#आलू_अदौड़ी #कुम्हरौड़ी #तिलोड़ी #बिहारी #व्यंजन

अब यह भी कोई बात हुई कि तुम हर विषय पर लिखो ही, हाँ पर ये भी तो सोचो बताओगी नहीं तो किसी को पता कैसे चलेगा। हमारे देश में जितनी संस्कृतियाँ हैं उतने व्यंजन हैं और सबकी अलग अलग दास्तान , स्थानीय पहचान।

अरे! यह तो खाने पचाने की बातें हैं, लिखकर बताने से वास्ता ही क्या। वास्ता है! इसका वास्ता है ग्रामीण पद्धतियों से जिनको छोटे शहरों से निकल कर मेट्रो में भी जीना चाहिए, जो बिहारी लघु उद्योगों तक न सीमित रहें बल्कि और राज्यों के दिलों में भी घर कर पाएं। वास्ता है रिश्तों के मीठे मीठे क्षणों को याद करने से। तुम ध्यान करो अपना सादा बचपन वह प्रेम का दॄश्य जब मेहनत से दाल या कुम्हड़ , उड़द की दालों के छोटे बड़े मूंगा-मोती आंगन में बिछते पकते थे ,पसरे हुए, किसी अन्य समय , किसी अन्य स्थान पर परिजनों के घर जाने की प्रतीक्षा करते थे।

मैं कक्षा छः या सात में थी दरभंगा से छुट्टियों में पूर्णियाँ गयी थी। दादी माँ ने कुम्हड़ की सब्ज़ी बनायी । इतनी स्वादिष्ट। मैंने रस के गोलों को देख सहसा अबोध प्रश्न किया था:
“दादा जी, अदौड़ी कुम्हरौड़ी किस पेड़ में उगता है?”
सब ठहाका लगाने लगे, मैं मूँह ताकने लगी।

ऐसे ही दादी माँ मुझे – “अक्कसकाँकोढ़ कहाँ के नेहतन” नहीं कहती थीं। मेरे प्रश्न ही हमेशा मंगल ग्रह से अभी-अभी उतरी बाला सरीखे होते थे, वैसे आज भी हाल यही है।

मैं सुखसेना जाती तो मेरे पिताजी के मेमेरे भाई अरुण अंकल की बहनें अंजन पीसी , रंजन पीसी मुझे याद दिलातीं की मैं धान देख कूद-कूद पूछती – “ये क्या है? ये क्या है?” और मैथिलों के बीच हिंदी में टपर-टपर बोलती बच्ची सबके दुलार से तरह-तरह के उत्तर सुन खुश होती रहती।

आज का दिन साल 2020 में फ्रीज़र में डब्बा भर अदौड़ी की खन खन में जैसे कोई टाइम मशीन फ़िट है। कड़ाही में भूनते मेरा दिमाग न जाने कहाँ-कहाँ दौड़ रहा। लॉक डाऊन में इस समय कोई सब्ज़ी घर में है नहीं, आलू प्याज़, टमाटर, अदरक, लहसुन और कुछ अन्य मसालों के योग से इन बड़ियों की स्वादिष्ट सब्ज़ी बन सकती है।

सोच रही हूँ , क्या ज़रूरत है कि सूती साड़ी में लिपटी दुबली पतली कर्मठ औरत धूप में बैठ कर चादर भर चने दाल की बड़ियाँ सुखाये। बड़ी पाड़ते-पाड़ते गिनते जाए कि यह छोटे भाई के यहाँ, यह भाभी के यहाँ, इतना बहन के घर, इतना माँ के घर। इतना बेटी के हॉस्टल और बाकी जब बच्चे घर आयेंगे तो बनाऊंगी । इतनी मेहनत कोई क्यों करता होगा भला, प्रेम ही उद्देश्य है।

लोग टी. वी. देख कर , चार ऑनलाइन गिफ्ट आर्डर कर के , अपने लिए ज़रा सा पका-खा कर के भी तो दिन काट रहे हैं। तभी ऐसी निष्ठा के लोग अब कम हुए जाते हैं जो प्रेम से परिवार के सभी लोगों के लिये जी जान लगाए रहते थे। मैं खुद भी तो ऐसी न हुई या शायद सब समय के साथ चल रही हूँ।

