बहन को पत्र

इलू ,

तुम्हारी एक-एक बनाई कलाकृति देख कर मुझे इतना सुख मिलता है जिसकी मैं चर्चा नहीं कर सकती। मुझे आँसू आते हैं, तुम सेलिब्रेट करो इसे क्योंकि तुमने अपना ईश्वर प्रदत्त गिफ्ट ढूँढ लिया है, देखो अपनी दक्षता कितना सुंदर बनाती हो। मुझे लगता है यही तुम्हारा साध रहेगा जिसके बाद और भी चीजें क्रमशः लगती जाएंगी, वैसे जैसे तुम चाहती हो। आशावादी रहो, ऊँचा सोचो, बड़ा सोचो, प्रगतिशील शब्दों का प्रयोग करो, जिह्वा पर किस क्षण सरस्वती बैठती हैं किसी को नहीं पता ।

गुनगुन के कत्थक के मूवमेंट बड़े ग्रेसफुल और नैसर्गिक हैं, मैं मानती हूँ की अपने आकर्षक छवि और हुनर से वो अभी ईश्वर प्रदत्त विशेष उपहार साधेगी।

गूँजन और शानू जी में जो विशिष्टताएं हैं वे भी समय के साथ खुद को खोजेंगे।

मैं तुम्हारी कलाकृतियों को देख बहुत सुखी हो जाती हूँ।

खूब प्यार और अशीर्रवाद।

दीदी
मुम्बई
21-04-2020

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ईशा ने मिथिला पेंटिंग सीखना शुरू किया है। ऐसे गढ़ती है जैसे हस्तकला लेकर जन्मी हो। उसे देख मुझे मेरी नानी की याद आ गयी जो पटना सिटी में गुरुद्वारे के पास मेहंदी लगाना सीखने जातीं मोर, पान के पत्ते बिना लाइन वाली छोटी कॉपी में नीली कलम से बनाया करती थीं।

मैं जब भी पटना सिटी जाती वो मुझे अपनी कॉपी से दिखाती थीं की आज ये सीखा आज वो सीखा। बड़ी नानी बहुत सुंदर मेहंदी लगाती थीं और छोटी नानी की बेटी भी, तो शायद नानी को इस महीन गुण के न आने पर सीखने का मन किया हो।

मैं सोचती हूँ मारवाड़ की धरोहर जो ईशा के अंदर भी है वो उसके हाथ को निपुण बनाती होगी।

क़ई बार ईशा को कहा है मैंने “तूम खोजो अपनी धरोहर, यू हैव नॉट अराइव्ड येट” । अब जब ये तस्वीरें देख रही हूँ तो लगता है इस जीवन में यही उसका गिफ्ट है जिससे वो अपनी पहचान बनाएगी। ईशा की मिथिला पेंटिंग सीखने के दौर की तसवीरें आपके साथ साझा कर रही हूँ।

Pragya
मुंबई

4 thoughts on “बहन को पत्र

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