सूर जायसी तथा कबीर जैसे महान कवियों ने अपनी रचनाओं से समाज को नई दिशा प्रदान की।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस, भक्ति काल में सगुण काव्यधारा का सबसे प्रसिद्ध प्रबंध काव्य ग्रंथ है। गोस्वामी तुलसीदास समग्र मानवता के कवि माने जाते हैं। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने भारतीय संस्कृति का एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया है। तुलसीदास जी ने अपनी उच्चतम स्तर की प्रतिभा दर्शायी है और महाकवि एवं लोकनायक होने का प्रमाण दिया है। वे समग्र मानवता के कवि हैं।

हिंदी साहित्य में रामचरितमानस जैसा लोकप्रिय और श्रेष्ठ महाकाव्य दूसरा कोई नहीं है।मानस सर्वकालिक प्रासंगिक महाकाव्य है। यह रामभक्ति काव्यधारा में रचित भारतीय संस्कृति का एक आदर्श स्वरूप है।

तुलसीदास, भक्ति को किसी साम्प्रदायिक भाव में बंधे बिना सरल आचरण का पर्याय बताते हैं, तुलसी की दृष्टि से भक्ति मानव जीवन का सार है और विषयों का भोग मात्र इस जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

मनसा वाचा कर्मणा

काव्यशास्त्र और मानदंड की दृष्टि से रामचरितमानस ग्रंथ में निम्नलिखित चारों विशेषताएं हैं – 

  • उदात्त चरित्र निर्माण ग्रंथ
  • धर्मग्रंथ
  • संस्कारग्रंथ
  • स्मृतिग्रंथ

 

मानस ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जिसे पर्णकुटी से लेकर महलों तक पूज्य ग्रंथ की तरह नियमित पढ़ा जाता है।मंदिरों में , घरों में 24 घंटे का पाठ रखा जाता है।

मानस में प्रतिदिन जीवन के लिए सुक्तियाँ मिलती हैं। मनोहारी सार्वभौम दर्शन मिलता है। 

रामचरित मानस विश्व साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं में माना जाता है। मानस प्रबंध काव्य में मानव मूल्य के विकास का प्रयास , शील और सौंदर्य का संगम मिलता है।

अनेक पुराणों, वेदों, शास्त्रों के आधार पर मानस स्मृतिग्रंथ की रचना हुई है।

यद्दपि तुलसीदास कहते हैं कि मानस की रचना उन्होंने “स्वान्तः सुखाय” अर्थात केवल अपने अंत: सुख के लिए की वह ऐसा न रह के सर्व सुखाय में परिवर्तित हो गया।

मानस में तुलसीदस का मानना है , की मनुष्य जन्म बहुत दुर्लभ है इसलिए इसे व्यर्थ के संचय में नहीं व्यतीत करना चाहिए। वे कहते हैं:

“सब तज हरि भज”

मानस का संदेश विश्वरूप से आत्मरूप हो जाता है और आत्मकल्याण से विश्वकल्याण में परिणत हो जाता है। 

जैसे हिमालय स्थित मानसरोवर की जाहनवी, मंदाकिनी, भागीरथी अलकनंदा मिलकर गंगा को जन्म देती है और चराचर को पोषित करती हैं, उसी प्रकार वेद, पुराण, दर्शन और धर्म मानस को जन्म देते हैं। 

मानस मनुष्य मन की संवेदना और अनुभूतियों का समृद्ध विश्वकोश है। 

यह मुख्य रूप से संवाद के रूप में चार श्रोता और चार वक्ताओं में विभाजित है।

शिव पार्वती संवाद – शैव और शाक्त जिज्ञासा समाधान

काक भुशूंडि और गरुड़ संवाद – भक्त और वैष्णव का संवाद

याज्ञवल्क्य और भारद्वाज संवाद – ऋषि -मुनि के मध्य का संवाद

कवि तुलसीदास और पाठक का संवाद – सार्वभौम संवाद

यह रूपक सम्पन्न उल्लेख चार मनोहारी घाट की कल्पना के जैसे किया गया है ।

सुभग नगर घाट मनोहर चारि

मिश्र बंधु के मुताबिक

चार मनोहर घाट की कल्पना इस प्रकार समझी जा सकती है’:

  • ज्ञान घाट 
  • कर्म घाट
  • उपासना घाट
  • दैन्य घाट

ज्ञान, कर्म, योग, भक्ति ईश्वर को पाने के मार्ग हैं।

  • शिव -ज्ञान का उपदेश देते हैं। 
  • याज्ञवल्क्य – कर्म का उपदेश देते हैं ।
  • काक भुशूंडि- योग का उपदेश देते हैं।
  • तुलसी -पाठक को ज्ञान कर्म योग से समन्वित भक्ति से रूबरू करते हैं। दिव्य, शील या चरित्र का पाठ देते हैं।

ज्ञान, कर्म, योग से समन्वित भक्ति ही समग्र जीवन का दर्शन हो सकती है

वैचारिक स्तर पर:

  • ज्ञान रहित भक्ति- कोरी भावुकता है ।
  • योग रहित भक्ति- सार रहित विवशता है।
  • कर्म रहित भक्ति – परोपजीवी निरीहता है।

मानस ने सदाचार को बहुत महत्व दिया है। यह पूर्ण जीवन की अशेष गाथा है।

आचार: परमो धर्म:। 

मानस आज और युग सापेक्ष हो चला है क्योंकि तुलसी दास की भक्ति मर्यादित भक्ति है जिसका सर्वथा ह्रास समाज मे सब तरफ व्याप्त है। मानस के मुताबिक भक्ति, मानव जीवन जीने का एक तरीका मात्र ही है उसे अंध विश्वास में नहीं परिणत करना चाहिए।

सन्दर्भ:

  • MhD1 – तुलसी दास और चरितमानस Youtube Lectures on Consortium of Educational Communication,New Delhi—- लिंक यहां।
  • हिंदी साहित्य का इतिहास – राम चंद्र शुक्ल
  • इग्नोउ पाठ्यक्रम के आधार पर