लॉक डाऊन डायरी -1

मुम्बई का मलाड पिम्परि पाड़ा सब्ज़ी मार्किट 15 मार्च 2020 को कुछ ऐसा भीड़ भाड़ भरा था, यह फिर भी बहुत कम है, लोग मास्क लगाए थे, पुलिस सब हटा भी रही थी। मैं डरते सम्भलते अभिज्ञान को लेकर बंदी से पहले आखिरी बार अनिता मैडम के म्यूज़िक क्लास गयी थी।

उसके बाद 16 मार्च 2020 से सब बंद होने की बात हो ही गयी। 18 मार्च को हमारी सोसायटी ने न्यूज़ पेपर और मिल्क वेंडर का अंदर आना बंद कर दिया था, काम वाली बाईयाँ 20 मार्च के बाद नहीं आयीं। मेरी वाली आँटी जी ने तो 16 मार्च से ही आना बंद कर दिया था।

अंशुमन बचपन से आँटी के पास रहा है तो वो रोज़ बोलता है मम्मी दस बज गए आँटी नहीं आयी। अंशू के घुँघराले बालों को झाड़ने की दक्षता उसकी आँटी में ही है, उनके गोद में बैठ खिड़की से बाहर देखते हुए बात करते करते कंघी करवा लेता था। उषा उससे मराठी में ही बात करती हैं, वह सब समझता है, 16 मार्च के बाद हफ्तों तक अंशुमन ने हमें तेल ही नहीं डालने दिया बोलकर की आँटी कल डाल कर गयी है। फिर आलोक ने उससे धीरे धीरे इतनी निकटता बनाई की बाल कंघी करने का विश्वासमत हासिल हो। वो भी केवल लिवोन का हेयर स्मूथ पोषन डालने के बाद ही टच करने मिलता है, ज़रा सा टक से दुखा की लड़का बिदक के भाग जाता है, फिर तो पटाते रहिये कंघी करना सपना है।

हम तो इस मधुमखी के खोते में आज तक हाथ नहीं लगा पाए। अभिज्ञान छोटा था तो उसकी देख रेख कंघी तेल उसकी दादी ही बड़े प्यार से कर दिया करती थीं और अब अंशुमन के पापा ही करते हैं । प्रेम से नहलाना , बाल काढ़ देना यह बड़े महीन काम हैं इनके लिए जैसे मातृत्व की आवश्यकता होती है वह हमारे घर में जो पिता हैं उनके हिस्से अधिक आयी है।

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