Ankita Jain जी की लिखी किताब “मैं से माँ तक” पढ़ी। यह किताब हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो किसी जीवन-यात्रा या अनुभव को सिर्फ इसलिए डॉक्यूमेंट नहीं करते कि वे सोचते हैं इस विषय की/का मैं एक्सपर्ट नहीं।

जीवनानुभव और वैज्ञानिक सोच का सुंदर समन्यव लगी
“मैं से माँ तक”।

प्रत्येक गर्भावस्था यात्रा अद्भुत और अलग होती है। उसका लिखित विवरण प्रस्तुत करना समाज सेवा का काम है। भारत जैसे देश में जहाँ स्त्री उच्च शिक्षा का प्रतिशत अब भी कम है उसमें आसान हिंदी में लिखी इस तरह की किताब अंध आस्थाओं से जगाने का काम करती है।

बोलचाल की हिंदी में लोगों के जीवन से जुड़ी घटनाओं को सटीक जगहों पर छोटी छोटी कहानियों के जैसे रखा गया है जिससे किताब रोचक हो गयी है।

अख़बार के कॉलम , पत्रिकाएँ अक्सर गुम हो जाते हैं, पर एक लिखी किताब संग्रहणीय बन कर समय समय पर रेफ़र करने के काम आती रहती है।

पुरुष प्रधान समाज में स्त्री जनित समस्याओं पर खुल कर बात करना औरतों के बीच भी “हॉ हॉ” का हावभाव है। ऐसे में एक आदमी को बताए कौन कि स्त्रियों को कैसी कैसी अवस्थाओं , मन: स्थितियों , बदलावों से गुज़रना होता है। यह किताब उन विषयों को छूती है जिनको समयानुसार पढ़ कर समझा जा सकता है।

पति – पत्नी में अलगाव के बहुत सारे कारण गर्भावस्था को सही तरीके से नहीं समझने कारण होते हैं। इसे समझा जाना चाहिए क्योंकि दोनो ही सुखी प्रेम सम्पन्न जीवन और परस्पर साथ के अधिकारी हैं।

किताब पढ़ कर आप यह भी समझते हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली समस्याओं का आर्थिक संपन्नता या विपन्नता से पूरी तरह लेना देना नहीं है, गर्भावस्था को खुशहाल रूप से पार करने के लिए ज़रूरत है जानकारी, समझदारी और प्यार की।

किताब प्रोग्रेसिव है, खोखली मान्यताओं पर कुठाराघात करती है, और स्नेहिल भारतीयता से ओतप्रोत भी है।

पिछली किताब “ऐसी वैसी औरत” पढ़ने के बाद यह दूसरी किताब भी आनंद से भर गयी। अब आगे बहेलिये की बारी और फ़िर ओह रे किसान।

शुभकामनाएं ।

Pragya Mishra