डायरी 3 अगस्त 2020

सभी मित्रों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं। अगला दिन शुरू हो चुका आज रक्षाबंधन है, कोविड में फीका पड़ गया त्योहार लेकिन प्रेम से मनाएंगे। प्रेम ही बचा रहेगा, प्रेम ही हमें बचाएगा। प्रेम ही हमारी आख़िरी उम्मीद भी है।

दिल बैठ जाता है दोनों बच्चों का बंद घर में निकलता बचपन देख कर। कभी तो डाँट देती हूँ पढ़ने के लिए, कभी फिर छोड़ देती हूँ टीवी या लैपटॉप देखने के लिए , कभी कभी साथ किताबें भी पढ़ती हूँ। कभी पढ़ाती हूँ कोर्स के बुक। लेकिन दौड़ दौड़ खेल नहीं सकते। मुंबई में छठे माले पर पाँच महीने से बंद आठ और तीन साल के मेरे दो बच्चे अब नीचे जाने की ज़िद नहीं करते ।

कल तीन वर्षीय अंशुमन ने अच्छी पैंट, शर्ट मोज़े और नई सैंडल पहनी तो धीरे से कुम्हलाई आवाज़ में बोला “कार में जाना है” जैसे उसे जवाब में ना की उम्मीद थी पर शायद पूरी हो जाने की ललक। हम उसे लिफ्ट से लेकर सीधा कार में गए, ठाकुर व्हिलेज के एरिया में राउंड मारा, थोड़ा आगे जाकर मागठने प्रेटोल पम्प से पेट्रोल भरवाया बीस लीटर क्या जाने कहाँ जाने के लिए पर भरवाया , फिर कौआ उड़ान लेकर बोरोवली नेशनल पार्क छूते हुए घूम गए , वापस गंतव्य की ओर। अंशुमन नींद में थे पर सोए नहीं , एक टक देखते रहे स्ट्रीट लाइट, गगन चुंबी इमारतें, हल्की बारिश में भीगी सड़क । अभिज्ञान, भाई को सामने की सीट पर प्यार से पकड़ खिड़की से देख पाने में समर्थ बनाये हुए थे।

बच्चे कुम्हला गए हैं। नाखुश हैं। उनको दौड़ना है, खेलना है,उन्हें वे दोस्त चाहिए जो उनके विकास का हिस्सा हैं, माता पिता दो कमरे के मकान में कितना भी प्यार लुटा लें सारी ज़रूरत एक बच्चे के विकास की नहीं मुहैया कर सकते। कोरोना बचपन चुरा रहा है। जब हम बच्चे थे हमारे माँ बाप की आर्थिक स्थितित या अन्य सामाजिक परिस्थितियों ने हमारा बचपन चुराया , हमारे बच्चों का बचपन एक महामारी चुराने चली आयी। तमाम खुश रहने के प्रयासों में कभी कभी उदासी घिर जाती है।

इन सबके बीच आज अचानक सोच रही कि अब किसी बात के लिए दोनों बच्चों को नहीं डाटूंगी , ज़्यादा प्रेम से रहूँगी, प्रेम से ही इम्युनिटी है। खिले खिले रहें मेरे बच्चे, वे ही जीवन का मकसद लगते हैं। वे जब सो जाते हैं तो उन्हें देख कर हर रोज़ लगता है कि जितना प्रेम कर सकते थे उतना किय्या नहीं, जितनी कहानियाँ सुना सकते थे उतना कहा नहीं। नई किताबें मंगवाईं हैं इकतारा प्रकाशन भोपाल से ,उदयन वाजपेयी की घुड़सवार कहानी संग्रह से अंशुमन को कहानियाँ सुनायी है, एक बहुत लंबे राजा की कहानी जो लेट नहीं सकता, झुक नहीं सकता , बस आसमान से पर्चे फेंक फेंक मंत्रियों को उटपटांग फरमान देता और अपने कद के कारण बीवी से वियोग में जीता है।

कहानी सुनते सुनते अंशुमन सो चुके हैं। उनकी तबियत आज ठीक नहीं इसलिए मेरी नींद भी उड़ी हुई है, घबराहट है, कोरोना का समय है घबराहट स्वाभाविक है, हमारी सोसाइटी में काफी कोरोना मरीज़ हुए एक-एक कर वे सब ठीक भी हो गए हैं। यूँ तो हम नीचे नहीं जाते, किसी से नहीं मिलते फिर भी क्या पता कैसे आ जाए यह वायरस।

