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आइये जानें क्या है वेक्सीन एक्ट, ये भारत में कब लागू हुआ, कौन थे Dr. Waldemart Hafkine, क्या है भारत का immunisation programme और कोरोना वेक्सीन बननेके प्रयास।

1853 से पहले निजी तौर पर टीके ज़रूर लगाए जाते थे पर  कहीं भी राष्ट्रव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम नहीं चला था। ब्रिटेन में व्यापक टीकाकरण की शुरुआत वैक्सीनेशन एक्ट ऑफ 1853 के साथ हुई। Vaccine Act के तहत सबसे पहले ने तीन महीने तक के शिशुओं का  टीकाकरण अनिवार्य किया गया जिसे बाद में संशोधित कर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए बढ़ाया गया।

भारत में Compulsory Vaccination Act (अनिवार्य टीकाकरण अधिनियम) 1892 में पारित किया गया था। चेचक महामारी से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित इस अधिनियम का उद्देश्य चेचक के टीकाकरण के उच्च कवरेज को सुनिश्चित करना और महामारी को कम करना था। भारतीय उप-महाद्वीप में अनिवार्य टीकाकरण की यह पहली घटना थी। हालांकि यह एक्ट अधिकतर कागज़ी तौर पर रहे और महामारी के दौरान ही अधिक चर्चा में रहे।

Edward Jenner के द्वारा चेचक के टीके का अविष्कार 1798 में किया गया था। चार साल के भीतर यानी 1802 में चेचक का टीका भारत पहुंचा।भारत में चेचक के टीके की पहली खुराक मई 1802 बॉम्बे (अब मुंबई) के तीन वर्षीय अन्ना डस्टहॉल  को 14 जून 1802 को दी गयी थी।

चेचक महामारी से निपटने के प्रयासों के बाद, भारत अन्य टीकाकरण परीक्षणों के लिए खुला था। 19 वीं शताब्दी के अंत में वैक्सीन परीक्षण के लिए हैजा(Cholera) और प्लेग दो बीमारियाँ थीं। बंगाल में हैजा की महामारी शुरू हुई और पूरे देश को तबाह कर दिया था।

उक्रानियन मूल microbiologist के Dr. Waldemar Haffkine  ने एंटी-कॉलरा टीका विकसित किया था। ब्रिटिश भारत सरकार के आग्रह पर  Dr. Haffkine ने 1893 में आगरा में वैक्सीन का सफल परीक्षण किया।

तीन साल बाद 1896 में, मुंबई में बुबोनिक प्लेग फैल गया और भारत सरकार ने डॉ हैफकीन से मदद मांगी।  ब्रिटिश भारत सरकार ने उनसे प्लेग वैक्सीन पर काम करने का अनुरोध किया। प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए सुविधाएं प्रदान कीं। बिना समय गवाए, मौके क़ई नज़ाकत समझते हुए एक साल बाद ही प्लेग के लिए टीका विकसित  किया गया। यह दिलचस्प है कि उन्होंने पहले टीकों का परीक्षण खुद पर किया था। प्लेग का टीका भारत में विकसित पहला टीका था। हालांकि इससे महामारी को नियंत्रित करने में मदद मिली, लेकिन इसने पूर्ण सुरक्षा प्रदान नहीं की और इसके दुष्प्रभाव भी थे।

1902 में प्लेग से बचाव में वैक्सीनेशन के दौरान , पंजाब में क़ई लोगों की मृत्यु हो गयी थी, पूरे कार्यक्रम को खासा झटका लगा और हाफ़क़ीन अपराधी भी घोषित हुए, लेकिन बाद में जाँच पर यह बात साफ हुई कि गड़बड़ी वैक्सीन में नहीं बल्कि कुछ डोज़ में बाहरी काँटेमिशन जाने के कारण थी।
यद्द्पि हाफ़क़ीन बरी कर दिए गए पर अपने प्रति सरकार का रवैया और लोगों के बुरे व्यवहार से वे काफी टूट गए थे। बावजूद इसके उन्होंने अपना योगदान देना नहीं छोड़ा।

हैजा और प्लेग जैसी खतरनाक बीमारियों पर नियंत्रण दिलाने के लिए उनको हमेशा याद किया जाता है।
डॉ हाफ़काइन भारत में टीकाकरण के इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं उन्होंने हैजा और बुबोनिक प्लेग, दोनों के खिलाफ टीके बनाये भी लगाए भी।
16 March 1964 Microbiologist Wldemart Haffkine के सम्मान में भारत ने पोस्टेज स्टैम्प निकाला।

भारत का राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम क्या कहलाता था?

EPI – एक्सपैंडेड प्रोग्रेम ऑफ इम्यूनाइजेशन 1978
UIP – Unified Immunisation Program 1985

भारत का राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम 1978 में शुरू किया गया था । EPI का उद्देश्य था शिशु आबादी के 80 प्रतिशत का टीकाकरण। EPI की शरुआत बीसीजी, ओपीवी, डीपीटी, मीज़ील्स(खसरा), गर्भवती महिला टेटनस वैक्सीन से हुई ।इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रमुख अस्पतालों के माध्यम से टीकाकरण किया गया और यह शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित था।  परिणामस्वरूप, कवरेज कम रहा।

यूनिवर्सल इम्यूनज़ेशन प्रोग्राम – UIP
EIP की ख़ामियों के मद्देनज़र 19 नवम्बर 1985 UIP लॉन्च किया गया।
यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम में टीकाकरण को भारत में भीतरी क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया-  1985 में 31 जिलों में शुरू हुआ था। अतिरिक्त जिलों तक विस्तार का लक्ष्य था। कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य
1. तेजी से टीकाकरण कवरेज में वृद्धि
2. टीकाकरण और सेवा की गुणवत्ता में सुधार
3. टिका स्टोर करने के लिए विश्वसनीय कोल्ड चेन सिस्टम स्थापित करना
4. चरणों में कुल टीकाकरण लागू करना – सभी जिलों को 1989-1990 तक कवर किया जाना।
5. जिलेवार निगरानी प्रणाली तैयार करना।
6. वैक्सीन उत्पादन  और कोल्ड चेन उपकरणों के निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।

भारत में वैक्सीन निर्माण इकाइयों को लाइसेंस देने के लिए कौन सा संगठन प्रतिक्रियाशील है?

