रत्नाकर पाण्डे की चार संतानें थीं. दो बेटे और दो बेटियाँ. सभी के ब्याह से फ़ारिग हो चुके थे. बड़ा बेटा नॉर्वे में डॉक्टर था, और छोटा पिता की विरासत संभाल रहा था.

रत्नाकर अपने जीवन में कभी नहीं झुके, पर पोते विवान के लिए वो कभी घोड़ा बन जाते तो कभी पालकी. जितने समय तक वो घर में होते, विवान उनकी गोद मे चढ़ा रहता. इतना वात्सल्य तो रत्नाकर को कभी अपने बच्चों के लिए भी नहीं आया था. सच ही है; मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है.

रत्नाकर अपने जीवन का सारा अर्जित ज्ञान विवान को दे देना चाहते थे. विवान के पास भी सवालों की कमी न रहती.

“बाबा बाबा… वो देखो बंदर.
बाबा बंदर का बच्चा अपनी माँ को क्यों पकड़े रहता है?”

“क्योंकि उसकी माँ उसे नहीं पकड़ती.”

“उसकी माँ उसे क्यों नहीं पकड़ती?”

“क्योंकि उसकी माँ को दूसरे काम रहते हैं.”

“उसकी माँ को क्या काम रहता है?”

“उसके लिए केला लाना होता है.”

“अच्छा!”

जिस संयम से रत्नाकर पोते को सुनते और जवाब देते, वो देखने लायक होता था. उनकी करीने से कटी दाढ़ी, जो विरोधियों पर उनका अतिरिक्त भय कायम करती थी, उस वक़्त किसी साधु की दाढ़ी सरीखी लगती थी, और विवान की हर नई बात बाबा की दाढ़ी के स्पर्श के साथ शुरू होती थी. घर के नौकर रत्नाकर का ये रूप देखने का लालच नहीं छोड़ पाते थे, और उनकी वृद्धलीला देखने के लिए आस-पास जमा हो जाते थे.

अपने बाबा की तरह ही विवान को भी जानवरों से खूब लगाव था. वो सभी जानवरों को अचरज से देखता था और दिन भर के सवाल बाबा के आने तक समेटे रहता था.

“बाबा बिल्ली को मौसी क्यों कहते हैं?”

“क्योंकि वो शेर की मौसी होती है.”

“जैसे मेरी शालू मौसी?”

“हा हा हा हा… हाँ जैसे तुम्हारी शालू मौसी.”

“बाबा आज बिल्ली अपने बच्चे को मुँह में पकड़कर ले जा रही थी. बाबा क्या बिल्ली अपने बच्चे को खाती है?”

“नहीं बच्चा, बिल्ली अपने बच्चे को दूसरे घर ले जा रही थी.”

“पर बाबा, बिल्ली का बच्चा अपनी माँ को खुद क्यों नहीं पकड़ता?”

“क्योंकि उसे जरूरत नहीं पड़ती. बिल्ली खुद उसे पकड़े रहती है.”

“तो बन्दर की मम्मी बन्दर को प्यार क्यों नहीं करती?”

“करती तो है!”

“तो वो अपने बच्चे को खुद क्यों नहीं पकड़ती?”

“क्योंकि उसके पास बहुत काम रहता है.”

“लेकिन बाबा… बिल्ली मौसी के पास भी तो बहुत काम रहता है न!”

“हा हा हा हा… बन्दर और बिल्ली अलग-अलग होते हैं न! इसीलिए.”

“अच्छा बाबा अगर बन्दर का बच्चा अपनी मम्मी को नहीं पकड़ेगा तो क्या उसकी मम्मी उसे छोड़ देगी?”

“अरे नहीं! क्यों छोड़ देगी? वो तो माँ है न उसकी!”

“तो बाबा बन्दर का बच्चा तो छोटा होता है न! वो गिर गया तो!”

“अरे नहीं भाई! बन्दर का बच्चा कभी नहीं गिरता. उसकी पकड़, उसके हाथ बहुत मजबूत होते हैं.”

सद्गृहस्थ लोग जैसा सुख पाने और ज्ञानविभोर होने का स्वांग करने के लिए प्रवचन सुनने जाते हैं, वही सुख अब रत्नाकर-विवान संवाद में रत्नाकर को मिलने लगा था.

“बाबा बिल्ली की माँ अपने बच्चे को ज्यादा प्यार करती है न!”

“नहीं बच्चा, दोनों अपने बच्चों को बराबर प्यार करती हैं. जैसे तुम्हारी मम्मी तुमको प्यार करती हैं.”

ऐसी बातें सुनकर विवान अपने बाबा को अचरज से देखता था.

एक दिन रत्नाकर जैसे ही अपनी गाड़ी से नीचे उतरे, विवान उनके पास दौड़ता हुआ आया. एक नज़र उनको देखा, फिर जोर-जोर से रोने लगा.

“बाबा आपने तो कहा था कि बन्दर का बच्चा कभी नीचे नहीं गिरता! लेकिन आज बन्दर का बच्चा नीचे गिर गया और शेरू ने उसे काट लिया. वो मर गया.”

ये बोलकर विवान और जोर-जोर से रोने लगा. रत्नाकर से कुछ बोलते न बना. वो देर तक विवान को चुप कराते रहे. ऐसी जाने कितनी ही घटनाएँ रोज घटती हैं. पर उस शाम रत्नाकर विवान के सो जाने के बाद भी उसे देर तक गोद मे लिए बैठे रहे थे. फिर विवान की माँ को बुलाकर बच्चा माँ के सुपुर्द कर दिया.

रत्नाकर-विवान संवाद पूर्व की भांति जारी रहा, पर अब रत्नाकर खुद भी विवान से प्रश्न करने लगे थे, और पूरी उत्सुकता से जवाब सुना करते थे.

“विवान बिल्ली अच्छी होती है या बन्दर?”

“बिल्ली.”

“क्यों?”

“क्योंकि वो अपना बच्चा खुद पकड़ती है, और बिल्ली के बच्चे को कोई काम नहीं करना पड़ता.”

बिल्ली और बन्दर रत्नाकर-विवान संवाद का प्रमुख विषय था.

एक शाम जब दादा-पोता अहाते में बैठकर ‘गंभीर’ चर्चा कर रहे थे, तभी विवान जोर से चीखा- “बाबा… बिल्ली”
बिल्ली अपने बच्चे को मुंह मे दबाकर ले जा रही थी. विवान कि इस चीख ने कुत्तों को सतर्क कर दिया था. कुत्ते बिल्ली की ओर झपटे, पर बिल्ली एक झटके में बच्चे को मुँह में दबाए, पहले गाड़ी पर फिर चारदीवारी पर जा खड़ी हुई. वहां से उसने रुककर एक नज़र रत्नाकर को देखा, और फिर चली गयी.

रत्नाकर अवाक रह गए. काटो तो खून नहीं. जैसे सांप सूंघ गया हो.

विवान को नीचे उतार दिया, और चुपचाप अपने कमरे में जाने लगे. विवान पीछे से पुकारता रहा, पर रत्नाकर नहीं रुके.

बुद्ध जर्जर बूढ़े को देख चुका था.

जारी…..

भाग 3