जिनकी कोई विधा नहीं,
जानकारी में जो अब तक सधा नहीं,
पाठक वर्ग क्या होगा
ये तक उनको पता नहीं,
पर लिखना तो है,
खोलना तो है मन का पट,
भीतर होती उठा पटक ,
लेकिन मालूम न हो कि किसको पढ़ाएं
और झिझक भी हो कि बात
किसके सहारे शहर-शहर जाए ,
वो लिए अल्फ़ाज़ों का कारवाँ
चल पड़े सोशल मीडिया पर,
कोट दर कोट दिख रहे हैं,
ब्लॉग दर ब्लॉग छप रहे हैं,
डायरी लिख रहे हैं
और धीरे-धीरे
क्या खूब लिख रहे हैं।