मेरी मनाली यात्रा 2016

यात्रा वर्णन

जैसे आरोह के बाद अवरोह आता है वैसे ही प्राकृतिक सौंदर्य दर्शन अपने अंतिम चरण पे आ गया। मनाली से वापसी के साथ हिमाचल की धरती को नमन कर रही हूँ। ये देश सौभाग्यशाली है और यहां बसे लोगों को एक तरह का आशीर्वाद प्राप्त है। दुर्गमता यहां जीने का अंदाज़ है। अनियमितताएं विधि का विधान और संतोष सहज माना है इन पहाड़ों ने। यह सोच जनमानस की आम विचारधारा है जो उसे आर्थिक कमी में भी हंसने की और पारिवारिक सुख के साथ कठिन जीविकोपार्जन के लिए प्रोत्साहित रखती है।

आगरा , मथुरा, चंडीगढ़, मनाली,रोहतांग के साथ साल 2016 की आम छुट्टियों का मौसम व्यतीत हुआ।
48 से 8 डिग्री तक जाने का अनुभव अच्छा था।

आगरा की चिलचिलाती धूप में ताजमहल की चमक देखी।
नक्काशी की सुन्दरता देखी, संसार के आश्यर्च में शामिल ताजमहल भी गुलामों के मेहनत की मिसाल है।

मथुरा की शाम में कान्हा जी की जन्म आरती का आनंद लिया,बाल रूप की सज्जा देखी। ब्रज में आनंद है।
कंस का महल देखा जिसपे सरकार की दृष्टि पड़नी बाकी है।
कंस की पत्नी की समाधी देखी। यमुना जी के तट को प्रणाम किआ, विश्राम घाट के दर्शन किये, नाविक के कहे अनुसार यहां कंस-वध के बाद कृष्णा ने विश्राम लिया था। फिर यमुना जी की आरती नाव पे बैठ कर ही संपन्न की जैसा की वहां का चलन है, घूमने आये सभी लोग नाव से ही आरती कर रहे थे पूरा चित्रण काफी अद्भुत रहा । पर्यटन के प्रति उदासीनता, मथुरा को निगम का दर्जा न होना ये सब आश्चर्य की बात थी मेरे लिए, ये शहर ऐतिहासिक है, इसको अनदेखा नहीं छोड़ना चाहिये वरना कितना इतिहास यूँ ही मिटटी होता जायेगा।

दिल्ली में एक रात विश्राम लिया, फिर चंडीगढ़ को रावाना हुए,एक शाम चंडीगड़ के साथ सुगना झील के किनारे बीती, फिर मनाली के लिए रवाना।

हिम जिसके आँचल में बसता है, हम भी वहां 3 रातें 2 दिन बसे, हलकी ठण्ड हमेशा माहौल में बनी रहती थी, एक स्थानीय रिक्शा चालक ने बताया , यहां सर्दियों में 3 फिट बर्फ जमती है , सैलानी मई , जून में आते हैं ।

1553 ई० में बनी हडिम्बा देवी का मंदिर देखा।
घटोकच की माँ और भीम की पत्नी को यहां शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

400 एकड़ में फैला ढुंगरि वन विहार देखा हिमालय की रखवाली में तैनात चीड़ के पेड़ निहारे बहुत लंबे , घने जंगल , बेहद अनुशासित, सैकड़ों साल का इतिहास थे।

तलहटी में बहती ब्यास नदी , उसकी धार से टकरा के बिखरा पहाड़ , पहाड़ों के बीच हम , छोटी छोटी धाराओं के बीच हिम्मत से बैठे हुए, हाथ से टकराता पानी, कलकल धाराओं का शोर , ठंडा , शीतल अनुभव। मुझे मेरी एक कविता लगातार याद आती रही।
– एक नदी
जब चली हिमालय की गोदी से
इटलाठी बलखाती सी।
मन में तरंग तन में उमंग,
धारा प्रवाह
लूँ जीत जगत को गाती सी।
जब धीरे धीरे प्रौढ़ हुई
साथ सभ्यता गाढ़ हुई,
पर बहते पानी की प्रवृत्ति
तृष्णा पीछे छोड़ गयी।

हिमाचल की देव भूमि में वसिष्ठ ऋषि के आश्रम का दर्शन किआ, गर्म जल के कुण्ड में थकान दूर की, राम मंदिर के दर्शन किये, पुजारी जी ने बताया की भीतर के काले पत्थर से बना मंदिर का हिस्सा 2000 साल पुराना है।

फिर ब्रॉडवे इन्न लौटते हुए बौद्ध मंदिर में कुछ तस्वीरें ली, शाम 7.30 बजे तक जब तक हम पहुंचे मोनास्ट्री बंद हो गई।

