खेल खेल में लाइफ स्किल

#अभिज्ञान_का_आर्मी_टैंक

सारा समय घर ही रहना है, एडुकेशनल टॉय , लेगो सेट अभी अच्छा ऑप्शन हैं। लेकिन पेरेंटल इन्वॉल्वमेंट नहीं हो तो कम उम्र के बच्चे इंटरेस्ट नहीं ले पाते। थोड़ी देर साथ लगे रहने के बाद जब इंटरेस्ट पटरी पर आ जाता है तब आगे बात खुद ही बन जाती है। खिलोने दे कर छोड़ देने से बच्चे सही से यूज़ नहीं करते और लगे पैसे बर्बाद होने की फीलिंग आने के बाद अभिभावक भी निगेटिव बोलने लगते हैं जैसे , “अरे कितना खर्चा करते हैं, इसको कुछ मतलब ही नहीं” , “सब कुछ तो दिया हुआ है ये खेलता कहाँ है” , “इसके बस का नहीं है” , “और क्या होगा तुमसे” वगैरह।

ऐसे हतोत्साहित करने वाले क्रम से बचने का सीधा सा उपाय है बच्चे को थोड़ा समय देकर इंटरेस्ट जगाना और वेल्यू दिखाना। बीच में मुश्किल लगने के कारण बच्चा जैसे ही छोड़े उसको हेल्प करना चाहिए और टास्क कंपलीट करवा देना चाहिए। कम्प्लीट टास्क शरीर में ऊर्जा का संचार करता है ।

प्रॉब्लम सॉल्विंग एक लाइफ स्किल है। काम बीच में छोड़ देने की आदत डे टू डे की छोटी-छोटी बातों को हम कैसे डील करते हैं इससे पकड़ी जाती है। बचपन में इससे निपटना आसान होता है। हमारा दिमाग हमेशा आराम की तरफ जाने की कोशिश करता है। ट्रेन कर के इसे अपने मुताबिक काम करवाना आना चाहिए। यह एक सतत प्रक्रिया है और खेल खेल में बच्चों में बिल्ड अप होती है।

लीगो सेट खिलौने बच्चों में प्रॉब्लम सॉल्विंग, डिसीजन मेकिंग को बढ़ावा देते हैं, इस सप्ताहांत हम सबने मिलकर इस पूरे सेट को अंजाम दिया। बच्चे मुश्किल खिलौने से बोर होकर उन्हें छोड़ देते हैं फिर उसके पार्ट्स इधर उधर फेके चले जाते हैं। इसलिए स्टेज 5 तक इस टॉय टैंक को मैंने साथ में बनाया उसके बाद जब टैंक का बेस रेडी हो गया और मैप बुक को पढ़ने का पैटर्न समझ आ गया फिर अभिज्ञान ने खुद पिक अप कर लिया। टैंक के टायर अधिक बार रिंग फँसाने का प्रयास करने के कारण टूटने लगे थे। हमारी सारी मेहनत चौपट होने वाली थी। एक तरह से आगे कुछ करने का फायदा ही न था। ऐसे क्रूशियल मौके पर पापा काम आते हैं। मोनू के पापा ने ग्लू गन वाली ग्लू से उस हिस्से को चिपका दिया, बेस सट्रक्चर अब इंटेक्ट हो गया। पहले से मज़बूत भी।

आर्मी से जुड़ी बातें आम तौर पर बच्चों में उत्साह जगाती हैं। अभिज्ञान बचपन से आर्मी मेजर आशु मामा जी और मिसाइल गर्ल चिंकी मौसी के बारे में मुझसे सुनते रहे हैं। हम सब एक बार भैया के पास खड़की गए थे और केम्पस में कुछ देर रुके थे तब से उसे बड़ा चाव है। तो लीजिये अभिज्ञान का कोगो आर्मी टैंक तैयार है। तस्वीरों का आनंद उठाईए।

शाद्वल (shaadval)

परसों दादा जी से बात हुई।दादी माँ के लिए लिखी दो कविताएँ उनको सुनाईं।दादा जी बहुत प्रेम से सुनते रहे हैं मेरी कविताएँ। एक समय था जब उनको मलाल था की मुझमें वो बात नहीं की मैं IIT वगैरह निकाल पाऊं , तब भी बहुत चाव से सुनते थे मेरी लिखी कविता या मेरा गाया कोई गीत। अब उनको मेरे जीवन का सब पहलू बहुत सुखद लगता है। अब कोई मलाल नहीं उनके मन में। उनकी बात से लगता है मैं जो कर रही जैसा कर रही सब बहुत अच्छा है , बहुत बढ़ियाँ है और वो मुझसे खुश हैं।

कुकू एफ एम पर पढ़े मेरे कुछ एक एपिसोड पापा ने उनको सुनवा दिए हैं जिसका मुझे संतोष रहता है कि उन्होंने सुना है। बाकी खुद से भी कॉल कर के उनको सुनाती हूँ। मैं ज़्यादा पूर्णियाँ जा नहीं पाती , अब तो लॉक डाउन ही हो गया लेकिन इच्छा है कि अब झट से एक बार हो ही आऊं, जब जैसे मौका लगे।

आज गूँज साहित्यिक समूह के वाट्सप मंच पर एक तस्वीर आयी जिसमें राजस्थानी किसान पृष्ठभूमि के दादा पोता हैं और अपने प्यारे से पोते को देख दादा के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान आयी हुई है।इस तस्वीर पर क्षणिका लिखनी थी।

मुझे भी मेरे दादा जी याद आये और उनको स्मरण कर के मैंने ये शब्द लिखे।

मरुस्थल से जीवन का मरूद्यान हो तुम
सिमट रहे कमरे की दूसरी छोर पर
जैसे सरपट दौड़ लगाने को तैयार
विस्तृत हरा भरा मैदान हो तुम ,
एक उम्र बाद जब सूद प्यारा होता है मूल से
जीवन के प्रसाद में पाया वही फूल हो तुम
मन का भीगा कोना, अंतस में दबी नमी
अधरों की मुस्कान, मेरा शाद्वल* हो तुम!

*शाद्वल –हरी घास।

Pragya Mishra