सिख धर्म का अवतरण ही धर्म की रक्षा के लिए हुआ है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्- ॥४-७॥ #किसानआंदोलन

धर्म  और अधर्म की बात जब कृष्ण बोल गए तो गीता में यह भी कहा था उन्होंने यहाँ “धर्म” का अर्थ “साम्प्रदायिक धर्म से न ले लेना पार्थ”। वह जो अत्याचार करता है वही अधर्मी है और उससे धर्म की रक्षा करना ही जीवन का लक्ष्य है।

जो सत्तासीन हैं उनके अलावा पूरी जनता को विपक्ष में ही रहना चाहिए। आलोचक की भूमिका में। इसी में हमारा हित है, वर्ना सत्तासीन अपना हित साधते जायेंगे।

हम भारतीय सभ्यता का पालना हैं। समसे सम्प्रदायों और भाषाओं का उद्भव हुआ है। सॉफ्ट पावर बने रहना ही हमारी ताकत और भिन्नता है। जब पूरी दुनिया मे पारसी लुप्तप्राय थे हम उनके उद्धारक बने। हमको अपने आपसे पूछना है कि हमारे पास ऐसी कौन सी बात थी जो विभिन्नता में एकता रही है इस देश में। वह सहिष्णुता ही है।

बुद्धि और बल दोनो मिलकर विद्या बनती है , दोनों एकसाथ न रही तो विध्वंस ही करती है। वही हो रहा है।

जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है।

आप बहुमत हो सकते हैं, किंतु  बहुमत तो आप तब भी थे जब राम ने आपकी बात मान सीता को वन भेजा था। इसका अर्थ यही है कि बहुमत में हो तो सही भी हो आवश्यक नहीं।

मित्र संदीप साहनी जी ने इस विषय पर बड़ा अच्छी टिपण्णी की है :

धारयति: इति धर्म:
जिसे धारण किया जाए वो ही धर्म है। हमारे कर्तव्य भी हमारा धर्म है।

सूरा सो पहिचानिये
जो लड़े दीन के हेत सूरा सो ही
पुरजा पुरजा कट गिरे
कबहुँ ना छाड़े खेत

जो दीन की रक्षा के लिए खड़ा हुआ वो ही शूरवीर है।