महाभारत -3

संसार तेरी कर्मभूमि है और तू अपने कर्मों के मापदंड से मापा जाएगा। निष्काम कर्म ही तेरा कर्म है। अपने से मुक्त होकर समाज के कल्याण के लिए कर्म कर। यदि समाज सुखी नहीं तो व्यक्ति भी सुखी नहीं। यदि वृक्ष कट जाएंगे तो तुझे भी फल नहीं मिलेगा। क्योंकि छाया और फल देना वृक्ष का कर्म है।

ज्ञान की नौका में पाप की नदी पार कर। ज्ञान अग्नि है जिससे मन शुद्ध होता है। ज्ञान योगी बन। ज्ञान की चरम सीमा कर्म सन्यास है। कर्म योग कर्म सन्यास से श्रेष्ठ है। कर्म-त्याग , निहित स्वार्थ से लिप्त है और जब तक मनुष्य कर्म-योगी नहीं बनता वह कर्म-सन्यास नहीं पा सकता। कर्म-सन्यास अथवा चरम ज्ञान का मार्ग कर्म-योग से है।

कर्म योगी उस कमल की तरह है जो जल में रहकर भी जल से अलग होता है। नौ द्वारों वाला शरीर रूपी घर में निष्काम कर्म करती कर्म-योगी आत्मा सुख पाती है। नश्वर जीवन को अर्थपूर्ण बनाओ क्योंकि यही ज्ञान का मार्ग है।

संशय,द्वेष,आकांक्षा पर विजय पाओ। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी है और शत्रु भी जब वह जितेंद्रिय हो जाता है तब वह अपना मित्र हो जाता है और अगर वह आकांक्षाओं में लिप्त खुद को नष्ट कर ले तो वह अपना ही शत्रु हो जाता है।

जीवन संतुलन का नाम है। कर्म योगी वही है जिसके जीवन में संतुलन है।ना अधिक खाने वाले को, न कम खाने वाले को। न अधिक सोने वाले को न कम सोने वाले को सफलता दोनों ही स्थिति में नहीं मिलती। इसलिए यह आवश्यक है कि एक सफल जीवन के लिए जीवन में संतुलन हो।

महाभारत -2

आज के महाभारत एपिसोड से श्रुति स्मृति पर आधारित नोट्स, लेक्चर लिखने के आदत तो स्कूल के दिनों से है आज तो टीचर कृष्ण जी ही थे।

हे पार्थ!
मैं जल में रस हूँ
सूर्य में प्रकाश हूँ
स्वरों में ओम हूँ
अग्नि में तेज हूँ
वृक्षों में पीपल हूँ
तपस्विओं का तप हूँ
प्राणियों का जीवन हूँ
विद्वानों में बुद्धि हूँ
मैं सब में हूँ
फिर भी सबसे अलग
मैं अविनाशी हूँ
मैं निर्गुण हूँ
मैं ही सृजन में
मैं ही विलोपन में
मैं ही सबका आधार हूं।

प्राणियों के ह्रदय में स्थित आत्मा हूं।
मैं वेदों में सामवेद।
देवों में इंद्र।
इंद्रियों में मन
सेनापतियों में कार्तिकेय
सिद्धों में कपिल मुनि
गजों में एरावत
धेनुओं में कामधेनु
दैत्यों में प्रहलाद हूँ
पक्षियों में गरुड़ हूँ
कभी न समाप्त होने वाला समय हूं।
मैं ही मृत्यु हूं मैं ही जन्म हूँ।
ऋतुओं में ऋतुराज
मुनियों में व्यास
कवियों में शुक्राचार्य
पांडवों में अर्जुन हूँ
यादवों में वासुदेव हूँ

महाभारत का ज्ञान

हर दिन हर युग के भीतर उसका कुरुक्षेत्र होता है। इसलिए अपने कुरुक्षेत्र का सामना करो।हे महाबाहो, जीवन-मृत्यु, विजय-पराजय के प्रश्नों में न पड़ो और युद्ध करो।
लाभ हानि दोनों ही सापेक्ष शब्द है। सुख-दुख लाभ-हानि। जय पराजय से ऊपर उठो पार्थ। व्यक्तिगत लाभ-हानि की तरह किसी क्षण को देखने से क्षोभ होता है।

