मेरा मायका चंद्रालय है। पूजा बुआ का मायका प्रेमालय। दादीमाँ(बहिनदाय) का नाम था चन्द्रप्रभा, उनकी छोटी बहन का नाम प्रेमा। मैं बच्चों के साथ प्रेमालय हो आयी हूँ।प्रेमालय में छोटी(प्रेमा) दादी से मिली। तारा दादा, सत्ती दादी से मिलना बाकी है।

प्रेमालय में छोटी दादी और मैने पहले की कहानियाँ दोहरा लीं, किसी पहाड़े की तरह की आगे बताने के लिए, उस दौर की याद ताज़ा बनी रहे। अद्भुत पीढ़ियों के वंशज हैं हम। याद करने से अपने लिए अच्छा लगता है। यद्यपि दादी, घर की दिनचर्या में बहुत व्यस्त थीं, फिर भी उन्होंने बे झिझक समय दे दिया।

दूसरे दिन जाने का वादा कब पूरा करूंगी यही सोच कर दस्तावेज सहेज रही हूँ। कितना भाग गया समय। मेरे यादशहर में घूम रही हैं पियर्स साबुन और लैक्मे की क्रीम का शौक़ रखने वाली बहुत पुरानी चिरयुवा स्त्रियों की कहानियाँ। वे जिनके जाने भर से युग बदल गए। वे जो तिलिस्मी औरतें थीं, बाँध के रख लेती थीं अपने बच्चों को पूरे घर को अपनी चुप्पी और गंभीर वाक्यों के अंतराल में। दादी माँ ने कहा पैर मत छुओ कल आना है। पर फिर भी मैं छू आयी।

सुखसिंह का मैदान अब सुखसिंह नगर हो गया है। चप्पे चप्पे पर घर है। सुनसान मैदान की पतली पगडंडियाँ अब घरों के बीच गलियों में बदल गयी है। बड़े ख़ूबसूरत बंगले बन गए हैं। बड़ा बरगद का पेड़ मंदिर के प्रांगण में घेर दिया गया है। शीतला माता का मंदिर पहले जैसा लाइन से खड़ी सफेद कोठरियों के अंधेरे कमरे जैसा नहीं रहा । भव्य हो गया है

हमने मंदिर के प्रांगण में समय बिताया। बच्चे बरगद की जड़ें पकड़ पकड़ लटक रहे थे। मुझे चुन्नी, वटसावित्री, मई जून, दादी माँ, गर्मी की छुट्टी, सुखसिंह मैदान, सब याद आ रहा था। मैं खड़ी होकर सामने के घर देख रही थी , सारे घर मेरे चारों ओर नाचने लगे। वे घर मुझे अपने आर पार नहीं जाने देंगे। पर मैने इस ज़मीन को खेल खेल में नजाने कितनी बार आरपार किया है। कभी थकते भी नहीं थे।

मेरे बचपन का साक्षी वह बरगद का पेड़ मुझे अचंभित कर रहा था। जिसे चौड़े मैदान का एक छत्र सम्राट देखा किये वो अपनी सारी संपत्ति बिकने के बाद एक छोटी सियासत के राजा रखवार की तरह लग रहा था। जिस बरगद के चबूतरे पर फ्रॉक में कूद कूद कर चढ़ी वह इतने सहज पास और नीचे अच्छा नहीं लगा।

मैदान खाली हुआ करता था, रात में डरावना था, एड़ी से निकलते विष ने उसकी एक ही जगह पर पगडंडियाँ बनायीं थीं लेकिन मैदान बहुत विस्तृत था, उसमें आत्माएं लोट पोट करती हुई गंतव्य तक पहुंचती थीं, अब सब भटक रही हैं।

थोड़ा सा क्रिकेट ग्राउंड भर, किसी बगीचे भर, बच्चों के खेलने भर बचा लेना चाहिए था मैदान और उसी का नाम रख देना चाहिए था सुख सिंह का मैदान।

छत पर कपड़ा पसारने गयी। घर ही घर दिखे। घर पर परिजनों को अफ़सोस करते भी सुना है। ओह हमने थोड़ा आगे लिया होता। आगे कितने घर हो गए, हमारा घर गली में हो गया। पहले घर मैदान का अकेला घर था।

सन 1973 के चंद्रालय में पूर्णियाँ की पहली कलर टी. वी. आयी थी। वि.सी.आर आया था। पहली सफेद पद्मिनी कार थी। स्लेटी सीमेंट की फर्श, लाल सीमेंट के बॉर्डर , नीली उजली चूना पुताई की दीवार, नीले रंग की खिड़कियाँ, एक कमरा, दो कमरा। तीसरा घर, फिर दोमंजिला। उसमें नया सोफा , जिसकी तस्वीर और उसपर बैठे लोगों की तस्वीर आज भी एलबम में कहीं न कहीं पीली पड़ कर भी मौजूद है। वो सोफा अब भी मौजूद है। आज मेरा बेटा उस पर बैठ कर दूध रोटी खा रहा था और नए LED TV पर पंचानवे वर्षीय परदादा के साथ बैठ कर कोई प्रोग्राम देख रहा था। पूर्णियाँ की पहली कलर टी. वी. का बॉक्स दवाईयों और ड्राई फ्रूट्स की सुंदर अलमारी है अब, दादा जी के लिए सबसे हैंडी। सामान साठ वर्षों के बाद एंटीक हो जाते हैं। मैं एक संग्रहालय में सो रही हूँ।

पूर्णियाँ में विकास का क्रम सुंदर है। इंटेरनेट और बाज़ार जैसा मुंबई में है वैसा ही यहाँ भी। समानता का अधिकार सबको है। फिर भी मैदानी चुप्पी में चलना, रिक्शे की किरर्र कूँ, चाँदनी रात में पेड़ों की परछाईं का उतरना, ठंडी हवाओं का बिना किसी घर से टकराये अपनी छत तक आना भी सुख थे। सुखद वही लगता है जो बालसुलभ था।