अनिश्चितता (uncertainty)

गुम गए लोग
महानगरीय मकानों में
क्या हुआ,
मालूम नहीं,
कितनी अनिश्चितता है।

स्वाद के पकवान,
नए कपड़े, नया सामान
मिले हँसी के दो पल
इस खिन्न समय को।

उपेक्षित हैं, उदास आँखें,
स्वाभिमानी लोग
बीमार बच्चे, बेबस माँ
बहला कर सो चुकी भूख।

समय ने ऐसी ली करवट
मंडरा रहा ख़तरा, अस्तित्व पर
अहलकार हो गए अनावश्यक
अनिश्चितताओं के दौर में।

मंहगाई,बेरोज़गारी,अवसाद औऱ
दुर्लभ स्वास्थ सुविधाएं
कैसे उबर पायेगा सीधा-सादा नागरिक
ऐसी अनिश्चतताओं के दौर में।

*अहलकार – कामगार,कर्मचारी, स्टाफ

कुछ मित्रों के सुझाव के बाद रचना में फेर बदल किआ, अपडेटेड कविता भी यहाँ प्रस्तुत –

अनिश्चितता
गुम गए लोग
महानगरीय मकानों में
क्या हुआ,
मालूम नहीं,
कितनी अनिश्चितता है।

रुचिकर पकवान,
नए कपड़े, नया सामान
मिले हँसी के दो पल
इस खिन्न समय को।

उपेक्षित हैं, उदास आँखें,
स्वाभिमानी लोग
बीमार बच्चे, बेबस माँ
बहला कर मार रही भूख।

समय ने ऐसी ली करवट
मंडरा रहा ख़तरा, अस्तित्व पर
अहलकार हो गए अनावश्यक
अनिश्चितताओं के दौर में।

मंहगाई,बेरोज़गारी,अवसाद औऱ
दुर्लभ आरोग्य सुविधाएं
कैसे उबर पायेगा सीधा-सादा नागरिक
ऐसी अनिश्चतताओं के दौर में।

गुम गए लोग
महानगरीय मकानों में
क्या हुआ,
मालूम नहीं,
कितनी अनिश्चितता है।

रुचिकर पकवान,
नए कपड़े, नया सामान
मिले हँसी के दो पल
इस खिन्न समय को।

उपेक्षित हैं, उदास आँखें,
स्वाभिमानी लोग
बीमार बच्चे, बेबस माँ
बहला कर मार रही भूख।

समय ने ऐसी ली करवट
मंडरा रहा ख़तरा, अस्तित्व पर
अहलकार हो गए अनावश्यक
अनिश्चितताओं के दौर में।

मंहगाई,बेरोज़गारी,अवसाद औऱ
दुर्लभ आरोग्य सुविधाएं
कैसे उबर पायेगा सीधा-सादा नागरिक
ऐसी अनिश्चतताओं के दौर में।

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