तो क्या समय कहीं कहीं किसी के लिए रुक गया है, ताकि प्रेम की पैदावार बचा कर रखी जा सके। ताकि जीता रहे बड़े शहरों में बसा हिंदुस्तान। अगर हमारे जीवन में ऐसे लोग हैं तो उनको सर आँखों पर बैठाया जाना चाहिए।

बिहारी घर में बड़ी पाड़ने का प्रचलन बड़ा पुराना है। मैंने पूर्णियाँ में देखा था कि पुरानी सूती साड़ी पर , सूती चादर पर, खाट पर , बड़ी सी मचिया पर, कभी छोटे छत तो कभी बड़े छत पर, मधुबनी बाज़ार की खनकती लाल चूड़ियों से सजे गौरवर्ण सुंदर हाथों से दादी माँ जल्दी जल्दी कुम्हरौड़ी, अदौड़ी के गोले टब्काती सुखाती जाती थीं ।
लगे हाथ साबूदाना के पापड़ , आलू चिप्स , चिरौड़ी, तिलोड़ी के भी अच्छे दिन लग आते थे। वे भी डब्बा भर बाराती बनने सरीखे तैयार हो जाते थे । बारिश या बाढ़ के दिनों में जब सब्ज़ियाँ सहज उपलब्ध नहीं होती तो यह बड़ी-पकवान जाठरनल शांत रखते हैं , गुस्सा सन्तुलित रखने का भी काम भी हो जाता है।

बिहार में कुम्हरौड़ी, अदौड़ी, तिलोड़ी, चिरौड़ी , चिप्स, साबूदाना पापड़ की सूखी पकोड़ियां बतौर उपहार व्यवहार शादी, नैहर विदाई आदि में जाता है। घर घर में माँ नानी-दादी लोगों की कमर टूट जाती है बना-बना कर । आज कल मिक्सी घर घर है । पहले केवल सिल बट्टा ही हुआ करता था। तब औरतें या कोई फुटकर काम करने वाली घरों में पूरा मिक्स स्टॉक पतीला भर कर सिलबट्टे पे पीस कर ही बनाती।

मैंने भी पूर्णियाँ , दरभंगा में रहते मार्च 2002 तक सिल बट्टे का प्रयोग किया है। कुशहर में मेरी ननद सुषमा दीदी और रोसड़ा में किरण दीदी आज तक लाइट नहीं रहने पर सिल बट्टे का प्रयोग करते हैं।

बिहार के लोग जो बाहर रहते हैं, उनके माँ-बाप भाभी-ननदें यह बड़ी पकवान बनाकर भेजती रहती हैं। एक मज़ेदार मनोविज्ञान भी है कि स्थूल विषय पर मनमुटाव होने के बावजूद हिस्से की पकोड़ियां डब्बे में पड़ती हैं। भोला-भाला बिहारी मन बड़े मीठे हृदय सम्वाद के साथ फसादों के बीच रिश्ते जीता रहता है, चाहे बुढ़ापे तक ऐसे ही तना-तनी में प्यार निभाते ही प्रस्थान हो जाए।

हमारे घर ये बड़ियों का सुंदर सम्राज्य मेरी सास लेकर आती थीं। आज कल वे कुशहर में हैं, जीवन वहाँ कष्टप्रद है फिर भी मुंबई से ज़्यादा संतोष है। जब आराधना स्नातक की पढ़ाई करने मुंबई रहने लगी तो किरण दीदी रोसड़ा से भी भेजने लगीं। कुल मिला कर यह प्रेम जनित सम्पत्ति मेरे घर चल कर आती रही है। पूर्णियाँ से माँ भी कोई कसर नहीं छोड़ती मैं जब भी आती हूँ या इलू जब भी आती है हमें नैहर का पूरा अनुभव प्रेम पूर्वक देती रहीं हैं वो।

