आठ वर्षीय अभिज्ञान ने प्रोजेक्ट वर्क के लिए छोटी सी शार्क बनायी। महीन दांत, स्लेटी रंग, थ्री डी आकृति। नन्हे हाथों से कैंची से काटा औऱ प्यार से दिखा ही रहा था कि छोटे बेटे अंशुमन ने जलन में आकर उसकी शार्क छीन ली उसे मोड़ मसोड़ दिया। खीझ और खुंदक मिश्रित रुदन में अभिज्ञान चिड़चिड़ाया और मैने बच्चों के बीच रेफरी की भूमिका निभाते हुए दोनों को अलग किया।

कभी कभी मुझे ज़ोर से बोलते एहसास होता है कि शट अप प्रज्ञा कितना चिल्ला रही हो। पर क्या करूँ चाहती हूँ दोनों अच्छा आचरण करें। या शायद मेरे हिसाब से रहें।
मेरे हिसाब से रहने में क्या बुराई है? पर कोई भी किसी के हिसाब क्यों रहे , बच्चे भी अपने हिसाब से रहना चाहते हैं। मैं खुद को उनपर नहीं थोपती इस चक्कर में एक सारा दिन टी वी पर दूसरा टैब पर।

कभी कभी परेशान होती हूँ, नौकरी,प्लेनिंग, मैनेजमेंट जो डायरी की क्रम संख्या में गुम होकर बच्चों के लिए समय नहीं निकालने देता।

सोचती हूँ कि अक्सर मुस्करा हँस कर सेल्फी लेने वाली मैं डाँटते हुए बच्चों को कैसी राक्षसनी सी कुबड़ी माई ख़बड़ धबड़ सी दीखती रहूँगी न। वे मुझे गुस्से में देख के डर जाते हैं । ये व्यर्थ व्यवहार है जो अभिभावक की अपनी कमी के कारण निकलता है।

चोरी चुपके दब के जैसे तैसे थोड़ा पढ़ा फिर खाना है, अब टॉयलेट जाना है, अब टी वी का टाइम हो गया , अभी मन नहीं है, पेंसिल गुम हो गयी, इरेज़र नहीं है,कटर नहीं है।बहाने लगा के रात कर ली, सो गए, दिन गायब।

पेंटिंग्स या ड्राविंग करते हुए किसी दबाव में नहीं रखना पड़ता। उसमें उसका खुद ही मन लगता है। क्या दिक्कत है अगर मैं उसे केवल ड्राविंग ही करने दूँ तो।

अचनाक किसी ऑनलाइन क्लास मे अपने बच्चों के जवाब सुन गदगद भी होता है मन। नाना जी को कविता सुना दी, दादा जी को भाषण सुना दिया। घर मे 7 बजे रोज़ साँझ बाती की घन्टी भी बजा दी, दिया भी लगा दिया। छोटे भाई के लिए नीचे खेलने नहीं गया। दोस्तों ने नीचे बुलाया था लेकिन भाई रोयेगा तो नहीं गया। मेरी मीटिंग के दौरान अंशुमन को क्लास तक करा दिया।

लॉक डाऊन में जब कोई हाउस हेल्प नहीं थे शाम को बच्चों को भूख लगती, काम करते करते मेरे मना करने पर लाइटर से गैस जलाना सीख गया, तवा चढ़ाता उसपे बटर डालता , चिमटे से ब्रेड अल्ट पलट कर, बड़ी सी स्टील की थाली में नटेला लगाकर सामने भी ले आया। बोला खाओ मम्मी । तुम्हारे लिए भी। उसने ठीक वैसे ही त्रिकोण में काटा था जैसे मैं देती हूँ। इतने प्यार से मैने भी बच्चों से लॉक डाऊन के दौरान व्यवहार नहीं किया ।

किसी दिन कड़क अनुशासन और किसी दिन देर रात पिक्चर साथ देखते रहने की अनुशासन हीनता। दोनों के बीच होता रहा लालन पालन। मैं तो बच्चा पालने पर कभी किताब न लिखूँ। बच्चा मुझे ही पालने लगता है।

अभिज्ञान दोस्त रहेगा क्योंकि उसने मुझ जैसी अनाड़ी को झेला, ग़लतियों बसे सीखा फिर मैं असल मायनों में माँ बनी और अंशुमन को मम्मा वाला प्यार मिला।

अभिज्ञान मेरी उकताहट भाँप जाता है अब, फटाक से समझ कर डिप्लोमेटिक जवाब देता है।

कभी कभी लगता है, बचपन के साथ की यादें क्या रहेंगी यदि मैं “ये मत करो वो मत करो” करती रही तो। हमारा साथ क्या याद करने लायक बचेगा?

ऐसे ख़्याल आने पर मैं अचानक पकड़ के गले लगा लेती हूँ। कल अंशुमन को गोदी ले के सुलाया और महसूस हुआ कि जिस गति से बच्चे बढ़ रहे हैं, अंशुमन कुछ ही महीने में गोदी वाला बेबी नहीं रहेगा।

तुरंत उनके पापा को मेसेज में यह बात लिख दी कि “उठा लो गोदी वोदि बस कुछ महीनों में यह लड़का भी बड़ा हो जाएगा।” अंशुमन की तोतली बोली जाने लगी है।

बच्चों ने जब हमें अचानक अपने किसी नए गुर से आश्चर्य में डाला तो हम दोनों एक दूसरे को गर्व के हिस्से पर हक मारने के लहज़े में देखते रहे कि बेटा किसका है। लेकिन ज़रा सी कमी दिखी नहीं कि ये कमियाँ तूम्हारी हैं ।

माँ बाप से भी भूल होती रहती है । भूल की इरेज़र प्यार है। कस के पकड़ लेती हूँ, कहाँ रहेंगे हमेशा पास। इनके भीतर क्या क्या चल रहा है कौन जानता है।

अभिज्ञान की ड्रॉइंग्स देख कर समझ आता है कि उसके पापा की तरह सुलझा दिमाग है उसका, जिसमें एक अंजाम तक किसी काम को लाने की पूरी दृढ़ता है। जो शुरू किया वो समाप्त किया।

तीन वर्षीय अंशुमन किसी को खुश करने के लिए कुछ नहीं करता, अपने हिस्से में कम करके भी कुछ नहीं करता। उसको अपनी मर्ज़ी से रहना है। भाई से अभी बहुत कम्पीटिशन है। उसकी अलमारी का पल्ला टूट गया है, जो भी उसकी अलमारी को खोलने जाता है वो उसे ज़ोर ज़ोर से निर्देश देता है , “थोड़ा सा खोलो , थोड़ा सा ” , छोटे-मुन्ने हाथ से 45 डिग्री का एंगल बना कर सबको सिखाता है कि कैसे खोलनी है उसकी अलमारी।

पिछले महीने ब्लेक पैंथर के लिए मशहूर चैडविक बोसमैन नहीं रहे। नाश्ते की मेज पर अभिज्ञान को देखते हुए मैने ख़बर उजागर की -” ब्लेक पैंथर मर गया” । वो अचानक सुनकर दुखी हुआ , “नॉट पॉसिबल” बोलता हुआ चैडविक बोसमान का नाम लेकर फटाफट गूगल देखा। आज तक दुखी है। उसकी बनाई तस्वीर को देख उसके मन में क्या चल रहा मालूम होता है।

दोनों बच्चे ख़ूबसूरत हैं, अपनी पर्सनालिटी है, उनको अपने माँ बाप से स्पेस और समय दोनों चाहिए।