निष्काम कर्म के मार्ग पर चलो। कर्म के बिना जीवन संभव नहीं पर कर्म फल हमारे वश में नहीं है। स्थितप्रज्ञ वही होता है जो न विजय से सुखी है और ना पराजय से दुखी।कर्म के सामप्त होने के साथ ही कर्म फल पर मनुष्य के अधिकारों की सीमा समाप्त हो जाती है। कर्म में कुशलता का नाम योग है मोह से मुक्त होकर कर्तव्य का पालन कर्म का कौशल है।

कर्म करो तुम ज्ञान से

कृष्ण ज्ञान ही धर्म।

कर्म योग ही धर्म है,

धर्म योग ही कर्म।

पर ध्यान रहे ये धर्म साम्प्रदायिक न हो,सनातन हो, व्यक्ति और समाज को जोड़ने वाला हो।

स्थितप्रज्ञ की पहचान क्या है?

आत्मा की अथाह गहराइयों से सोचने वाला स्थितप्रज्ञ है वह जितेंद्रीय है, वह कछुए की भांति है जो खुद को खुद में समेट कर रख लेता है और स्वयं को अपना कवच बना लेता है।

सामान्य पुरुष, विषय का ध्यान करता है। विषय उसे आसक्त बनाता है, आसक्ति काम को जन्म देती है। काम, क्रोध को जन्म देता है और क्रोध बुद्धि को छिन्न करता है।

इंद्रियों को वश में रखने वाला मुनि है , विषयों के प्रभाव से रहित ज्ञानी। जब संसार सोता है तो यह मुनि जागता है।

संसार के सोने से तात्पर्य है, कर्म फल की इच्छा से लिप्त होकर कार्य करने वाला समाज।कर्म फल की इच्छा मार्ग में बाधा है । यह काम और मोह से ऊपर उठने नहीं देतीं।

यदि भगवान यह चाहते हैं कि मनुष्य को उसके भविष्य का ज्ञान हो तो उसे अवश्य देते, इसलिए अपने भविष्य को अपने वर्तमान से निकलने देने की प्रतीक्षा भी कर्म ही है।

सामान्य मनुष्य व्यक्तिगत क्षुधा शांत करने के लिए वनों को काट देते हैं। जबकी जितेंद्रिय मुनि , वनों और वातावरण के सम्बंध में सोच के केवल कल्याणकारी कार्य करते हैं।

केवल व्यक्तिगत लाभों के बारे में सोचते जाना पाप है।

आँख का कर्म देखना है, कान का कर्म सुनना है, जिह्वा का कर्म बोलना है । ज्ञान कर्म यह मार्ग दिखाते हैं कि क्या देखा सुनना एवम बोलना है। मुनि ज्ञान कर्म करते हैं।

सामान्य मनुष्य नदियों की भांति होते हैं जो अपनी व्याकुलता में बहते हुए सागर में मिल जाते हैं। यह सागर वह मुनि है जो अपने तटों का उल्लंघन नहीं करता और वह नदियों की व्याकुलता को स्वयं में समेट लेता है।

ज्ञानी का कर्म निस्वार्थ होता है। कर्तव्य पालन पाप रहित होता है। ज्ञान को ढक देते हैं काम और वासना।

जड़ पदार्थ से अच्छी होती है इंद्रियां, इंद्रियों से अच्छा होता है मन, मन से अच्छी होती है बुद्धि, बुद्धि से ऊपर है आत्मा।

कर्म फल की आशा से मुक्ति ही अकर्म है। समझो जीवन धर्म एक यज्ञ है इसमें कर्म ही यज्ञ है। यज्ञ चार प्रकार के होते हैं। द्रव्य यज्ञ, जिसमें धन का त्याग होता है । तपो यज्ञ जिसमें तपस्या का जीवन होता है। योग यज्ञ जिसमें योगी जीवन जीते हैं , फिर होता है ज्ञान यज्ञ जो सबसे उत्तम यज्ञ होता है, इसमें कर्मफल, मोह, इच्छा, क्रोध की आहुति दे कर ज्ञान की प्राप्ति होती है। अतः ज्ञान योग का मार्ग भी कर्म योग से होता है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

अर्थात – विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है।

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति|

अर्थात – क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य अपना ही नाश कर बैठता है।