जब कोरोना नहीं था साल में एक दो बार बड़े भैया इधर मुंबई ज़रूर आ जाते या ननद सुषमा दीदी हमारे घर किसी पूजा पाठ के अवसर पर ज़रूर आतीं , भोज होता उसमें तिलोड़ी तली जाती थी, रंग बिरंगी चिरौरी होती, बैगन अदौड़ी की सब्ज़ी बनती। मेरी सास लौकी के साथ भी अदौड़ी बनाती हैं। कुम्हड़ की सब्ज़ी सबसे अच्छी उबले हुए आलू से बनती है। बैगन अदौड़ी की सबसे अच्छी सब्ज़ी मेरी ननद सुषमा दीदी बनाती हैं। ननद गीता दीदी भी यह सब घरेलू उत्पाद बनाने में माहिर हैं।

बिहार और बाढ़ का इतना पुराना रिश्ता है कि धूप में सुखा कर भोजन तैयार रखना हमारे संस्कृति में शामिल हो गया। जीवित रहने की ललक बिहार को बड़े रोचक तरीकों से किसी भी स्थिति में संगत रखती है। ऐसे उदाहरण हमें हर प्रांत की संस्कति में मिल जाते हैं। वे सब लोक साहित्य का हिस्सा बन जाते हैं।

मेरी सास को मैं मम्मी जी कहती हूँ। मम्मी जी खास कर मेरे लिये फूल गोबी का सुखौत भी लेकर आती थी। वो बनाती तो देसी तरीके से प्याज़ टमाटर के झोर में बनता , मैं बनाती तो मंचूरियन या शेजवान वाला बना देती। बाबू जी को कभी कभार खाने में मेरा वाला भी अच्छा लगा जाता था। लेकिन देसी वाला हमेशा हिट है।

कुछ चित्र इस संस्मरण के साथ साझा कर रही ताकि अन्य राज्यों और संस्कृतियों से आये हमारे मित्र अदौड़ी, कुम्हरौड़ी, तिलोड़ी, चिरौरी के अंतर को देख सकें। उन्हें पहचान सकें।

परसों सुख़नवर के सम्पादक महोदय आदरणीय अनवारे इस्लाम जी से लेखन शैली को लेकर बात हो रही थी तब उन्होंने एक बात कही की सुंदर लिखने के लिए लोक साहित्य ज़रूर पढ़िए जहाँ जीवन है वहीं सरसता है।

” यह जन है गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा ”

मैं समझती हूँ की कोरोनकाल और लॉक डाऊन में शहरी पढ़े लिखे बुद्धिमान लोग जो मिचलाहट और अवसाद में घिर रहे हैं जीवन समाप्त कर रहे हैं उनको भी लोक साहित्य और पद्धतियों से जुड़ जाना चाहिए एक अच्छा जीवन दोबारा लिखने के लिए , दोबारा उठने के लिए, लोक पद्धतियों में जिजीविषा है। जीवन अपने राग अनुराग के साथ चलता रहता है । सुखों की कोई वारंटी नहीं होती , दुःख की भी अपनी अवधि होती है और यह चक्र सबके जीवन में एक बराबर चलता है। जीवन का रस बना रहे यह कोशिश होनी चाहिए।

हम जीत जाएंगे ,
लिखेंगे नए गीत नए दौर में,
सहेज कर पुरानी पद्धतियों को
बनाकर नाड़ सरीखी धरोहर
रखेंगे जीवन हरा भरा
रहेंगे परिवार खुशहाल
प्रेम पूर्वक पलेंगे बच्चे
एकल परिवारों में भी
बड़े होंगे बनकर सन्तुलित नागरिक।

लोक बचाएगा लोक !!!!


कुम्हरौड़ी – कुम्हड़ और उड़द दाल के बेसन से बनता है
अदौड़ी – चना दाल के बेसन से बनता है
तिलोड़ी – उड़द दाल और तिल को सान कर बनता है
चिरौरी – चावल के आँटा को पानी मे उबाल सूखा कर बनता है

कुम्हरौड़ी और अदौड़ी की सब्ज़ी बनती है, आलू, बैंगन, लौकी इत्यादि के साथ। बिहारी भोज में बहुत प्रचलित होता है। अदौड़ी और तिलोड़ी को तेल में तल कर खाते हैं भूजा के जैसे, बहुत स्वादिष्ट होता है।

Pragya Mishra
8 अगस्त , 2020
शाम 4:00 बजे
मुंबई