कुछ कविताओं के अंश वाट्सप पर यहाँ वहाँ से आते हैं तो लगता है कि लिखने वाला कितना ब्रिलियंट है पर रचनाकार का नाम अक्सर नहीं होता। गहरे सागर में उतर कर पढ़ने वाले ही जानते हैं इन मोतीयों की सीपीयों का पता।

कल एक फेसबुक पेज आगमन पर हास्य कविताओं की पाठशाला हुई थी। उसी में श्री बाजपेयी जी ने इस कविता का पाठ किया। जानकर अच्छा लगा कि प्रस्तुत कविता काका हाथरसी के विपुल हास्य कविता साहित्य के भंडार में से है।

श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी ने कहा निर्मल हास्य स्थितियों से उपजा हास्य है । फिर इस विधा के महारथियों की उन्होंने चर्चा ली। हास्य व्यंग्य साहित्य के दिग्गजों के नाम बताए, कुछेक कविताएँ पढ़ीं जिनमे से दो मैं यहाँ साझा कर रही। एक पिछले ब्लॉग ज़माने धत तेरी की में भी आप पढ़ चुके होंगे।

आजकल हास्य के नाम पर निम्न कोटि के चुटकुले और फूहड़ता अधिक परोसी जाती है। किसी काल खंड का साहित्य जनमानस की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब होता है। यदि हमें ऐसा लग रहा कि महान साहित्य नहीं है इस दौर में तो मकड़ी के जैसे अपने ही मन के उगले शब्दों से अपने ही इर्द गिर्द शब्दों का जाल बनाने से अच्छा है भँवरे की तरह बगिया बगिया टहलना स्वस्थ फूलों से पराग इकट्ठा करना और फिर उससे बनाना अपने साहित्य का शहद।

स्त्रीलिंग, पुल्लिंग / काका हाथरसी

काका से कहने लगे ठाकुर ठर्रा सिंग,
दाढ़ी स्त्रीलिंग है, ब्लाउज़ है पुल्लिंग।

ब्लाउज़ है पुल्लिंग, भयंकर ग़लती की है,
मर्दों के सिर पर टोपी पगड़ी रख दी है।

कह काका कवि पुरूष वर्ग की क़िस्मत खोटी,
मिसरानी का जूड़ा, मिसरा जी की चोटी।

दुल्हन का सिन्दूर से शोभित हुआ ललाट,
दूल्हा जी के तिलक को रोली हुई अलॉट।

रोली हुई अलॉट, टॉप्स, लॉकेट, दस्ताने,
छल्ला, बिछुआ, हार, नाम सब हैं मर्दाने।

पढ़ी लिखी या अपढ़ देवियाँ पहने बाला,
स्त्रीलिंग ज़ंजीर गले लटकाते लाला।

लाली जी के सामने लाला पकड़ें कान,
उनका घर पुल्लिंग है, स्त्रीलिंग है दुकान।

स्त्रीलिंग दुकान, नाम सब किसने छाँटे,
काजल, पाउडर, हैं पुल्लिंग नाक के काँटे।

कह काका कवि धन्य विधाता भेद न जाना,
मूँछ मर्दों को मिली, किन्तु है नाम जनाना।

ऐसी-ऐसी सैंकड़ों अपने पास मिसाल,
काकी जी का मायका, काका की ससुराल।

काका की ससुराल, बचाओ कृष्णमुरारी,
उनका बेलन देख काँपती छड़ी हमारी।

कैसे जीत सकेंगे उनसे करके झगड़ा,
अपनी चिमटी से उनका चिमटा है तगड़ा।

मन्त्री, सन्तरी, विधायक सभी शब्द पुल्लिंग,
तो भारत सरकार फिर क्यों है स्त्रीलिंग?

क्यों है स्त्रीलिंग, समझ में बात ना आती,
नब्बे प्रतिशत मर्द, किन्तु संसद कहलाती।

काका बस में चढ़े हो गए नर से नारी,
कण्डक्टर ने कहा आ गई एक सवारी।

प्रेम संगीत (पैरोडी) / बेढब बनारसी

तुम अंडर-ग्रेजुएट हो सुन्दर, मैं भी हूँ बी. ए. पास प्रिये;
तुम बीबी हो जाओ ‘ला-फुल’, मैं हो जाऊँ पति ख़ास प्रिये.

मैं नित्य दिखाऊँगा सिनेमा, होगा तुमको उल्लास प्रिये;
घर मेरा जब अच्छा न लगे, होटल में करना वास प्रिये.

‘सर्विस’ न मिलेगी जब कोई, तब ‘ला’ की है एक आस प्रिये;
उसमें भी ‘सकसेस’ हो न अगर, रखना मत दिल में त्रास प्रिये.

बनिया का उपवन एक बड़ा, है मेरे घर के पास प्रिये;
फिर सांझ सबेरे रोज वहाँ, हम तुम छीलेंगे घास प्रिये.

मैं ताज तुम्हें पहनाऊँगा, खुद बांधूगा चपरास प्रिये;
तुम मालिक हो जाओ मेरी, मैं हो जाऊँगा दास प्रिये.

मैं मानूँगा कहना सारा, रखो मेरा विश्वास प्रिये;
अपने कर में रखना हरदम तुम मेरे मुख की रास प्रिये.

यह तनमयता की वेला है, दिनकर कर रहा प्रवास प्रिये;
आओ हम-तुम मिलकर पीलें, ‘जानी-वाकर’ का ग्लास प्रिये.

अब भागो मुझसे दूर नहीं, आ जाओ मेरे पास प्रिये;
अपने को तुम समझो गाँधी, मुझको हरिजन रैदास प्रिये

(श्री भगवतीचरण वर्मा के ‘प्रेम संगीत’ की पैरोडी)

साभार – कविताकोश