ज़माने_धत_तेरी_की

#ज़माने_धत_तेरी_की

आगमन के मंच पर आज आदरणीय वरिष्ठ कवि श्रीमान बाजपेयी जी से इस रचना का ज़िक्र सुना। मौजूदा सन्दर्भ में सटीक लगती है। हमारा देश , इसकी राजनीति , इसका बहुमत एक दर से जड़ता के दौर में हैं । आज सीधा विरोध का स्वर बुलंद करना आ बैल मुझे मार बोलना है । ऐसे में हास्य व्यंग्य की कविताओं का सहारा वाकई लुत्फ भी है औऱ समाज मे चेतना भरने का ज़रिया भी। श्री बाजपेयी जी ने कहा निर्मल हास्य स्थितियों से उतपन्न होता है और अभी जिस भारत दुर्दशा में हम सब हैं उससे बड़ा हास्यास्पद काल क्या होगा।

वाकई स्वर्ग में बैठे काका हाथरसी जगत कृपाला से पैरवी करते होंगे कि :
” म्हारी कविता को युग यो सै मणे जान देयो सारी पोलिटिक्स घणी क्युटिपायी हो रखी है।” तो गोपाल दास नीरज जी ने उनको ठंड रखने कहा होगा और दोनों ने स्वर्ग में मिलकर अकर्मण्यता की चुटकी ली होगी :

हे सुनो रे, सुनो रे, सुनो रे सज्जनो
अंधी प्रजा अंधा राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा
टका सेर जनता टका सेर नेता
हम तो मर गये हाय ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

अरे अंधी प्रजा अंधा राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा
टका सेर जनता टका सेर नेता
हम तो मर गये हाय ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

देश को खा गैइ नेतागीरी खेत को खा गया सूखा
अरे खेत को खा गया सूखा
हे देश को खा गैइ नेतागीरी खेत को खा गया सूखा
खेत को खा गया सूखा
अरे धरम को खा गये पण्डित मुल्ला करम हुई गया भूसा
को: करम हुई गया भूसा
ए कौव्वे खायें हे
वाह भय्या
कौव्वे खायें दूध-मलाई हँस मरे हाय भूखा
ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

ए राम-राज के घाट पे अब तो रह गये केवल झण्डे
अरे रह गये केवल झण्डे
ए राम-राज के घाट पे अब तो रह गये केवल झण्डे
रह गये केवल झण्डे
अरे झण्डों को भी ले कर भय्या चले सड़क पर डण्डे
चले सड़क पर डण्डे
अरे कौन देश का ध्यान करे
क्या बात है
कौन देश का ध्यान करे सब हैं कुर्सी के
क्या
सब हैं कुर्सी के पण्डे
ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की
ज़माने हत तेरे की

होऽ
दर-दर मारी फिरे सच्चाई बन कर यहाँ भिकारी
अरे बन कर यहाँ भिकारी
हो दर-दर मारी फिरे सच्चाई बन कर यहाँ भिकारी
बन कर यहाँ भिकारी
अरे राज करें महलों में बैठी
दगाबाज़ मक्कारी
ए जितने doctor बढ़े हे
जितने doctor बढ़े देश में उतनी बढ़ी बीमारी
हाय रे हाय
उतनी बढ़ी बीमारी
ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

अरे अंधी प्रजा अंधा राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा
टका सेर जनता टका सेर नेता
हम तो मर गये हाय ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

दस-दस साल जो tax नहीं दे वो बन जाये leader
अरे वो बन जाये leader
हाँ दस-दस साल जो tax नहीं दे वो बन जाये leader
वो बन जाये leader
अरे ख़ून-पसीना एक करे जो वो हो जाये फटीचर
वो हो जाये फटीचर
कौन अकल की बात करे
कौन अकल की बात करे भइ सब पर चढ़ा सनीचर
ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

ए हवा चली पच्छिम की ऐसी कला हुई बेढंगी
अरे कला हुई बेढंगी
हो ओ ओ हवा चली पच्छिम की ऐसी कला हुई बेढंगी
कला हुई बेढंगी
अरे अंग्रेजी का राग अलापे हिंदी की सारंगी
हिंदी की सारंगी
आज़ादी के बाल सँवारे
वाह भय्या
आज़ादी के बाल सँवारे हाय कर्ज़े की कंघी
ज़माने धत तेरे की
ज़माने धत तेरे की

अरे अंधी प्रजा अंधा राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा
टका सेर जनता टका सेर नेता
हम तो मर गये हाय ज़माने धत तेरे की
धत तेरे की
हत तेरे की

गोपाल दास नीरज

9 thoughts on “ज़माने_धत_तेरी_की

  1. Pingback: निर्मल हास्य | शतदल

  2. वो कहते कहते चले गए
    हम आज भी ऐसे पढ़ रहे
    थी अत्तित कि बाते वो
    हम आज भी वर्तमान में देख रहे।।

    वो कहते जनता अंधी
    हम आज भी अंधे बन घूम रहे
    देश को लूट रहे है लोग
    हम आंखों अपनी देख रहे।।

    कह ना सकते,कर ना सकते
    रोना किस्मत में लिखा
    थे भारतीय,है भारतीय
    भारत को लूटते देख रहे।।

    कल भी आज भी ओर कल भी
    ऐसे थे,है,ओर रहेंगे सदा
    कोई चमत्कार नही होता वहाँ
    जहा रोटी एक
    खाने वाले हजार हो जहाँ।।

    ऐ दोस्त हँसी आए या आए रोना
    कभी सुस्त कभी ना होना
    कर्म प्रधान इंसानी जीवन
    कर्म को बेहतर हमे बनाना।।

    देख रहा जो दिखता नही
    नही हाथो कुछ हमारे हैं
    नीतियां अजीब चल रही देश मे
    जल्द उनके दिन भी लदने वाले है।।✍️🙏

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