ड्राई फ्रूट बॉक्स

किसी बात को लिख देने का ख़्याल आने के बाद टाल मटोल कर छोड़ देने से बात रह जाती है। चाहे बात बच्चों के खिलौनों की हो या संस्मरण साझा करने की । एक ही वाकया लिख दें तो कहानी पर ख़त्म हो जाती है बात। कथानक और उपकथानक की व्याख्या करिएगा तो उपन्यास बन जाती है बात। बहरहाल यहाँ न कोई कहानी है, न लिखनी है उपन्यास। मुझे तो बस सोना है और सोने से पहले “यहाँ कुछ लिखें” जो रात नौ बजे शुरू किया था, समाप्त न करूँ तो करवटों में रात निकल जाएगी।

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