आज कल सोशल मीडिया पर पूर्वकालिक मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों के खिलाफ मुहिम छिड़ी है। आरोप है कि उन्होंने आक्रांताओं को महान बताया।

सनद रहे कि एक समझदार राष्ट्र अपने बच्चों को कोमल मन वाली उम्र में कभी घोर हिंसा नहीं पढ़ाता उसको बताने का एक तरीका होता है। इसलिए बेकार की दलील है ये कि मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों के कारण हमें केवल मुगलों के बारे में अच्छा अच्छा बताया गया।

बच्चा बच्चा मुगल बर्बरता के बारे में स्कूली जीवन मे भी पढ़ता आया है। साथ ही जो अच्छे थे उनके बारे में भी। चोला चलुक्या वाले चेप्टर छात्र एग्ज़ाम के लिए याद करते रहे। पर मुस्लिम शासक दिल्ल में ज़्यादा रहे। दिल्ली हमारी राजधानी है सैलानी की तरह हम बचपन से उसका इतिहास सुनते रहे इंटरेस्ट से कोर्स में पढ़े ।

सिलेबस में रहता सब कुछ है याद वो ही रहता है जो हमको इंटरेस्टिंग लगता है, इसका मतलब ये नहीं कि मुस्लिम शिक्षा मंत्री ने जानबूझ कर ये चाल चली ऐसा कुछ भी नहीं था , कौन ऐसे अलगाववादी दिमाग हमको दे रहा और क्यों दे रहा सब जानते हैं। वाट्सप पर आए पोस्टर हमको एक प्रोपगेंडा के तहत भड़काते हैं।

घटिया उपद्रवी तत्व तो दोनों तरफ हैं। डिवाइड तो सालों से है लेकिन उसको सम्भाल के जीते तो आ ही रहे थे। विशेष वर्ग बोलकर पोस्टर फैलाने से क्या देश में प्रगति का माहौल बनेगा?

महाभारत के अंत में पढ़िए साफ साफ लिखा है कोई भी राष्ट्र आगे बढ़ने के लिए अपने इतिहास में घटित विषमताओं को उठा उठा कर वापस नहीं कुरेदता सीखता है आगे देखता है। काहे कर रहे हैं हम लोग ऐसा?

इस देश की महानता मुख्यतया संस्कृत भाषा, अध्यात्म, साहित्य और योग है। उसको बराबर बढ़ावा दिया है हर सरकार ने ।

इस देश की गुलाम मानसिकता वाली बहुल जनता है जिसको अपनी भाषा, अपने धर्म औऱ अपनी संस्कृति पर गौरव नहीं है उसको चाहिये बच्चे बस अंग्रेज़ी बोलें, बाहर देश ही चला जाये, न साथ मे मंदिर ले जाते न पूजा पाठ में बैठाते, सबको अपना गाँव संस्कार फॉलो करना टैकी लगता है, बच्चा में वर्नाक्यूलर आ जायेगा, कूल नहीं रहेगा, मॉडर्न बनने के चक्कर में सबको 25 साल तक अंग्रेज की औलाद चाहिए जिसका subway में स्टायल मार के खाना आर्डर करने का कॉन्फिडेंस का तरीफ होता है और एक पंडित की पढ़ाई किया शिक्षक का बेटा गरीबी में जीता है। हिंदी, संस्कृत, कला पढ़ने वाले के लिए इज़्ज़त नहीं है। आम पब्लिक को केवल तकनीकी शिक्षा में अपना बच्चा चाहिए ऐसे में संस्कति और इतिहास को कौन मार रहा है यह प्रश्न हमें खुद से पूछना है।

हमारे पुराने शिक्षा मंत्री सभी ज़हीन पढ़े लिखे लोग थे जिन्होंने मेहनत की है और तब जा कर कोर्स डिज़ाइन किया था। उसमें बदलाव लाना है लाइये पर हिन्दू मुस्लिम कर के बेकार का भारत में अस्थिरता पैदा करना एक षड्यंत्र है।

बहुमत जनता अपने लोगों में झांकें। हिंदू जनमानस इतना जड़ हो चुका है कि वो राम के नाम पर तलवार उठाता है लेकिन गीता नहीं उठाता राम चरित मानस नहीं उठाता, वेद नहीं पढ़ता, खुद से पूछिए आपने संस्कृत के बढ़ावा के लिए क्या किया, क्या आपने कालिदास का साहित्य पढ़ा , क्या आपने गीता पढ़ी , वेद पढ़े , उपनिषद पढ़े । अब्दुल कलाम आज़ाद सब पढ़े। अपना दही को खट्टा कोई नहीं कहता। इतना मुसलमान हावी होता ना भारत पर तो फ़ारसी देश से विलुप्त ही नहीं हुआ होता।

मुसलमान भी इस देश की मिट्टी में मिल गया साथ मे सन गया साथ लड़ा साथ मरा। विघटनकारी वाट्सप पोस्ट सब पैसे देकर राजनेताओ के नैरेटिव बनाने का काम है ।

बिघटन कारी बुद्द्धि को बढ़ावा देना राजनीति करना है बस । इससे बचें । धर्म बचता है उसको फॉलो कर के उसको पढ़ के न कि इतिहास पर दोषारोपण और तलवार उठा कर।

प्रज्ञा