अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता , ज़िंदगी के मकसद की तलाश, सीखना, बताना, लोगों से जुड़ना, कहानियां सुनाना, टटोलना मन, कहना अनकही, तोड़ना समाज के थोपे मानदंड या फिर असहज कर देना हर उकड़ू बैठी कुंठा को , आखिर क्या है पॉडकास्ट के मायने?

KukuFm पर सुनिए मेरा कलाकार सफर

किसी पोडकास्टर्ज़ मीट में सबसे एक सवाल पूछा गया था आपको पॉडकास्टिंग क्यों पसंद है –

मेरा जवाब था

यहाँ On Air होने के लिए न किसी पुराने और एस्टेब्लिश्ड का मूँह नहीं देखना पड़ता। ना ही बेवजह किसी के आगे पीछे करने के चक्कर।
पॉडकास्ट प्लेटफॉर्म ने traditional audio प्लेटफॉर्म्स की मोनोपोली तोड़ी है.।
Podcasting ने ऐसे ऐसे टेलेंटेड अंतर्मुखी लोगों को मौका दिया है जिनको दुनिया के सामने आने के लिए, religion , cast, state, language,looks, attire कुछ भी barrier नहीं है।

यहाँ इंसान की पहचान उसकी आवाज़ है। उसका content और content की गहराई और उसकी मेहनत। बाकी कुछ matter नहीं करता।

इतनी डेमोक्रेसी देखी है कहीं?

This is what podcast means to me.

ये जो Podcast है न ये मेरा दोस्त है। मुझे बातें करने के लिए कहता है। थकान भरे दिन के बाद हर रात चुप चाप सो जाना ज़रूरी नहीं है , सात मिनट की रिकार्डिंग के लिए लिखी जा रही स्क्रिप्ट फिर से ताज़ा कर सकती है आपको।

हो सकता है कोई बात तुमने नई सीखी हो आज उसे दुनिया को बता दो। कोई बात जिससे थोड़ा टूट गयी उसे भी सुना दो , साझा होते मन कब किसे राहत दे दें किसने देखा है । तुम्हारी यात्राओं की कहानी, पहली कविता की यात्रा, जीत की अनसुनी दस्तान यहाँ सब सुना दो।

बोलो, क्योंकि तुम आज़ाद हो औऱ ये दुनिया बस Zeroes और ones से नहीं बनी । क़ई सारे कंटीन्यूअस इमोशन्स हैं जो दो पायदानों के बीच का रास्ता तय करते करते जिये जाते हैं। तुम रखो अपनी बात, अपना अनुभव क्योंकि insignificant जैसा कुछ नहीं होता। हर आदमी दुनिया मे इकलौता सेम्पल होता है। तुम दोबारा नहीं बनने वाली।
हर कहानी किसी हीरो की हो ये ज़रूरी नहीं, हर वो किस्सा या कहानी जो मकसद रखती है, कही सुनी जानी चाहिए।

अनजाने दीवार के सामने बोलोगी तो क्या जाने लोग गेली या पागल कहें। जैसे कांके में फोन घुमाती बूढ़ी अम्मा किया करती थीं। उसको कोई सुनता नहीं था। फिर एक वो दिन बिना रुके बोलने लगी किसी की परवाह किये बग़ैर।

God helps them who help themselves.

पोडकास्ट की दुनिया में कोई किसी का मोहताज नहीं, कोई किसी के आगे नहीं, कोई पीछे नहीं, न तेज़ , न धीरे, न ऊपर , न नीचे। सबकी अपनी यात्रा है। सुकून है।

हुनर बखान सकते हैं, दुश्वारियां बयां कर सकते हैं, ग़ैर राजनीतिक ज़रूरी दबी बातों को उठा सकते हैं जिनमे बड़ा मीडिया मुनाफा नहीं देखता।

कितनी बातें होती हैं, जिनके सिर पैर नहीं होते पर दिल होता है, जैसे खिड़की पे बैठा इंतज़ार करता बचपन, लड़ते माँ बाप देखता बचपन, स्कूली जीवन की खट्टी मीठी यादें, डूबते को तिनके का सहारा जैसे मिले लोगों की कहानियाँ। लड़कपन की ग़लतियाँ, कॉलेज के crushes, होस्टल लाइफ की बातें, आधीरात के आउटिंग्स , नय शहर, नए लोग, और बार बार नई जिंदगी की शुरुआत वाली जद्दोजहद। कितनी बातें हैं जो सुबह से रात होने के बीच बिना घटती रहती है, ज़िन्दगी चलती रहती है।

साल 2013 की एक घटना याद आती है मुझे , ये वो दौर था जब मैंने खुद को एक home maker या office goer औरत की तरह ही देखा था। mechanical ज़िन्दगी। जिसका पैशन बस उसकी डायरी तक सीमित है, जिसकी गुमनामी का दूसरा नाम संस्कारी होना है। जो किसी भी अनुचित बात पर चोक होते गले से चुप रहना सीख चुकी है।

बेस्ट बस नम्बर 461 से बोरीवली to हिरनंदानी जाने के बीच ट्रैफिक के कारण अच्छा खासा दो घन्टे का समय होता था। मैं रोज़ लेडीज़ सीट पर साथ बैठी किसी भी अनजान औरत से बात करते जाती, लोगों को सुना जाना अच्छा लगता है। कभी कभी बस से उतरते उतरते अच्छे मित्र भी बन जाते और आगे भी जुड़े रहे । उस दिन कुछ अलग हुआ, बस से उतरकर ऑफिस पहुंचने के पहले मुझे एक लड़की ने टोका जो मुझसे दो सीट पीछे बैठी थी। उसने मुझसे कहा मैं कब से आपको उठ उठ कर देखने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर “बोल कौन रहा है” । उस गुजराती नवविवाहिता ने अपने शब्दों में मेरी हिंदी, आवाज़ और बोलने के तरीके की प्रशंसा करते हुए कहा कि हमारे आस पास आजकल कौन ऐसे बात करता है औऱ कहा कि मुझे सुनना उसे सुखद लगा।

