लिंकिन_पार्क

अरावली अपार्टमेंट, साउथ ऑफिस पाड़ा, राँची। फ़लैट #302 में बालकनी से लगा कमरा । वहाँ खिड़की से सटा था तीन फट्टे वाला बिस्तर। बिस्तर के बगल में लकड़ी की मेज़, मेज़ पर पिंक टेबल क्लॉथ। दो लीटर की पेप्सी का पानी बोतल और सारा दिन पानी पीती मेरी रूममेट अर्पिता बसु यहाँ रहती थी।

साल 2003, दीवाली की रात को कोक और 20 रुपये वाला कुरकुरे गटकते हुए अर्पिता बसु ने मुझसे कहा था ,
” प्रज्ञा तुम linkin park को ज़रूर सुन लेना। इतना अच्छा है तुमको ज़रूर पसंद आएगा।”

ये वो दौर था जब रंगोली शरन के पोर्टेबल सी डी प्लेयर पर सभी बारी बारी कब्ज़ा जमाते थे। बहरहाल मुझे अंग्रेज़ी समझ मे तो दूर बोलनी भी नहीं आती थी तो जितने गाने अर्पिता ट्यून इन करती रहती उसे ही सुनते सुनते दोनों ट्रिग्नोमेट्री बनाते थे। हमने कैल्कुलस हमेशा अलग अलग कमरों में चुप मार के बनाई।

ब्रायन एडम्स औऱ अर्पिता के सानिध्य से जब सीधा कविताई की भाषा में ही अंग्रेज़ियत वाली पिकचरों से प्यार हुआ था तब तक दिल्ली पहुँच चुकी थी। याद नहीं प्रीति औऱ अर्पिता के साथ आख़िरी दिन राँची का कैसा था। हम सब रोये तो थे। हमारे जूनियर्स अदिति, मधुरिमा, उलूपी, शिल्पी, मेघा(इसका नाम नहीं याद आ रहा इसने हमें प्लेनचिट सिखाई थी, ये मुझे बहुत प्रेम करती थी, इतना की इसने अपना सारा स्टैम्प कलेक्शन मुझे दे दिया था , ये एक गाना बहुत अच्छा गाती थी -“जीवन से भरी तेरी आँखें , मजबूर करें जीने के लिए, मगर इसका नाम नहीं याद आता आज ) हम सब रोये थे, वो भी रोये थे।

जुलाई 2004 में श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में एडमिशन के इत्मिनान के बाद, मैं पापा के साथ 1548 outram lane के गेट पर खड़ी थी, अंदर अंधेरा सा था , भूरी चमकीली टाइल्स वाला बड़ा हॉल, कोने में फाउंटेन था , जहां आगे चल कर स्वाति रॉय ब्लू पजामे और ब्लू हेयर बैंड में अपनी आइकोनिक तस्वीर लेने वाली है। लोहे की कुर्सियाँ लगीं थीं, लड़कियाँ छोटा सा सोनी कलर टीवी देख रही थीं जो आने वाले तीन सालों तक मेरा इंग्लिश टीचर होने वाला था। टी वी के ठीक सामने एक लड़की बैठी थी जिसके वहाँ होने के कोई आसार नहीं थे। वो अर्पिता थी।

“अर्पिता तुम!!!!!!!”
“प्रज्ञा तुम !!!!!!!!!!!”

डेस्टिनी होती है। समय की चाल किसी ने नहीं देखी। पर समय सबको देखता है, समय सबका बाप है। अब अर्पिता तीन साल मुझे देखने वाली थी और मैं उसे लेकिन वक़्क्त थोड़ा और मेहरबान हो गया और स्वाति राय , रायना पांडे, कृतिका किसलय, फिर 1548 के अन्य नायाब साथी भी मिले एक घोंसले में सिमटे उड़ने को तैयार पंछियों की तरह। स्वाति बैनर्जी के साथ वाले रोचक किस्से कभी और लिखूँगी। आज उसका नाम ज़ेहन में आते से पीड़ा उभर आयी है जिससे वो गुज़र रही। द नेमसेक की कहानी याद आती है मुझे । मैं स्वाति की ज़िंदगी मे आभासी तौर पर शामिल हूँ लेकिन उसका दुख हम सभी के दिल मे ज़िंदा मौजूद रहेगा। कोरोना काल में मां बाप से दूरी औऱ ऐसे बारी बारी दोनों का गुज़र जाना कितना भारी है ये समझती हूँ मैं। पापा की बहादुर बिटिया स्वाति बनर्जी यू एस में पति के साथ रह रही और अपनी बेटी को एक शानदार परवरिश दे रही है।