डर है इस समय इससे इनकार नहीं। आलोक एक ज़िम्मेदार पिता हैं। उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा है घबराओ मत , मैंने उनका हाथ पकड़ कहा है मुझे उनपर भरोसा है। बच्चों के मामले में मुझे हमेशा उनपर अधिक भरोसा रहा, कारण है उनकी अपनी परवरिश बहुत शानदार हुई मेरी सास एक बहुत ही सशक्त महिला हैं, बचपन अच्छा समेटा उन्होंने अपने बच्चों का, परिणाम स्वरूप मेरे पति आलोक बेहद सन्तुलित औऱ व्यवहार कुशल व्यक्तित्व के धनी हैं।आसानी से विचलित नहीं होते। मेरे बच्चे भी ऐसे हों जैसे मेरी सास के बच्चे हैं।

जाग रही हूँ, देख रही हूँ बगल में सोए अंशुमन को। बच्चे का कण कण प्रेम से बनता है। मेरी नौ घन्टे की नौकरी, घर बर्तन, कपड़े के बाद कितना कम प्रेम बचता है मुझमें। इस प्रेम को चिड़चिड़ाहट में बदलते देर नहीं लगती। मैंने इतनी मनोविज्ञान की जानकारी के बावजूद इस बच्चे पर हाथ उठाया है इस कोरोना दौर में जिसके नियंत्रण की पुरज़ोर कोशिश जारी है। थोड़ी सी धूप मेरे हिस्से का विटामिन डी मुझे भी चाहिए और मैं एक सफल माँ रहूँगी। मेरे बच्चे प्रेम से बड़े होंगे। वे मुझसे प्रेम करेंगे। मैं उनके जीवन में शामिल रहूँगी । उनके पास मुझसे जुड़ी अच्छी यादें होंगी। ये समय जल्दी बदलेगा, नीचे झूलों पर बच्चे जल्दी जाएंगे।

नींद की बिसात बिछते ही घटनाक्रम अपनी चाल चलने लगते हैं । बातें कौंधने लगती हैं, दोनो अँगूठे स्वार्थी होकर गूगल इंडिक कीबोर्ड पर रुकना नहीं चाह रहे।

एक नोटपेड में लिखे कुछ नोट्स यहाँ संकलित कर लेना चाहिए, वे अच्छे विचार थे। कल या परसों ही मैं जाने माने व्यक्तित्व रवि कुमार रवि जी के फेसबुक पेज पर सफ़रनामा देख रही थी जिसमें परिचय हुआ कानपूर के अन्तर्राष्ट्र्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार दम्पति आदरणीय श्रीमती ममता किरण और श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी से। तमाम अच्छी बातों में जो बातें मैंने अपने साथ रख लीं वो आपसे साझा करती हूँ।

कविता मनुष्यता की आख़िरी उम्मीद है,
कविता मनुष्यता की भाषा है।

कवि, घृणा के पक्षधर नहीं हो सकते, साम्प्रदायिक नहीं हो सकते।

हिंदी रचना में माहिया छंद विधा के बारे कल ही सुना मैंने , श्री बाजपेयी की यह पँक्तियाँ सुनी:

जीवन एक लोरी है
झूला सपनों का
औ वक़्क्त की डोरी है।

श्री बाजपेयी साहित्यिक विधाओं के संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अपने टॉक में दोहा विधा पर बल दिया।

आज मैंने अनवारे इस्लाम सर को कॉल किया । उनको अपना लिखा दोहा भेजा था उसमें बहुत त्रुटियाँ थीं। उन्होंने नियम बताए और प्रयास करने कहा, उसी क्रम में बात हुई। अभी बहुत सीखना है। उन्होंने कहा मेरे लेखन में बिखराव है बातें स्पष्ट नहीं होती। यह पढ़ने और शब्द भंडार पुष्ट करने से बढ़ेगा। उन्हें 1993 -94 के दौरान बाल साहित्य चकई के चकदुम के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था यह जानकर बड़ी हार्दिक प्रसन्न्ता हुई। उनकी कविताएँ अंशुमन और अभिज्ञान प्लूटो बाल साहित्य मैगज़ीन में पढ़ते हैं।

फेसबुक फीड्स में दरभंगा में बाढ़ की स्थिति के बारे में देखा था। ननद गीता दीदी से बात हुई। काफी दिक्कत में हैं लोग अभी वहाँ। जन जीवन अस्त व्यस्त है। घुटने भर पानी तीन चार दिन से लगा।

मैथिली भाषा के कवि मणिकांत अंकल जी से भी बात की । चूंकि इस समय दरभंगा शुभंकरपुर बाढ़ पीड़ित क्षेत्र है, बड़ी समस्या उतपन्न हो गयी है। मेरे बचपन से जुड़ी सुंदर यादें हैं उनके आंगन से तो मन विकल हो गया, बाढ़ में डूबे उनके घर गलियारे देख। मैंने उनके साहस के लिए उनको धन्यवाद कहा , कितना अद्भुत है इस पीड़ा में वे निरन्तर रचनाएँ कर रहे और सुख दुख प्रभु को अर्पित करते चल रहे। उनकी रचित एक शिव नचारी बहुत पसंद आयी मुझे जो आज मुझे बड़ा ढाँढस दे रही वह इस प्रकार है:

