शक्ति की उपासना में
अगोचर अनंत की साधना में
दिव्य हैं अनुभव सभी
आराध्य की आराधना में

भाव मन से कर समर्पित
दिव्य चरणों में हूं अर्पित
ऊर्जा का स्रोत उर में
आर्या अनंता अमेय चित्रित

नित नए उत्कर्ष हों
जिस घर माँ सहर्ष हों
तमन्यता से नाम लेते
सफल उनके लक्ष्य हों

महिमा के गुणगान से
आद्या के यशोगान से
उत्साह से जीवन भरा है
बुद्धिदा के आह्वान से

प्रज्ञा 17/ऑक्टोबर/2020

मेरी दादी माँ को मैथिल कवि प्रदीप का यह गीत बहुत पसंद था ,
वे गाते गाते रोने लगती थीं
यह रेहल है। इसपर ग्रन्थ रख कर पढ़ना, ईश्वर का सत्कार करना है। हमारे बड़े गोदी में ग्रन्थ रखकर पढ़ने से मना करते हैं। यह उचित लगता है मुझे।