2006 में बड़े पापा 1548 में एक कम्प्यूटर मुझे दे गए थे, यह बहुत काम का निकला इसपर ही याहू मेसेंजर , रेडिफ बोल, ऑरकुट और अन्य चैटिंग के गुर सीखे। ट्रिपल आई टी के एक सख्त मिश्र बंदे से लड़ाई के बाद उससे ही जिस एक शब्द की सही स्पेलिंग सीखी थी वह था -” male chauvinism “.
हमारे शाही कमरे में फिट कम्प्यूटर पर जो काम हमने सबसे ज़्यादा किया वो था तरह तरह के गाने लगा कर ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के कनवर्जन्स या इनऑर्गेनिक के नोट्स बनाना। बेसिक की प्रोग्रामिंग तो घन्टा कभी नहीं की मैंने। पत्ता नय ये कम्प्यूटर एज अ सब्जेक्ट कब आना बंद होता। फिज़िकल केमिस्ट्री बहुत भारी था। उसके टाइम गाना नहीं सुन सकते थे । तब चुप मार के करी पढ़ाई हमने। लेकिन आगे ज़िन्दगी ने झख मार के मास्टर्ज़ इन कम्प्यूटर एप्लिकेशन ही कराई ।
अच्छा ये जो घन्टा शब्द अभी अभी मैंने उपर यूज़ किय्या है न वो साल 2018 के बाद बने यू पी के फेसबुकिया मित्रों की वाल पोस्ट्स अथवा कमेंट्स से बतौर ट्रेनी उठायी है।

2006-7 के दौरान में अर्पिता ने वही पुरानी बात बोली, लेकिन अब तरीका नया था, मैं नयी थी, मेरा नाम नया था!
“प्रग्गी, तू linkin park सुन तुझे मज़ा आएगा, यू नो इट हैंज़ दिस रिबेलस हीलिंग इफेक्ट यू वुड फॉल इन लव” ..

धीरे-धीरे अर्पिता ब्लैक आइड पीस पर आ गयी और लिंकिंग पार्क की बातें नहीं होती थीं। मैं रोज़ ट्वेल्व मिड नाइट से थ्री ए. एम. तक स्टार मूवीज़ , एच. बी. ओ., पर जीने के लिए जाने लगी।पढ़ाई करती थी, ये मत सोचिये नहीं करती थी। खालसा कॉलेज के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में पहले साल में पहली पोज़िशन , दूसरे साल में दूसरीं पोज़िशन और तीसरे साल में तीसरी पोज़िशन टॉप थ्री बरकरार था अपना आख़िर दिव्या माटा, रितिका नागपाल , आशिमा अग्रवाल भी यार थे अपने यारी की नेकनामी में हमने पोज़िशन भी शेयर कर लिये आपस में लेकिन मेहनत करी जी तोड़ । तो खूब सारा पढ़ने के बाद होस्टल में होती थी दो मूवी, दिन को डाइजेस्ट करने के लिए स्लीपिंग पिल्स की तरह ।

वक्त बदला, हम बदले, दूरियाँ आ गयीं, पर दिलों में नहीं, एक हवाई जहाज की दूरी बस। मैं याद करती हूँ सबको। सबने मुझे कभी न कभी बताया है वो भी याद करते हैं। पर सारे मेरे दोस्त मेरे ही जैसे निकले हम सब बातें बहुत कम करते हैं। अर्पिता ने तो 2012 में सोशल मीडिया को भी टाटा कर दिया , अपने आप से अपनी लड़ाई में साल 2018 में अर्पिता ने जान लिया कि उसकी डेस्टिनी शेयर मार्केट्स की स्टडी है औऱ इसी में उसका मन लगता है एंड देयर शी इज़।

