अशोक बाबू प्राइमरी के रिटायर्ड मास्टर थे. सीधे, सरल और सिद्धान्तवादी. ज़ुबान के पक्के. एकदम हिन्दी फिल्मों में दिखाए जाने वाले टिपिकल मास्टर सरीखे.

सालों पहले हादसे में जवान बेटा खो चुके थे, और महीने भर पुत्रशोक मनाकर पत्नी भी चल बसी थीं. तो अशोक बाबू इन दोनों मौतों का जिम्मेदार रत्नाकर पाण्डे को मानते थे.

शहर से थोड़ा हटकर, तीन कमरों का अपना मकान था. अकेले रहते थे. कभी-कभार बेटी आकर देखभाल कर जाती थी. खुद बनाते-खाते थे, और मन में रत्नाकर पाण्डे की हत्या करने की अलभ्य इच्छा रखते थे.

रत्नाकर कभी उनके बालसखा हुआ करते थे. दोनों साथ-साथ बड़े हुए थे. खैर…

उस दिन शाम के नौ बजे होंगे, किसी ने अशोक बाबू का दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कुर्ता-पाजामा और हवाई चप्पल पहले एक बूढ़ा खड़ा था. अस्त-व्यस्त बाल और लंबी दाढ़ी. अशोक पहचान ही नहीं पाए.

“जी कहिये!”

तभी अचानक उन्हें आभास हुआ कि रत्नाकर हैं. देखते ही रह गए. सालों बाद चौंके थे. एकदम किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे. रत्नाकर खुद ही भीतर चले आये.

“अशोक, पानी पिलाओ.”

रत्नाकर ऐसे बोले, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो. अशोक अवाक थे. पानी पिलाया. रत्नाकर तख्त पर बैठे थे. अशोक परिस्थिति समझने की कोशिश कर रहे थे.

“मैं थोड़ा सब्जी लेने निकला था, सोचा मिलता चलूँ.”

अशोक रत्नाकर के इस ढीठपने पर हैरान थे. कुछ बोले नहीं, बस भीतर चले गए. दो घंटे बाद जब अशोक बाहर आये तो देखा रत्नाकर तख्त पर लेटे खर्राटे भर रहे थे.
उनका खून खौल उठा. अपनी कसम याद आने लगी. भुकुटियाँ तन गयीं. तेज कदमों से भीतर की ओर लपके, और कुछ ढूंढने लगे. पर कुछ भी ‘काम लायक’ नहीं मिला. क्या मिलता! अशोक जैसों के यहाँ कहाँ कुछ मिलता है!

सुबह तीन बजे तय किया कि हत्या गला दबाकर की जाएगी. दृढ़ निश्चय करके बाहर आये तो रत्नाकर को तख्त पर बैठा हुआ पाया. दांत पीसते हुए भीतर लौट गए.

ऐसा नहीं था कि रत्नाकर को अशोक के इरादों का अनुमान नहीं था. रत्नाकर की जिंदगी बीत गयी थी इन कामों में. पर आज वो अशोक बाबू का कर्ज चुकाने पर आमादा थे. वो अशोक को बदला दिलाने में किसी जिगरी दोस्त की तरह पूरे मन से जुटे थे. अशोक के जाने के बाद वो तख्त पर मुंह फेरकर लेट गए.

किसी अशोकनुमा सज्जन के लिए हत्या कर पाना कितना कठिन होता है, रत्नाकर इसे खूब समझते थे. तो वे बिना हिले-डुले पड़े रहे, और आने वाली मृत्यु का इंतज़ार करते रहे.

लगभग आधे घण्टे बाद अशोक हाथ में मसाला कूटने वाला खरल लेकर निकले. रत्नाकर को आहट मिली, पर पड़े रहे. अगर ये सिनेमा का कोई दृश्य होता तो दर्शकों की धड़कन बढ़ गयी होती. अशोक खरल हाथ में थामे तख्त के पास खड़े थे और रत्नाकर को घूर रहे थे. रत्नाकर आंखें बंद होने पर भी इस घूरे जाने को महसूस कर रहे थे. और फिर वही हुआ जिसका रत्नाकर को डर था.

खरल अशोक के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया और वो धम्म से कुर्सी पर बैठ गए. रत्नाकर ने आंखें खोल दीं, पर लेटे रहे.

अशोक सुबक रहे थे. आंसुओं से चेहरा भीगा हुआ था. रत्नाकर चुपचाप बैठे हुए थे. समय था कि आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहा था. तभी अशोक बाबू ने रत्नाकर की ओर देखा…

“काहे मरला हो?” ( क्यों मारे? )

पुराना रत्नाकर होता तो जवाबों के ढेर लगा देता. सफाई देता. गलती मान लेता. माफी मांग लेता. कुछ भी करता, पर पल्ला झाड़ लेता. लेकिन रत्नाकर चुप रहे.

पांच बज गया था. उजाला होने लगा था. दोनों सज्जन चुपचाप बैठे थे.

“अशोक कुछ खाना बचा है?”

अशोक उठे और रसोई से बासी रोटियों पर सब्जी रखकर ले आये. रत्नाकर किसी भूखे साधु की तरह खाते रहे, और अशोक उनका मुंह ताकते रहे.

खाने के बाद रत्नाकर ने पानी मांगा, और पानी पीकर बाहर निकल गए. अशोक रत्नाकर को आंखों से ओझल होने तक देखते रहे.

ये अंतिम बार था जब किसी परिचित ने रत्नाकर पाण्डे को देखा था.

कुछ लोग कहते हैं कि अशोक बाबू का घर छोड़ने के बाद रत्नाकर पाण्डे ने अयोध्या जाकर जल-समाधि ले ली थी. पर पिछले साल सुनने में आया कि रत्नाकर पाण्डे जैसा दिखने वाला एक साधु कलकत्ता में देखा गया है.

मुझे नहीं पता कि रत्नाकर अब कहाँ और किस रूप में हैं. पर मैं ये जरूर जानता हूँ कि सालों पहले मेरे शहर में रत्नाकर पाण्डे नाम के एक आदमी की ज्ञानदंश से मुक्ति हुई थी.

©हिमांशु सिंह

हिमांशु सिंह सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं. दृष्टि संस्थान से जुड़े हैं और स्वतंत्र लेखन भी करते हैं.