हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

जिन शब्दों को सोने से पहले इत्मिनान के लिए सुना करते थे कौन जानता था कि आज़ाद भारत में एक दिन वही जगाने के लिए गाया जाएगा और किसे पता था कि मुहब्बत की ज़बान मेरी अपनी मिट्टी में जन्मी हिंदी की बहन उर्दू के लिए सरकारी महकमे से बेदखल करते जाने का फरमान चलाया जाएगा। सब कह रहे हैं क्या प्रॉब्लम है। प्रॉब्लम है। मुझे सब कुछ चाहिए, हर वो बात जिसने भारत को उसके मौजूदा रूप तक पहुंचाया है। जिसने भी फुट डाली उसने केवल राजनीतिक कारणों को हथियार बनाया है।

इस दुनिया को ज़्यादा से ज़्यादा आपस में सम्मिलित होना होगा अगर ऐसा नहीं हुआ तो तमाम तरह के भेदभाव जैसे गोरे – काले, लड़का – लड़की में अंतर, समलैंगिकता को अप्राकृतिक बताना जैसी बातें बरकरार रहेंगी। हमारे बच्चों के भविष्य के लिए जनता को टुच्ची राजनीति करने वालों से बहुत चालाकी और सूझ बूझ से दूर रहना होगा। उनको पहचानना होगा। कोई हक़ नहीं हैं किसी भी देश की हुक़ूमत को कि वो आराम से फैलने की चेष्टा करती जाए और नागरिक सुविधाओं में कटौती करती जाए। कौन सी माँ बच्चों को उनके हाल पर छोड़ कर खुद अच्छे अच्छे कपड़ों में रहती है , कोई ज़िम्मेदार माँ ऐसे नहीं करती अपनी प्रगति के साथ अपने बच्चों की पढ़ाई परवरिश पोषण सब देखती है। किसी भी स्थिति में यही उम्मीद जनता की भी है।

आप जब आये अपनी सरकार ले के हमने प्रगति के विडीओ देख देख आपको हाथों हाथ वोट दिए। पिछला सब भूल कर हम सब भी भारत में स्मार्ट शांघाई जैसे शहरों के सपने देखते थे। लेकिन हमारे साथ बेईमानी हुई है । जनता को पावरलेस किया गया साप्रदायिक धर्म का काढ़ा पिला पिला कर। मार्किट मे हर सेक्टर में कम्पीटिशन को पनपने से रोक दिया गया । सीमा पर विवाद, देश मे चुनाव प्रचार ही चुनाव प्रचार, केवल बाहरी देशों का दौरे करना, देश मे मोब्लिंच बढ़ते चले जाना, सोशल मीडिया पर पढ़ी-लिखी ओपन विचार वाली औरतों को हुजूम में आकर स्लट-शेम करना कि वो डर जाए और औकात में रहे, बोले भी न , हिम्मत भी न करे। देश को स्थिरता देने के बजाए एक के बाद मैनपावर और रिसोर्सेस क़ी बर्बादी करते जाना। लाइन जो लगनी शुरू हुई खत्म नहीं होती। महामारी तो अब आयी है , लोग तो यहाँ नोट बंदी के समय से ही मरे जा रहे है। मैंने खुद व्यापारियों को ख़त्म होते देखा है।

देवा की अपनी दुकान हो चुकी थी, मार्किट से कर्ज़ लेता व्यापार करता चुकता चलता । उसने हमारे बाद टाटा टियागो गाड़ी ली। आलोक उसी की दुकान से स्टेशनरी लाते, हाल के घटना चक्र में उसका धंधा चौपट हो गया, बिज़नेस ख़त्म ही हो गया इस उथल पुथल की नीतियों से। एक दिन अचानक उसकी दुकान ने गयी तो स्टाफ ने बताया , “क्या जाने कहाँ गया, बीवी बच्चों को एक रात में लेकर दुकान छोड़ के चला गया। मेरी शादी के दस सालों से उसे देख रही थी मैं एक मेहनती आदमी तंगी में खत्म हो गया क्या जाने कहाँ गया।

यूट्यूब, वाट्सप सब जगह प्रायोजित तरीके से दिमाग का मदरबोर्ड बदलने जैसे पोस्ट चलने लगे। जिस देश को वैज्ञानिक पद्धति में आगे बढ़ना था उसे दिन रात स्कूल में कॉलेज में नुक्कड़ पे सभाओं में प्रभावशाली स्पीकरों के माध्यम से एक नये तरह का इतिहास बताया जाने लगा।

रोज़गार नहीं है। समानता के अवसर ख़त्म हो रहे। हर जगह निजीकरण हो रहा शिक्षा और स्वास्थ सुविधा की गुणवत्ता गिरती ही जा रही। राज्यों के साथ ऐसे बर्ताव होने लगा है जैसे दिल्ली सल्तनत है आपकी बाकी राज्य अपने हाल पर छोड़े गए छोटे मोटे देश।बिल्कुल पारदर्शिता नहीं है। भविष्य को लेकर कितना संशय है। लोग आत्म हत्या किए जा रहे औए कोई मतलब नहीं है विभागों को।

हम वाकई राम भरोसे हैं। ईश्वर रक्षा करें।

Pragya jha