वृक्ष की छाया वृक्ष से बंधी होती है मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ नहीं बढ़ सकती पुत्र मैं समय के वृक्ष से बंधी वही छाँव हूँ।
– गंगा , देवव्रत से।

यह एक कालजयी पंक्ति है। बच्चे अपनी कर्म भूमि के लिए प्रस्थान करते समय जन्म भूमि को छोड़ देते हैं।अपने परिजनों को छोड़ दूर चले जाते हैं। वहाँ बसी आत्मा छाँव बन कर सुखसिंह के मैदान में बसे वट वृक्ष से बंधी रह जाती है। कभी लीची के मौसम में याद आती है, कभी बट साइत पर याद आती है। पर वो जो हमारे इष्ट हैं वो देवस्थल छोड़ के कैसे आ सकते हैं, वे वहीं बसे रहते हैं जहाँ हमने शरीर धारण किया था। हमको जाना पड़ता है , स्मरण करना पड़ता है तब तब जब जब क्लेश किसी अबूझ पहेली की तरह सिलवटों में लुकता छुपता नज़र नहीं आता, पर क्लेश होते हैं अकथनीय कोलाहल जैसे क्लेश, मरघट की चुप्पी जैसे क्लेश।

Pragya Mishra