नचारी
——–
उबारु आब हे शंकर
कते मन घोर कयने छी
नैना नोर देने छी
भटकलहुँ भरि जीवन हम
किए ने छोड़ धयने छी
नैना नोर देने छी।

कहू की हम अपने सँ
बूझी शंभु सकल बतिया
नुकयने हम सब दुखरा
रहय छी दाबि क’ छतिया
कोना क’ नाम अढरण ढर
अहां के लोक रखने छी
नैना नोर देने छी।

कते दिन धरि एना रखबय
अपन संतान के दानी
अहाँ सन तात के रहितो
कहू जे हम सब कानी
बचाबू लाज त्रिपुरारी
चरण अहींक धयने छी
नैना नोर देने छी।

अज्ञानी हम छी बाबा
ज्ञानक लेस नहि हमरा
लिखय छी गीत के बूझिकय
लिखा जाइए ई फकरा
मणिकांतक बोल के सुनियौ
एना किए अंठैने छी
नैना नोर देने छी।

-मणिकांत झा, दरभंगा, ३१-७-२०२०ई०

इस नचारी को आप गूगल लिंक पर सुन सकते हैं।

नचारी-उबारु आब हे शंकर
स्वर – भागवताचार्य राजीव कृष्ण भारद्वाज
रचना – मणिकांत झा

सोशल मीडिया एक बड़ा ही शक्तिशाली स्कूल है हमको तय करना है कि हमें क्या देखना है, क्या सीखना है, किनको अपनी मित्र सूची में शामिल रखना है किस स्तर के फीड और स्टोरी अपनी आँखों के सामने से गुज़रने देना है। जीने का तरीका बदल रहा है। सीखने का ज़रिया बढ़ रहा है।

अंकल से बात के दौरान मैंने उनसे कहा कि आज मित्रता दिवस पर क्या आप कुछ नहीं लिखे, उन्होंने मैथिली में कहा और यह रचना भेजी:

मित्रता दिवस
————–
भरि दुनियाँ मे शत्रु ने कियो
दिवस कथीक मनाबी
तइयो दू चारि पाँती लिखि क’
अपना मनक बूझाबी ।

सकल विश्व मे धूम मचल
मित्रक लेखे दिवस विशेष
हमरा भीतरी मनक पुछी
बारहो मास बरोबरि एक ।

एक दिन मे कते सम्हारब
फेसेबुक पर पांच हजार
ट्यूटर व्हाटसेप गनती कयने
संख्या बढ़ल देखब अपार।

हमरा सब तँ अनुगामी छी
ओ वसुधैव कुटुम्बकम्
तखन कहाँ स्थान भेटय छै
कहिए मै आ कि हम।

हीत अपेक्षित सर संबंधी
अभिवादन सबके एकहि संग
मणिकांतो छथि एहि समाज मे
रंगा गेलनि एक रंगा रंग।

-मणिकांत झा, दरभंगा, २-८-२०

अंकल ने मेसेज कर कहा – “ई तँ अहींक कहला पर लिखायल नहि तँ अंठैले छल”

समय साक्षी है कि मणिकांत अंकल की लेखनी पर काली मैया और भगवान शिव का अशीर्वाद है अगर उसमे से एक भी रचना आज मेरे अनुरोध पर हुई तो मेरे लिए ऐतिहासिक क्षण है 3 जुलाई 2020, इस तारीख को सहेज कर रख रही हूँ।

आगे दिन ढलने के क्रम में रिंकी झा नाम की एक फेसबुक मित्र का स्वरचित कविता वीडियो देखा , सुना और सुन कर बार बार सुना। कविता का शीर्षक था प्रेम।

कितनी प्यारी लड़की, कितनी प्यारी कविता , कितना सहज प्रेम।दो दिन में पचासों बार सुन चुकी हूँ रिंकी झा की ये मैथिली कविता। मैं ज़्यादा नहीं जानती रिंकी को, इसी कविता के माध्यम से जान रही, हम कुछ समय से फेसबुक मित्र हैं । यह ज़रूर कहना चाहूँगी ये इतना सुंदर है कि हर कोई इस कविता को अपनी भाषा मे अनुदित करेगा।

कविता लिंक यहाँ दे रही आप भी सुनिये ।

आज का कुल घटना क्रम इतना ही। काफी कुछ घटित हो गया एक ही रविवार में । अंशुमन इत्मिनान से सो रहे हैं। बुखार उतर गया है ।

मुम्बई

3.46AM

4 thoughts on “डायरी 3 अगस्त 2020

  1. महानगरों के जीवन में बच्चों का बचपन विलीन हो जाता है । दिल्ली में रहते हुए भी इसी स्थिति से गुजरना पड़ रहा है ।
    सशक्त सराहनीय लेखन ।

    Liked by 1 person

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