#चोलुटेका_नदी_का_पुल (मूल लेख का अनुवाद)

कोरोना आपदा के दौरान में हमने ऐसे क़ई प्रेरक लेख पढ़े हैं जिसने हमें नई दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया है।
मोटिवेशनल स्पीकर प्रकाश अय्यर (लेखक, वक्ता और नेतृत्व कोच, पूर्व एमडी किम्बर्ली क्लार्क लीवर) का लिखा यह लेख सोशल मीडिया पर प्रचलित हो रहा है। अकेले मुझे ही कई वाट्सप ग्रुप से आया।

पहली निगाह में फॉन्ट छोटा देखकर मैंने अनदेखा किया लेकिन जब तस्वीर देखी तो लगा अरे , ये पुल किस काम का है, नदी तो बगल में बह रही है। फिर मैंने लेख पढ़ा । एक बार फिर याद आयी मुझे वह किताब “हू मूव्ड माई चीज़” । जिसमें हमें निरन्तर बदलाव और भविष्य के लिए अपनी कम्पिटेंसी को निखारने नया सोचने और पिछ्ली सफ़लताओं पर अटके हुए न रहने की बात की गयी है। सभी यह लेख पढें इसलिए कुछ अंशों का अनुवाद कर के डालने की कोशिश कर रही हूँ


इस आर्टिकल में प्रकाश अय्यर होंडुरास , मध्य अमेरिका की एक नदी चोलुटेका पर बने पुल की कहानी बता रहे हैं उसके ज़रिए उन्होंने रूपक गढ़ा है कि किस प्रकार हठात होने वाले परिवर्तन भविष्य के लिए की गई हमारी तैयारियों को बेकार कर सकते हैं इसलिये किसी भी स्थिति के लिए मानसिक तैयारी रखना एक सीख है। मैंने इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद गूगल पर थोड़ी और छान बीन तो तथ्यों पर और भी लेख देखे।


चोलुटेका नदी पर बने पुल की कहानी कुछ इस प्रकार है। होंडुरास में तूफान की समस्या आये दिन बनी रहती है तो प्रशासन ने सोचा कि ऐसा पुल बनाया जाए जो यहाँ खराब मौसम की मार झेल कर यथावत बना रहे। इसके लिए 1996 में जापान के एक फर्म को कांट्रेक्ट देकर पुल का काम शुरु किया गया। 1998 में जब चोलुटेका नदी का पुल आम जनता के लिए खोला गया तब लोग इस महान इंजिनीरिंग मार्वेल की तारीफ करते नहीं थकते थे। यह पुल चोलुटेका का गौरव था।


उसी साल अक्टूबर में, होंडुरास में मिच नाम का एक भयंकर तूफान आया और चार दिनों में 75 इंच बारिश हुई जितना की वहाँ छः महीनों में होती थी। चारों ओर तबाही पसर गयी। चोलुटेका नदी में आयी बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को अपना ग्रास बना लिया और तकरीबन 7000 लोग मरे। होंडुरास में केवल एक पुल को छोड़ कर बाकी सभी पुल तबाह हो गए। नवीन चोलुटेका का पुल टस से मस न हुआ।

यद्यपि पुल की कीर्ति पताका शोभायमान रही फिर भी एक समस्या खड़ी हो गयी। भयानक बाढ़ और बारिश में पुल तक आने जाने वाली सड़कों का नामों निशान मिट गया। इतना ही नहीं उस साल चोलुटेका नदी ने अपनी दिशा ही बदल दी। वह पुल तूफान की मार तो झेल गया पर न तो वह नदी पर का पुल रहा , न ही उससे कहीं पहुँचा जा सकता था ।


यह घटना 22 वर्ष पहले घटित हुई लेकिन इससे मिलने वाली सीख आज किसी भी कल खण्ड से ज़्यादा प्रभावी है।आज दुनिया हमारी कल्पना से भी तेज बदल रही है। चोलुटेका का यह पुल बदलाव के साथ न बदलने पर बेकार हो जाने का सबसे बढियाँ उदाहरण है। यह पुल बताता है कि हमारे आस पास तेज़ी से बदलते परिवेश के साथ यदि हम भी बदलते नहीं गए तो हम असंगत रह जायेगें। हमने अपने आप को परिवर्तन के अनुकूल नहीं बनाया तो हमारे कैरियर, व्यापार और जीवन के साथ वही होगा जो चोलुटेका के शानदार पुल के साथ हुआ।

अपने जीविकोपार्जन की विशेषज्ञता में लचीलापन लाना नई ज़रूरतों के मुताबिक पढ़ते और सीखते रहना आज समय की सबसे पहली मांग है। कार्यक्षेत्र में भूमिकायें एवं विशेषज्ञता जल्द निरर्थक होने लगी हैं । अचानक ऐसे परिदृश्य उभरे हैं जिनमें भौतिक कार्यस्थल निरर्थक होते जा रहे हैं और आभासी कार्यस्थल उभर कर प्रचलित होने लगे हैं।


हमारी चुनौती यह है कि हम किसी समस्या के लिए सबसे अच्छा समाधान बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। जबकि हम भूल जाते हैं कि समस्या ही स्वयं बदल सकती है। हम सभी परिष्कृत उत्पाद या सेवा के निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।इस संभावना के बारे में सोचे बिना कि उस चीज़ की जरूरत ही गायब हो सकती है।

हम पुल पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इस संभावना को नजरअंदाज कर कि नीचे नदी की दिशा ही बदल सकती है। “बिल्ड टू लास्ट” एक लोकप्रिय मंत्र हो सकता है लेकिन “बिल्ड टू एडाप्ट” (अनुकूलन) असंगत होने से बचने का एकमात्र रास्ता।


प्रकाश अय्यर अपने लेख के अंत में यह सुझाव देते हैं कि कार्यालय की दीवार पर चोलुटेका पुल की एक तस्वीर ज़रूर लगाएं जो याद दिलाता रहे कि एक ऐसे व्यवसाय या कैरियर का निर्माण हो जो परिवर्तन के लिए अनुकूल हो सकता है अन्यथा हम उसी पुल की तरह रह जाएंगे जिसके नीचे न बहती है न जो किसी दिशा में कहीं जाता है ।