डायरी के पन्नों में सर्च के बटन नहीं होते , इसलिए इन अनोखी यादों और मेरे जीवन के समानांतर इतिहास को किसी झगह अपने शब्दों में लिखते जाना भी ज़रूरी है। कल एक अद्भुत समाचार पढ़ने को मिला है, जलन्धर पँजाब में प्रदूषण का स्तर कम होने के कारण हिमालय दिखने लगा।

तस्वीर तपन पटानी जी के वाल से उठायी है। रहा न गया बिना शेयर किए। हम में से हर कोई अपने स्वार्थ में लिप्त प्रकृति का दोहन करता हुआ भूल जाता है कि हम केवल एवोल्यूशन का एक पायदान हैं , हम रह भी सकते हैं, नहीं भी इसलिए हमें जीवन की एकदम साधारण पद्धतियों की ओर लौट जाना होगा।

खुद न सही तो नियति हमको रोकेगी ही,जैसे आज रोक कर अपनी ताकत दिखा रही है।

मज़े की बात तो ये है कि भारतीय ही सबसे साधारण जीवन शैली में रहना दुनिया को सिखा सकते हैं। कुछ इशारे आये हैं, जैसे, हमारी संस्कृति की अब भी बाकी है भूमिका , अब भी बहुत बात है हमारी जीवन शैली में।

यद्यपि मुझे हमारे प्रधानसेवक से यह शिकायत रहती है कि वे अटपटा फरमान अधिक जारी करते हैं, उनके आदेश के चलते कई बार गरीब लोगों का जीवन प्रभावित हो जाता है। पर फिर भी इस लोक डाऊन के मध्य मैं पूरी तरह उनके साथ हूँ और मुझे अच्छा भी लग रहा की भारत इतने बेहतरीन तरीके से कोरोना के खतरे से लड़ रहा है। जबकि बेहतरीन मेडिकल सुविधा वाले देश लुढ़क रहे हैं।

कल सुजीत नायर नाम के एक पत्रकार की विडीओ फेसबुक पर देखी। वे शोध के बारे में बात करते हैं जिसके तहत भारतीय आदमी बीमारियों से लड़ने के लिए अधिक योग्य साबित होता है। इसका मतलब है हमारे वैदिक विज्ञान जीवन पद्धति में कुछ तो खास था जो हम आज तक वहन करते हैं।

अब जैसे की:

1. योग और श्वसन क्रिया यूँ ही बचपन से सिखाई जाती है।

2. अपना काम स्वयं करो, व्यायाम करो, खाना मत फेको, अधिक बाहर का मत खाओ, ताज़ा खाओ ये सारी आदतें हमारे मम्मी पापा के द्वारा डाली गयीं हैं, हम कुढ़ते हैं पर ये हमारे लिए लाभदायक हैं।

3. प्रतिदिन सब्ज़ी में हल्दी डाल कर खाना बनाना

4. प्रतिदिन दाल भात खाना, दाल सबसे अच्छा प्रोटीन का स्रोत।

5. शाकाहारी जीवन पद्धति भारत में ज़्यादा है, और मुझे पता नहीं क्या हो गया कोरोना के आते से मेरे जैसा दिन रात नॉन वेज खाने की चाहत रखने वाला व्यक्ति भी शाकाहारी हो गया।

7. हम अब भी बड़ी तादाद में बासी फ्रिज का रखा नहीं खाते, सब्ज़ी लेने रोज़ सब्ज़ी मार्किट जा कर सुबह ताज़ा सामना लेकर आते हैं।

8. अदरक कूच कर खाद्य पदार्थों में हमारे हमेशा पड़ती है, लहसुन भी हमारे खाने का अभिन्न अंग है। कटहल बनती है तो गोटे लहसुन की फली ही स्वाद लगा खाते जाते हैं।

9. बहुत अधिक प्रोसेस्ड खाना खाने की आदत अब भी भारत की अधिकांश जनसंख्या को नहीं हुई।

10. हमारे बच्चे आम तौर पर मिट्टी में खेलते हैं। हम हर समय सूपर साफ सफाई नहीं कर पाते । ग्रामीण पद्धति और छोटे शहरों में रहने का अंदाज़ लोगों को साथ लेकर चलने वाला है इसमें इसकी देह की मिट्टी उसमें सन जाए तो झाड़ कर चलते बनते हैं , हाय तौबा नहीं करते।

11. क़ई तरह के जीवाणुओं के सम्पर्क में हमारा शरीर बचपन से आता रहता है।

इसमें अभी बहुत सी बातें जुड़ सकती हैं। इसमें अपवाद भी घने हैं जैसे भारत के मधुमेह की राजधानी होना। हमारे देश मे प्रदूषण, रासायनिक कचरे का खतरा अचानक बढ़ते जाना।

फिर भी कोई दो राय नहीं की भारतीय प्रकृति से ज़्यादा जुड़े रहने की जीवन शैली के करीब हैं और हम ये भूलते जा रहे हैं। हमको वापस लौटना है। शांत स्थिर, प्रकृर्ति प्रेमी , ज्ञान विज्ञान गणित का उपासक सहिष्णु भारतीय ही विश्व गुरु है, हम पश्चिम का अनुकरण कर के विश्वगुरु नहीं होंगे।

वसुधैव कुटुम्बकम।

सर्वे सन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,

माकश्चिद दुःख भागभवेत।

सबकी धरती भाग 1