इन्नर – विभूति भूषण झा सम्पादित दूसरा साझा संकलन

इन्नर साहित्यिक सँग्रह में मेरी भी दो कविताएँ स्थान बना पायीं ये मेरी साहित्यिक यात्रा के में नई उपलब्धि है।

अक्टूबर 2019 के दौरान फेसबुक पर ही  मुकेश सिन्हा जी के माध्यम से  Bibhuti B Jha जी और उनकी साहित्यिक गतिविधियों से परिचय हुआ।

अवली साझा साहित्यिक सँग्रह के बाद इन्नर के छपने की विस्तृत जानकारी इन्होंने बढ़ियाँ तरीके से अपनी वाल और वाट्सप समूहों के माध्यम से बताई थी।

दी गयी जानकारी से यह महसूस हुआ की यहाँ  रचनाएँ सेलेक्ट हुई तो बड़ी बात होगी। बिभूति भाई साब जिस पैशन के साथ बच्चों को बड़ा करने जैसे “अवली” लाये और अब “इन्नर” का संपादन कर का रहे हैं उससे सहज प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अवली साझा साहित्यिक सँग्रह खरीदने के लिए यहाँ क्लिक करें। बेहतरीन किताब है इसके कवर की भी अपनी अलग कहानी है। रुचिकर होगा किताब खरीदकर ही अवली के बारे में जानना।

अमेज़न पर उपलब्ध जानकारी के हिसाब से अवली पुस्तक पूरे भारत के 35 लेखक कवि और शायर की रचनाओं का संग्रह है. एक कम्प्लीट साहित्यिक पैकेज है. 216 पेज की पुस्तक है और सभी उम्र के लोगों के लिए है।

बिभूति जी के शब्दों में –


“अवली” के बाद लोगों को भरोसा हुआ कि बिना पैसे दिये भी रचनाएँ छपती हैं। लेखकीय प्रति दी जाती हैं।”

इन्नर किताब के लिए भी उनका कहना है कि सबों के सहयोग से एक अच्छी पुस्तक आ रही है।

111 रचनाकार में अगर 41 अगर बहुत लिखने वाले लोग हैं तो 70 नये लोग हैं। यही 70 उनकी उपलब्धि है।
सामान्य साझा संकलन की तरह “इन्नर” को मैं दम तोड़ने नहीं दूँगा। दो मित्र निःस्वार्थ भाव से पुस्तक का प्रचार सामग्री जुटाने में लगे हैं।”

सम्पादन की मेहनत से इतर वे समय-समय पर रचनाकारों से कनेक्ट बना कर रखना नहीं भूले। कभी वाट्सप , तो कभी फेसबुक से लगातार किताब का स्टेटस खुद ही बताते रहे।

मैंने छः नवम्बर को रचनाएँ ईमेल के माध्यम से भेजी। बारह नवंबर तक एक्नॉलेजमेंट आ गयी।

बाइस दिसम्बर को दूसरी सूची जारी हुई उसमें मेरा नाम था।

इकतीस दिसम्बर को खेद ब्रॉडकास्ट जारी हुआ। मैसेज आया की गुवाहाटी में कर्फ्यू और इंटरनेट बन्द होने के कारण विलम्ब हुआ था अन्यथा यह किताब 31 दिसम्बर तक आने की प्लानिंग थी। परन्तु संवाद को सुखांत रखने के लिये उसमें चयनीत होने की बधाई भी थी। यह तरीका लुभावना और सीखने योग्य है।

शुभ संध्या।
मेरा प्रयास था कि “इन्नर” पुस्तक 31 तक आ जाये लेकिन कर्फ्यू और इंटरनेट बन्द होने के कारण विलम्ब हुआ। प्रयास है कि जल्द से जल्द आ जाये।
आपकी रचना का चुनाव हुआ है।
आज इसकी ही बधाई स्वीकारें।
हर कदम की सूचना दी जायेगी। किन रचनाओं का चुनाव हुए है वो भी सूचित करुँगा।
आपका
विभूति।