एक वैक्सीन निर्माण इकाई खोलने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना इतना आसान नहीं है। वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को क्लिनिकल परीक्षण, और विपणन प्राधिकरण यानी marketing authorisation की अनुमति की आवश्यकता होती है। भारत में, इस लाइसेंस को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन Central Drug Standards Control Organisation CDSCO द्वारा  प्रदान किया जाता है।
CDSCO  एक नैशनल रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जिसका देश में दवाओं की गुणवत्ता पर the Drugs and Cosmetics Act 1940 के आधार पर नियंत्रण है।

इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के भी तय मानक हैं जो वेक्सीन की गुणवत्ता निर्धारित एवं प्रामाणित करते हैं। भारत में उत्पादित क़ई वैक्सीन WHO प्रमाणित हैं।

भारत मे CSIR – Council of Scientific and Industrial research , ICMR – Indian Council of Medical Research , National Institute of Immunology जैसे संस्थान निरन्तर वेक्सीन पर अनुसंधान कर रहे हैं।

हमारा पूरा पिछला साल 2020 , कोविड -19 के विरूद्ध वैक्सीन की प्रतीक्षा में निकला। चूँकि एक ही वैक्सीन पर आश्रित रहना सुरक्षित नहीं इसलिये 165 से भी अधिक कोविड-19 वैक्सीन पर काम किया जा रहा है जिसमें से 27 टिके मानव परीक्षण में प्रयोग किये जा चुके हैं।

16 जनवरी से भारत में कोविड 19 टीकाकरण आरम्भ हो चुका है। University of Oxford और british-swedish pharmaceutical company AstraZeneca के संयुक्त प्रयासों से बनी Vaccine जिसे Pune स्थित Serum Institute ने भारत में  Covishield नाम दिया को मंजूरी मिली है। इसके साथ ही ICMR और Hyderabad स्थित Bharat Biotech के Covaxin को आपातकालीन स्थिति में मंज़ूरी देने की बात की गई हालांकि कॉवेक्सीन ने अभी तीसरे चरण का ट्रॉयल पास नहीं किया है इसलिए इसको लेकर अभी बहस बनी हुई है।
अन्य देशों की तरह भारत भी लगातार कोविड -19 का टीका बनाने की तरफ प्रयासरत है। भारत मे इस समय 30 अलग कम्पनियाँ इस नेक काम मे जुटी हैं जिनमे से सात को WHO से मंजूरी भी मिली है।

भारत मे बन रहे कुछ वैक्सीन के नाम इस प्रकार हैं;

कॉवेक्सीन – Bharat biotech Hyderabad
ZyCov-D – Zydus Cadilla Ahmedabad

इसके अलावा Indian Immunologicals Limited , Australia की Griffith University के साथ पार्टनरशिप में काम कर रही है।

Bengaluru की Mynvax, Panacea Biotech Ltd, Biological E कुछ अन्य नाम हैं जो पार्टनरशिप या स्वतन्त्र रूप से विभिन्न तकनीकों के आधार पर क्लीनिकल ट्रायल्स कर रहे हैं।

माना जाता है अगर 60 से 70% आबादी किसी बीमारी से प्रति रोधक क्षमता विकसित कर ले तो उसे herd Immunity कहते हैं। कोरोना वेक्सीन बनने की सारी कहानी इसी herd immunity ko पाने के लिए है जिससे धरती पर मानव जाती दोबारा बिना मास्क और सेनिटाइजर खुल कर गले मिल सके।

आज कल समाचार में कोविड 19 वैक्सीन से जुड़ी अहम खबरें रोज़ चल रही हैं जैसे
– 18 वर्ष या उससे ऊपर की आयु के लोगों के लिये ही फिलहाल उपलब्ध है वेक्सीन
– एक सेंटर पर एक ही तरह का वैक्सीन दिया जाएगा
– एक ही व्यक्ति को अगले चरण में वही वेक्सीन दी जाएगी इसलिये एक सेंटर पर दो तरह के वेक्सीन नहीं रखे जाएंगे
– वेक्सीन के लिए पंजीकरण केवल Cowin ऐप के माध्यम से होगा
– आदि
लगातार समाचार पत्रों और आधिकारिक खबरों पर नज़र रखें, बेकार के विवाद में रूचि न लें।  देश और दुनिया के वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने में सफलता बहुत मुश्किल से हासिल करते हैं, उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिये। केवल सरकारी तौर पर लिखित और प्रेषित बातों को immunisation program के दौरान भरोसा करें। बिना वैज्ञानिक आधार पर की गई कोई भी टिप्पणी पूरे प्रोग्राम को क्षति पहुँचा सकती है इसलिए सोशल मीडिया पर व्यर्थ बहस से बचें।

वैक्सीन शृंखला पर अपनी प्रतिक्रिया देकर हमें बताएं कि आपको हमारा आज का कार्यक्रम कैसा लगा।
सभी श्रोताओं को स्वस्थ मन एवं स्वस्थ शरीर की शुभकामना। ईश्वर करें हम सभी कोविड -19 के प्रकोप से जल्दी निजात पाएं और दुनिये घूमें।
धन्यवाद।