परवरिश जैसी सीरत वैसी

अपराधी पेड़ पर नहीं उगते
बचपन से तैयार किये जाते हैं
कुंठित कुपोषित मनोग्रन्थियों
से सुसज्जित समाज की
वंश बेल तले
वे पिलाये जाते हैं घूँट घृणा के
धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा रोज़-रोज़
भोलापन बालमन उसका शैशव
सब सोख लिया जाता है
स्वार्थ की अमरबेल तले।

तस्वीर साभार गूँज वाट्सप समूह

नींद के संतुलन

पिता जन्म के कष्ट नहीं समझते
नहीं जानते बच्चा गर्भ में
कैसे घुमड़ता होगा कैसे
रहता होगा पूरे नौ माह
फिर भी बाप के पेट से
छाती से शरीर से चिपका
क़ई बार अधिक सकून
पा सकता है बच्चा।

कुपोषित खोंझाईं बहुत अस्तव्यस्त
जन्मदात्री माँ के आँचल में
लप्पड़ लप्पड़ प्रेम भरा है
समझ से परे डर सहमा
एक शिशु बड़ा हो रहा है
होना समझदार एक पिता का
ममत्व के दूसरे सिरे का टुकड़ा है

बाप समझे न समझे गृहस्थी
कर सके मनो दशा का भान
इतने में ही प्रेम बचा रहता है
बच्चा चिपका पिता की पेट से
सुकून से सोया रहता है
स्त्री स्वप्न में निमग्न सोयी रहती है
सम्बन्धों की भोर मुस्कराने को
जग रही है भोर होने वाली है
पौ फटने के बाद भी नींद पूरी होती रहती है।

प्रज्ञा

24 मार्च 2020

9:08AM

मुम्बई