कुशहर बिहार में हूँ, ठंड का मौसम और शादियों का सीज़न दोनों शूरू हो गए हैं। ऑक्टोबर के बाद से अब तक वापिस मुम्बई लौटना नहीं हुआ। लगता है ताज़ा फल सब्ज़ियों, पुख्ता दूध दही का मोह महानगर में मेरी आज़ाद ज़िन्दगी से ज़्यादा कीमती है।

जिस घर में हूँ वो मेरा ससुराल है। बेहद शानदार नया घर बना है। सत्तर साल की उम्र में मेरे सास ससुर ने हमारे लिए पक्के मकान की धरोहर खड़ी की । हम सब कोरोना लोकडौन में उस दौरान छह महीने मुम्बई में ही घर से नौकर चाकर बन कर जीते रहे, ज़रा ढील हुई की नए घर में आकर पसर गए।

आने की वजह बुजर्गों का कुशल क्षेम अधिक था लेकिन धूप और खुली छत का मोह आने के बाद ऐसे बांध रहा कि मन लौटते हुए भारी है।

फिर भी मैं जाना चाहती हूँ और बिहार में हमेशा नहीं रहना चाहती उसकी सबसे बड़ी वजह मैं स्वयं हूँ।

बिहार मुझे प्रिय तो है, पर एक बहु की तरह ये जो चौखट भर जीने का सुख है मुझे रास नहीं आता। इसलिए महानगर की तमाम मिलावट में आज़ाद शामों के लिए सिमट जाना स्वीकार कर लेती हूँ। अब मुंबई की तरफ रूख़ कर लेती हूँ।

जो भी है अच्छा है, सुंदर है। शिकायत कुछ भी नहीं ज़िन्दगी।

कोहरा

ज़ीरो माइल से शुरुआत की
ज़िन्दगी के अन्जाने रास्तों पर
न धूप थी न गर्माहट
घर में सीलन , तन में सिहरन
सर्द साँसों में जमा मन भी
घने कुहासे की चादर पर
टोह टोह आगे बढ़ना हुआ
कैसे बतायें तक़दीर
तेरी नेमतों तक आने में
किन किन काँटों पर गुज़रना हुआ।

प्रज्ञा मिश्र
5/12/2020
21:15