भाग 6

जीवन दाता एक है
समदर्शी भगवान
जैसी जिसकी पात्रता
वैसा जीवन दान
तमस रजस सद्गुणवती
माता प्रकृति वरदान
जैसी जननी भावना
वैसी ही संतान

चित्रांगद और विचित्रवीर्य के मरणोपरांत , हस्तिनापुर का सिंहासन वंश विहीन हो जाता है। माता सत्यवती , ज्येष्ठ भ्राता होने के नाते , भीम से परम्परा के अनुसार , विधवा हो चुकी अम्बिका और अम्बालिका से विवाह कर हस्तिनापुर की वंश बेल बढ़ाने बोलतीं हैं। परन्तु भीष्म अपनी बह्मचर्य प्रतिज्ञा से बंधे हैं वे मना कर देते हैं।

निराश माता सत्य वती , भीष्म को वेदव्यास से मिलकर उनकी समस्या का हल माँगने बोलते हैं।
समय कहता है कि भविष्य के प्रश्नों का उत्तर व्व अगर अभी दे दे तो काल की गति रुक जाएगी इसलिए । समय आने पर ही उचित उत्तर स्वयं प्राप्त होना चाहिए।

वेदव्यास अपने आश्रम में तपस्या लीन अघोरी सी वेशभूषा में बैठे हैं, भीष्म माता सत्यवती की समस्या उनके समक्ष रखते हैं। भीष्म को वेदव्यास कहते हैं कि माता और देश के आह्वान के समक्ष कोई प्रतिज्ञा नहीं ठहरती , वेदव्यास कहते हैं भीष्म ने माता सत्यवती की बात इसलिए नहीं मानी क्योंकि वे उनकी माता नहीं है।
नतमस्तक भीष्म कहते हैं कि प्रतिज्ञा को तोड़ने के निर्णय का अधिकार तो केवल प्रतिज्ञा लेने वाले को होता है और उन्होंने अपना निर्णय ले लिया है।
परन्तु इस पर मुस्कराते हुए वेदव्यास क्षमा मांग कर अपनी सीमा उल्लंघन करने पर खेद व्यक्त करते हैं परन्तु अटल सत्य यही बताते हैं कि सत्यवती भीष्म की माता नहीं है इसलिए भीष्म ने उनकी बात नहीं मानी।
परन्तु वेदव्यास , माता सत्यवती की बात मानेंगे क्योंकि माता सत्यवती वेदव्यास की माता हैं , उन्होंने उनको पराशर मुनि के सहयोग से जन्मदिया था और उनके जन्म की कथा वेदव्यास भीष्म को सुनाते हैं।

वेदव्यास , माता के पास पहुँच उनसे प्रयोजन पूछते हैं, माता व्यंग्य पूर्वक कहती हैं कि काल के गर्भ की सभी बातों का आभास जब तुम्हारे पिता ने तुम्हे कर दिया है तो मेरे मूँह से क्यों सुनना चाहते हो। समझ जाओ पुत्र की मेरी तुमसे क्या इच्छा है ।
परन्तु वेदव्यास पूरी राजनैतिक वाकपटुता से मुस्कराते हुए माता सत्यवती से कहते हैं कि वे जो कुछ ऋषि वेदव्यास से चाहती हैं उसका सम्बंध भारतवर्ष से है, हस्तिनापुर के भविष्य से है और राजमाता होने के नाते उन्हें अपने मुख से ही आदेश बोलना चाहिए।

माता सत्यवती अपने जयेष्ठ पुत्र वेदव्यास को चित्रांगद और विचित्रवीर्य के असमय देहांत के बाद अम्बा और अम्बालिका से संतान उतपत्ति का आग्रह करती हैं। वे कहती हैं कि चूँकि वे उनके बड़े भाई हैं तो परम्परा अनुसार वंशबेल उन्हें बढ़ानी है ।

वेदव्यास अपने रूप से चिंतित माता को कहते हैं कि वे माता हैं इसलिए उनको रूप नहीं दिखता परन्तु अम्बिका अम्बालिका के समीप जाने के लिए उन्हें एक वर्ष की अवधि चाहिए ताकि वे औघड़ रूप को ठीक कर स्त्रियों के निकट जा सकें।

माता सत्यवती एक वर्ष का विलम्ब नहीं ले सकती हैं उन्हें अतिशीघ्र संतान उतपत्ति की कमाना है। अतः वे वेदव्यास को उसी रूप में मिल लेने का आग्रह करती हैं।

अम्बिका , ऋषि वेदव्यास को देख कर भय से काँपने लगती है और भयाक्रांत वो अपने नेत्र बंद कर लेती है। वेदव्यास भविष्य वाणी करते हैं कि अम्बिका से होने वाला पुत्र नेत्र हीन होगा।

अम्बालिका भी , ऋषि वेदव्यास का रूप देख थर थर कांपती हुई श्वेत पड़ जाती है, परन्तु वो आँख नहीं बंद करती। वेदव्यास माता से कहते हैं कि अम्बालिका से उतपन्न होने वाला पुत्र शारीरिक रूप से दुर्बल होगा।

माता सत्यवती अत्यंत निराश हो अम्बिका और अम्बालिका से से और अवसर के लिए आग्रह करती हैं। परंतु भयाक्रान्त रानियाँ अपनी दासी को ऋषि वेदव्यास के पास भेजती हैं। दासी बहुत निडर और प्रेम भाव से ऋषि से मिलती है। उससे उतपन्न होने वाले पुत्र की अत्यंत योग्य और बुद्धिमान होने की भविष्य वाणी होती है।

माता यह जानकर निराश होती हैं कि अम्बिका ने अपनी दासी भेज दी, परन्तु हस्तिनापुर के भविष्य की धरोहर उस दासी के गर्भ में थी इसलिए उसे उचित सतकार के साथ रखा गया।

इस प्रकार अम्बिका से नेत्रहीन धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। अम्बालिका से दुर्बल श्वेत पांडू का, और दासी ने महाज्ञानी स्वस्थ विदुर को जन्म दिया। तीनों ही भरतवंशी चंद्रवंशी राजकुमार, माता सत्यवती के ज्येष्ठ पुत्र वेद व्यास की संतानें थीं।

सत्यवती की साधना
भीष्म व्रती का त्याग
जागे जिनके जतन से
भरत वंश के भाग
धीर धुरंधर भीष्म के
शिष्य धुरंधर वीर
उदित हुआ फिर चंद्रमा
अंधकार को चीर।