मैंने मुस्करा कर उसे धन्यवाद कहा , उसके बारे में थोड़ी बहुत बात की और फिर केंज़िंगटन में हम अपने अपने फ्लोर पर चले गए । उसके बाद वो मुझे कभी नहीं मिली।
लेकिन उस दिन के बाद मैंने खुद को हल्के में लेना छोड़ दिया और लगा कि ऐसे कोई तारीफ नहीं करता कुछ बात तो होगी जिसपर मुझे ध्यान देना चाहिये।

2015 में मैंने रिश्तों के ताने बाने पर एक कविता लिखी थी “आम का अचार” , उस पर पापा ने लिखा ये तुम्हारे जीवन का टर्निंग पॉइंट है, तुम्हारी कविता में प्रौढ़ता आने लगी।

अपनी हिंदी को सुदृढ करने के लिए 2017 में मैंने इग्नोऊ से MA हिंदी करने का निर्णय लिया। इग्नोऊ के माध्यम से फेसबुक पर पुनीत कुसुम से पहचान हुई। उन्होंने उनकी वेबसाइट पोशम्पा पर मेरी कथा शैली में लिखी कविता “I am Tilottama” को जगह दी, और मुझे दिल्ली से संचालित “मुक्तांगन” काव्य प्रतियोगिता के बारे में बताया।

प्रितयोगिता में “आम का अचार” कविता द्वितीय स्थान पर रही। मेरे उत्साह की सीढ़ी में पायदान जुड़ने लगे थे।

तमाम बातों में बीच 2018 में ही एक्टिव रंगमंच से जुड़ीं मित्र Rayana Pandey ने मुझे open mic platform से अवगत कराया रोशेल डिसिल्वा संचालित words tell stories में मई 2018 के आस पास मेरा पहला Open Mic अनुभव था। खुले मंच पर मेरी पहली कविता भी “आम का अचार” ही थी।

उसी दिन कास्तिको स्पेस में मुम्बई के प्रसिद्ध ओपन माइक प्रेटफॉर्म “द हैबिटेट” से जुड़ी उन्नति भी वहाँ थीं। उन्होनें मेरा नम्बर लिया और Monday open mics में आने को कहा। जल्द ही उनके यूट्यूब चैनल पर मुझे फीचर होने का मौका मिला।

जिस पारिवारिक परिवेश में विवाहित औरत को मंचीय कवियत्री बने जाने पर नीचा देखा जाता है वहाँ एक बार फिर एक कशमकश के बाद मैं चुप चाप अपनी डायरी तक सीमित हो गयी,अब ये डायरी शतदल नाम का ब्लॉग बन गयी । ऑफिस में मितेश सोनी ने मुझे ब्लॉगिंग के बारे में बताया और वर्ड प्रेस यूज़ करना सिखाया। समय का सदुपयोग होने लगा। नोटपैड से टेक्स्ट उठ कर वेबसाइट पर सजने लगे और लोगों तक जाने लगे।

अप्रैल 2019 में उस हैबीटेट यूट्यूब फीचर वीडियोके माध्यम से मुझे कुकू एफ एम की शगुन ने मुझे कॉन्टेक्ट किया उन्होंने मुझे काव्य पाठ के साथ पॉडकास्टिंग की दुनिया में आने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने इस सुंदर अवसर को बहुत गंभीरता से लिया। मंच के क़ई रुप होते हैं । ये उनमें से एक है। जहां न किसी मनचले की नज़रों से उतपन्न खीझ का सामना करना है। न शहर की चौहद्दी नापने की जद्दोजहद। जगह भी आपकी, समय भी आपका और क्या चाहिए?

एक सिरे से कहना शुरू किया तो 52 पॉडकास्ट के एपिसोड बन गए जिनको हज़ारों लोगों ने सुना, प्रतिक्रियाएं दीं और ये जारी सफ़र है।

देश, दुनिया, कला, संस्कृति , साहित्य, विज्ञान, से जुड़ी कितनी बातें हम में से हर किसी के जीवन को छूती हुई निकलती हैं , पर हम उनपे गहन अध्धयन करने का कभी नहीं सोचते । बाज़ दफ़ा सोशल मीडया की टाइमलाइन में घण्टों स्क्रॉल कर सारा समय बर्बाद करके चिड़चिड़ाहट से ज़्यादा क्या मिला है किसी को। इस चिड़चडाहट से बचाया है मुझे पॉडकास्टिंग करने के लिए की गयी खोज और शोध ने। one day at a time, one thing at a time , one topic at a time and discipline prevails. अनुशासन से सारे सपने सम्भव है, थोड़ी सी प्लानिंग , थोड़ा सा एक्स्ट्रा माइल खुद को स्ट्रेच करने से

Job भी करनी है, बच्चे भी देखने है, घर भी संभालना है, इसके साथ साथ खुद को ढूंढना भी है,क्या है मेरी ज़िंदगी का मकसद? मेरा नाम हो मेरी पहचान हो ये सोच के शुरआत नहीं किया, यहाँ शुरआत हुई अपने आप से ईमानदारी बरतने के लिए, उस मुहब्बत को ढूंढने के लिए जिसे दुनिया की रेस में कबका पीछे छोड़ आये। ज़िन्दगी की laboratory में जितने भी practicals किये उनका नतीजा समझने के लिए।