एक औरत,
नापसंद थी,
बिल्कुल वैसी
होने लगी हूँ।
सोचते सोचते
कि हो न जाना
उसके जैसी
ठीक वैसी
होने लगीं हूँ

जैसे प्रतिबिम्ब में
सूरत कोई और हो
उपस्थित कोई औऱ
चाहती कुछ और थी
करती कुछ और

खुद से रोज़ मिलना
अच्छी बात नहीं होती
देर रात नींद से फिर
मुलाक़ात नहीं होती।

न मिलने का दुःख
मिल के खोने का दुःख
दोनों दुःख तो बड़ा कौन
सोचने लगी हूँ
एक औरत
नापसंद थी,
ठीक वैसी
होने लगी हूँ।

Pragya Mishra
7 अगस्त 2020