अर्पिता, आज 24 जुलाई 2020 को अचानक लिंकिंग पार्क लगा ही दिया यू ट्यूब पर। तुम्हारी मेहरबानी से मुझे इतनी अंग्रेज़ी तो आती है कुछ सालों से। बस याद ही नहीं रहा था कि ये सुनना था मुझको। आज सुन लिए सब गाने , सबकुछ डाइजेस्ट करने के लिए , स्लीपिंग पिल्स की तरह।

आप ये पढ़ रहे हैं तो आप भी सुनिये , सभी सुनिये , अच्छा है। मैंने नाहक ही 2003 से 2020 कर दिया केवल एक गाना सुनने के लिए । मैं किचन में खड़ी कभी भी लगा सकती थी,
बट यू हैव टू टच अ सर्टेन लो टू फील इट एंड दन यू लिसन इट

Pragya Mishra
24 जुलाई 2020
4:05AM
PC – आलोक मिश्र, साल 2011 का जुलाई

आम लोग

मेरे पतिदेव आलोक परसों ही दसहरी आम लेकर आये थे, बड़े ही मीठे, जिनको काट कर नहीं, मोदी जी जैसे खाते हैं। बेसिन लग में ठाढ़ होकर। वैसे ही खाये हम भी। आप सबको वह अलौकिक साक्षात्कार याद तो होगा, मुझे भी है।

सुबह सुबह उठ कर किचन गयी तो देखा भाँजी आराधना ने #मैंगो_पीपल्स को एकदम सलीके से धोखार पखार कर डाले में लगा कर रख दिया था। मेरे दिमाग में यकायक आया , “अरे वाह #आम_लोग” ।

सभी #मैंगो_पीपल्स कतार में थे, सभ्य मनुख के जैसे। मैंने उनका #मानवीकरण #अलंकार कर देना उचित समझा।

पहले मैंने सभी की हरी खड़ी फोटो निकाली तो लगा इनके आँख नाक भी होते तो मज़ा आता। दोनों बच्चे मेरे सो रहे थे तो ये सब टाइम-पास की आज़ादी इस वक्त थी।

आम लोगों का मानवीकरण करने के लिए मुझे अब एक मार्कर की ज़रूरत थी। इस लक्ष्य प्राप्ति हेतु अंशु-मोनू के पापा का त्वरित स्टेशनरी लोक ज़िंदाबाद (पिछले दस वर्षों से इस #स्टेशनरी_लोक को ठीक करना छूना मना है, क्योंकि तहियाने पर इनका समाने गुम जाता है। फिर मुझे ही खोज खोज के देना पड़ता है तब तक ई खीजते रहते हैं, परन्तु प्रयोग करने के लिए सामान लेकर यथावत उलझी हुई स्थिति में रखना एलाउड है)।

कैमलिन का काला मार्कर निकाल कर सभी फलों पर भाव सहित भौं आँख मूँह बना दिये।उसमें कोई शादी में रूठे फूफा नज़र आने लगे ,तो कोई भोली सी दीदी, कोई गुस्सैल मित्र तो कहीं अनभिज्ञ अजनबी, कोई ऐसा छात्र जिसको कक्षा में कुछ समझ नहीं आ रहा लेकिन चूँकि पहले रो में बैठा है तो एटेंटिव लगना ही पड़ेगा, कोई लोक डाऊन में अपना दस हजार रुपया बिजली बिल लेकर तमसाय पड़ा है, अडानी को गरिया रहा है। कोई खिड़की से सर टिकाए साहित्यिक भाव में बादल मेघा बरखा को देख देख रचना करने के फिराक में पड़ा है।

बस ऐसे ही ले आयी इन आम किरदारों को।