चार जनवरी के बाद जब  क्षेत्र में स्थति सामान्य हुई तब कवर पेज फाइनल करने पर ज़ोर दिया गया। उन्होंने सभी मित्रों को इस चयन प्रक्रिया में शामिल किया, राय ली और करीब एक महीने की खोज बीन ब्रेनस्ट्रोर्मिंग के उपरांत यह बढ़ियाँ कवर पेज नीचे फाइनल होकर सबके सामने अवस्थित है। इसे Red Design नाम की एजेंसी ने डिज़ाइन किया है, बेहतरीन काम। सापेक्षिक । विषय के अनुरूप और मर्म स्पर्शी।

Red Design से आप यहाँ क्लिक कर सम्पर्क कर सकते हैं।

अब तो बस किताब के आने भर की देर है और प्रतीक्षा भरपूर है।

मेरा ख़्याल है इस पूरे चक्र में सबसे ज़्यादा जो बात हमने सीखी वह है इन्नर शब्द का अर्थ।

सम्पादक महोदय इतनी विनम्रता से लगभग हर नए व्यक्ति को इसका अर्थ बताते हैं कि याद होकर ही रहता है तो लीजिये आप भी जान लीजिए :

इन्नर – संज्ञा पुलिंग [संस्कृत अनीर=बिना जल का] पेउस (1० दिन के भीतर ब्याई हुई गाय का दूध) में गुड़, सोंठ चिरौंजी और कच्चा दूध मिलाकर पकाने से वह जम जाता है । इसी जमे हुए दूध को इन्नर कहते हैं ।

भला हो इस पूरे प्रसंग का जो मुझे इस जमे दूध का नाम तो पता चला। मुंबई में बोरीवली स्टेशन से लेकर कांदीवली तक ठेले पर लाल रेक्सीन के ऊपर पनीर सी दिखने वाली कितनी बिकती है ये।

मज़े की बात बताऊँ तो मेरे पति आलोक का यह सबसे पसंदीदा पकवान है पर शादी के बाद फिर वे अब तक न खा पाए हैं, इसकी भी बड़ी रुचिकर कहानी है। एक बार हमारी कोर्टशिप के दौरान हुई भेट में उन्होंने मुझे यह मंगवा के खिलाया और मैं भी इस डिश का कांसेप्ट ही डाइजेस्ट नहीं कर पायी । डिश तो दूर की बात है ।

अच्छी भली एक भारतीय मिठाई उसके बाद आलोक फिर कभी न ला पाए , पंगा ही क्यों लेना।

लेकिन इस किताब के कवर की देसी मिठास , इन्नर शब्द को बार बार सुनने की प्रक्रिया ने मुझे वो स्वाद समझा दिया है जो मुझे अच्छा तो लगा था पर  लिए हामी भरने की समझ तब मुझमें ही नहीं थी।

कितना कौतूहल था उस क्षण में जब आलोक को लगा था की वो मुझे कुछ नई कुछ अनोखी चीज़ से परिचय कराने जा रहे जो मैंने कभी न देखी न सुनी होगी।

“अरे ये पनीर है।”
“खा के तो देखो।”
“हम्म मीठा है”
“क्या है पता है? “
…….

नहीं, तब नहीं मालूम था, और तो और कोई राय न होने के बावजूद मन रख लेने का हुनर भी नहीं पता था।

भला हो सहनशील भारतीय पतियों का , उनके हिस्से भी अच्छा खासा इंतज़ार होता है, मुझे दस वर्ष होने के बाद इन्नर की खूबसूरती का आभास हुआ है।

किताब इन्नर छप कर हाथ में आएगी तो पतिदेव के साथ मुम्बई में इन्नर खा के सेलिब्रेट किया जाएगा।

बिभूति भूषण जा जी को धन्यवाद किताब में स्थान देने के लिए और  सुंदर कहानी का पन्ना मेरी ब्लॉग में जोड़ देने के लिए।

इन्नर साझा साहित्यिक संकलन

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