कोबरा या नाग भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला सबसे जहरीला सांप है. इसके काटने पर आदमी के शरीर पर विषदंश उभर आते हैं, पर आदमी तुरंत नहीं मरता. सर्पदंश से मरना एक चरणबद्ध प्रक्रिया है. सर्पदंश अगर अंधेरे में हुआ है, तो व्यक्ति पहले पुष्टि करता है कि सांप ने ही काटा है या कुछ और था! जब तक अनुभवी लोग मठाधीशी करते हैं, तब तक ज़हर शरीर में फैल जाता है, और सूजन आनी शुरू हो जाती है. मदहोशी छाना, नींद आना और झाग उगलते हुए मर जाना इसके अगले चरण हैं.

रत्नाकर पाण्डे को ज्ञान ने डस लिया था. वो ज्ञानदंश के निशान मन में लिए फिर रहे थे. हालांकि नियमित गतिविधियों में कोई कमी नहीं आयी थी, पर उनका रत्नाकरपन कम होता जा रहा था. विरोधियों को कंपाने वाला उनका अट्टहास मंद पड़ता जा रहा था. अक्सर दाढ़ी छंटवाना भूल जाते थे, और अपनी प्रिय विदेशी पिस्तौलें आलमारी में रख छोड़ी थीं. विवान से बतियाना भी बन्द हो गया था, पर उनकी बालिश्त भर बढ़ चुकी दाढ़ी अभी भी विवान के खेल का सामान थी. घर के लोग उनके व्यवहार में आये इस बदलाव को उनकी उम्र का असर मान रहे थे, और सहज थे.

सुरक्षा कारणों से शादी-ब्याह के आयोजनों में जाने से बचने वाले रत्नाकर अब अपने सामाजिक दायित्त्वों को लेकर एकाएक सजग हो उठे थे. ज्ञानदंश का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. असर ऐसा था कि बाज़ार से सब्जी लाने भी खुद ही जाया करते. शुरुआत में नौकर झोला लेकर साथ जाता था, पर बाद के दिनों में किसी सेवानिवृत्त सज्जन की तरह रत्नाकर खुद ही जाने लगे थे.

लोग ताज्जुब करते थे और परिवार के लोग चिन्ता. पर रत्नाकर को टोकने का पौरुष अब भी किसी मे नहीं था.
पीठ पीछे लोग कहते, “बभनवा पगला गया है.” पर ये सही नहीं था.

उनके माथे पर हर वक़्त नुमायाँ होने वाली रेखाएँ अदृश्य हो गयी थीं. फकीरों की तरह वो कभी अपने अहाते में सो जाते, कभी बरामदे में पड़े रहते.

एक शाम रत्नाकर घर से सब्जी लेने निकले, और फिर कभी लौटकर नहीं आये.

जारी….

भाग 4