27 मई 2016, सुबह 5.50 पे हम रोहतांग के लिए निकले, घुमावदार , संकरा, खतरनाक, रोमांचक रास्ता, बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन का बनाया रास्ता। घाटी का रास्ता ।
ऊपर और ऊपर जाता हुआ 13000 फ़ीट की ऊंचाई, भारी भरकम बर्फ के कपड़े सरकारी निर्देश पर 250/- मात्र प्रति व्यक्ति। ऑक्सीजन की कमी को चीरता हुआ मन। मई में बर्फ पर चलने की ललक ।सामने की गाड़ियांं नीचे से ऐसी लग रही थी की जैसे स्टील के कॉकरोच चल रहे हों, हम भी बढ़े जा रहे थे , अपनी अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ठण्ड की मात्रा बखानते हुए, कभी नकारते हुए।

गुलाबा चेक पोस्ट पे परमिट ले कर रोहतांग दर्रे को देखने के लिए आगे बढे.

मुझे वो बर्फ भी आकर्षित करते और उनके नीचे बिछा परतनुमा पत्थर का पहाड़ भी, जहाँ तक मेरी जानकारी है ऐसे पहाड़ परत दर परत लावा के जमाव से बनते हैं कहीं से लगा की इस जगह के इतिहास में ज्वालामुखी रहा होगा, वैसे इसकी पुष्टि अभी बाकी है।

हम रोहतांग के रस्ते में एक ढाबे पे रुके मैग्गी और चाय का लुत्फ़ उठाया, ढाबे वाले ने बोला की ये सब रास्ते 15 नवंबर से बंद हो जाते हैं, फिर बर्फ का मैदान बन जाता है, कोई जन-जीवन यहां नहीं रहता । 6 महीने की बर्फ मई से पिघलने लगती है, जल का स्रोत व्यास नदी को जाता है। 15 मई से सब दुकान वाले लौट कर रोहतांग के रस्ते में अपना रोजगार 6 महीने फिर चलाते हैं यह चक्र चलता रहता है।

हम चलते हुए, दूर से दिखने वाले बरफिले पहाड़ों के बीच आ गए, ठण्ड अब अहसास से आगे थी पर जोश के काफी पीछे।
उजले ठन्डे बर्फ के पहाड़, सड़क की दोनों ओर दौड़ने लगे, लोगो ने उन पे ऐसे सन्देश लिखा था जैसे दरभंगा का मनोकामना मंदिर हो और कामना पिघल के पूरी हो ही जायेगी।
सड़क के ठीक किनारे की बर्फ पास से प्रदुषण के कारण काली प्रतीत हो रही थी, पर थी तो बर्फ।
किनारों पर पिघलती बर्फ बदलते आकार ले रही थी, झर झर गिरता थोड़ा थोडा पानी कहीं बहता हुआ एक झरने का रूप ले रहा था, एक नदी भर रही थी, एक सभ्यता आयुष्मान हो रही थी।
पहाड़ो पर और रोहतांग पर प्रदूषण रोकने के कड़े कानून बन रहे हैं, काबिले तारीफ हैं, गाड़ियों की संख्या पर भी नेल कसो गयी है, पहले जहाँ 6000 गाड़ियों को एक दिन में परमिट मिलता था अब सिर्फ 1200 को दिए जाते हैं, इसके कारण बाजार में मांग और पूर्ती का फायदा उठाने वाले साथ ही खड़े हुए हैं।

हम बर्फ पे करीब 2 घंटे रहे, तस्वीर लेने लिवाने का सिलसिला चला , जो हर मौके पर पानी ऑक्सीजन की तरह चलता रहता है, फिर तोह ये अलौकिक मौका था यहां कैसे पीछे रहते। थकान ने हमें जल्दी गाड़ी का रास्ता दिखाया।
लौटते रास्तों में हम बेहद थक चुके थे, पर नज़र परतदार कटान वाले पत्थरों और पहाड़ों को देख रही थी उस जगह के भौगोलिक इतिहास के मंथन के साथ।
हमने ये भी देखा की रोहतांग से उतरते हुए एक ऊंचाई तक वनस्पति के नाम पे पहाड़ों सिर्फ काई थी, थोड़ी मोटी, पर देवदार या चीड़ के पेड़ नहीं थे। जैसा की उस स्थानीय ढाबे वाले ने कहा था यहां 6 महीने 12 फीट बर्फ होती है, और बर्फ का मैदान होता है, ऐसे में स्वाभाविक है पेड़ नहीं पनप सकते।
हम बर्फ को झरने में तब्दील होने और रोहतांग को फिर बर्फ का रेगिस्तान बनने के लिए पीछे छोड़ आये हैं।
#मनाली #manali #summer2016

-प्रज्ञा, 28 मई 2016

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