डायरी बचपन की

ये साल 2002 से 2012 तक की डायरियां हैं। नए साल में पापा गिफ्ट किया करते थे। इनमें प्रतदिन के खर्च से लेकर किसके साथ क्या ग़लत व्यवहार किये , कहाँ कहाँ सुधार और समय सदुपयोग की आवश्यकता है, कितना समय पढ़े नहीं पढ़े उसका हिसाब है। ये अब भी बाहर वाले कमरे में मम्मी जी की अलमारी में बने सबसे ऊपर वाले शेल्फ पर एक कार्टन में सुरक्षित हैं।
2013 के बाद से हाथ में स्मार्ट फोन आया , फिर बहुत कुछ बदल गया, अच्छे के लिए बदला या ख़राब के लिए ये तय नहीं किया जा सकता क्योंकि सब समय के साथ बदला।
2014 के बाद मेरे अपने प्रति सुर बदल गए , मैंने क्रिटिकल होना छोड़ दिया और पाश्चात्य जगत के अवचेतन मन विज्ञान वीडिओज़ देख के, उन सब की लिखी किताबें पढ़ के “लव योर सेल्फ” मेरी डायरी में ज़्यादा आने लगा। सोनी एक्सपीरिया के बाद सैमसंग नीओ का नोट मेरे साथ कागज़ से ज़्यादा रहने लगा।
2015 में घर की एक शादी में जब फोन चोरी हुआ तब फिर ठानी की डायरी में लिखते तो ये हाल नहीं होता, सब चला गया। फिर जिन मित्रों को जो कुछ भेजा था उन्होंने फारवर्ड किया कुछ फेसबुक पर से मिला। पर अब डायरी की वो आली आदत नहीं रही मुझे।
प्रमोद जीजा जी, मेरी बड़ी ननद सुषमा दीदी के पति एक LIC की डायरी हर साल देते हैं मुझे और आलोक को ।
पर वे अब म्यूज़िक क्लास के नोट्स लिखने के।काम आती हैं या एम ए हिंदी के किसी विषय के प्रश्न उत्तर यहाँ वहाँ लिखे जाते हैं। अब क्रम बद्ध डायरी नहीं होती सिरहाने।
25 दिसम्बर 2015 के बाद जियोनी मोबाइल के एवरनोट का।क्लाउड ज़्यादा करीब हो गया, ये तय था वो गायब भी हुआ या क्रेश भी हुआ , डेटा रहेगा, कहीं भी मिलेगा। जियोनी ने दो वर्षों का साथ दिया आम का अचार कविता उसी पर लिखी गयी थी, जिसपर पापा पहली बार तारीफ किये थे, और हैबिटेट में बोलने का अवसर मिला था। 2017 में ऑफिस के डवोप्स इंजीनियर मितेश सोनी वर्डप्रेस सिखाये और ब्लॉग बनवाये , यहाँ से शतदल शुरू हुआ, उसी के माध्यम से बाड़मेर के आदरणीय किशोर चौधरी जी से धरती के गोल होने जैसे फिर भेंट हुई, उन्होंने कहा वाह अच्छा है सहेजो , एक जगह सहेजने से धीरे धीरे प्रज्ञा की भी किताब आ जायेगी।अब ये जारी सफर है। यहाँ डायरी ही डायरी है। अब डायरियाँ डिजिटल हैं। लेकिन इनको सिरहाने नहीं रखना चाहिए , रात भर चार्ज में भी नहीं रखना चाहिए, बच्चे के बगल में लेकर बिल्कुल नहीं बैठना चाहिए, मैं तो लेकिन ये सब करती हूँ। देखिये ये अब सब नहीं करना चाहिए।मैं कभी odhisha जगन्नाथ पुरी नहीं गयी। पापा गए थे। उनकी बड़ी ज़रूरी डिजिटल डायरी जिसमें फोन नम्बर हुआ करते था समुद्र में बह गयी थी। पॉकेट से निकल कर ही बह गयी थी। “जा! पॉकेट में नहीं है अब!” बोल कर उनको अफसोस हुआ था।भला हो गूगल का अब कॉन्टेक्ट्स कहीं नहीं बहते।क्लाउड पर बने रहते हैं, बशर्ते की आपने सिंक चालू रखी हो। लेकिन जिनके बारे में सोच सोच कर आप डायरी लिखते होंगे वे किधर भी कहीं भी कॉन्टेक्ट में नहीं होते हैं। इंटरनेट पर भी नहीं, संवादों में भी नहीं। केवल स्मृतियों में।डायरी उन सभी बातों को समेट लेती है जिनकी केवल स्मृति शेष है।

2 thoughts on “डायरी बचपन की

  1. आपने मुझे मेरी पहली डायरी याद दिला दी , जो मेरे दिल में महफूज़ है , लेकिन मेरे पास नहीं।
    बहुत सुंदर लेखनी।

    Liked by 1 person

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